
इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) आज लाखों निसंतान दंपत्तियों के लिए संतान सुख पाने का एक वरदान साबित हो रहा है। भारत के दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, लखनऊ और कोलकाता जैसे बड़े शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक फर्टिलिटी क्लिनिक और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों ने पेरेंटहुड का सपना साकार किया है। हालांकि, IVF प्रक्रिया के जरिए गर्भधारण करने के बाद महिलाओं के मन में कई तरह के संशय और सवाल उठने लगते हैं। इनमें से सबसे आम और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या IVF तकनीक से जन्में शिशु को स्तनपान (Breastfeeding) कराने में मां को किसी तरह की शारीरिक या हार्मोनल परेशानी का सामना करना पड़ता है? क्या IVF के दौरान ली गई हैवी हार्मोनल दवाएं और इंजेक्शंस मां के दूध की गुणवत्ता, स्वाद या उसकी मात्रा पर कोई नकारात्मक असर डालते हैं?
इंटरनेशनल लैक्टेशन और फर्टिलिटी एक्सपर्ट्स के अनुसार, IVF से गर्भधारण करने वाली महिलाओं की दूध निर्माण की बायोलॉजिकल क्षमता में और प्राकृतिक रूप से मां बनने वाली महिलाओं में कोई अंतर नहीं होता है। फिर भी, IVF यात्रा के दौरान आने वाले मानसिक तनाव, देर से डिलीवरी, सी-सेक्शन ऑपरेशन और अंतर्निहित बीमारियों के कारण शुरुआती दिनों में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां जरूर आ सकती हैं।
क्या कहती है मेडिकल साइंस? दूध बनने की प्राकृतिक शरीर रचना
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, महिला के शरीर में दूध बनने और उसके स्त्राव (Milk Ejection) की प्रक्रिया पूरी तरह से दो मुख्य हार्मोन्स पर निर्भर करती है—प्रोलैक्टिन (Prolactin) और ऑक्सीटोसिन (Oxytocin)। प्रोलैक्टिन हार्मोन स्तन ग्रंथि में दूध का निर्माण करता है, जबकि ऑक्सीटोसिन हार्मोन दूध के बाहर निकलने (Let-down Reflex) को नियंत्रित करता है।
जब शिशु का जन्म होता है और प्लेसेंटा (आंव) मां के गर्भाशय से बाहर निकलता है, तो शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का स्तर अचानक गिर जाता है। यह जैविक बदलाव मस्तिष्क के पिट्यूटरी ग्लैंड को संकेत देता है कि वह प्रोलैक्टिन और ऑक्सीटोसिन जारी करे। यह प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक होती है और इस बात से बिल्कुल प्रभावित नहीं होती कि गर्भधारण सामान्य रूप से हुआ है या लैब में IVF तकनीक के माध्यम से। IVF के दौरान दी जाने वाली प्रोजेस्टेरोन या एस्ट्रोजन की खुराक गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों (10 से 12वें हफ्ते) तक ही दी जाती है और डिलीवरी का समय आने तक उनका असर पूरी तरह खत्म हो चुका होता है।
IVF माताओं को क्यों आ सकती है स्तनपान में शुरुआती रुकावट?
भले ही IVF तकनीक स्वयं ब्रेस्टफीडिंग में रुकावट नहीं डालती, लेकिन IVF प्रेगनेंसी से जुड़े कुछ परिस्थितिजन्य कारण शुरुआत में ब्रेस्टफीडिंग को थोड़ा चुनौतीपूर्ण जरूर बना सकते हैं।
पहला प्रमुख कारण सी-सेक्शन (C-Section) डिलीवरी की उच्च संभावना है। IVF प्रेगनेंसी को मेडिकल भाषा में ‘हाई-रिस्क’ या बेहद कीमती गर्भावस्था माना जाता है, इसलिए किसी भी जोखिम से बचने के लिए डॉक्टर अक्सर सिजेरियन डिलीवरी को प्राथमिकता देते हैं। सी-सेक्शन के बाद एनेस्थीसिया के असर, टांकों के दर्द और सर्जरी के तनाव के कारण शुरुआती 24 से 72 घंटों तक प्रोलैक्टिन का स्तर तेजी से नहीं बढ़ पाता, जिससे दूध उतरने (Lactation Delay) में 2 से 3 दिनों की देरी हो सकती है।
दूसरा बड़ा कारण मानसिक तनाव और एंग्जायटी है। लंबी और मानसिक रूप से थका देने वाली IVF यात्रा के बाद कई महिलाएं अपने नवजात शिशु के स्वास्थ्य और उसकी भूख को लेकर अत्यधिक चिंतित रहती हैं। मेडिकल रिसर्च बताती है कि अत्यधिक तनाव से शरीर में कार्टिसोल हार्मोन बढ़ता है जो ऑक्सीटोसिन के स्राव को बाधित करता है। नतीजतन, दूध का बहाव धीमा हो जाता है।
इसके अलावा, IVF कराने वाली महिलाओं में अधिक उम्र (Maternal Age 35+), जुड़वां बच्चों (Twins) का जन्म और पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) या थायराइड जैसी अंतर्निहित बीमारियों की दर अधिक होती है। PCOS या थायराइड के कारण शरीर में ग्लैंडुलर टिश्यू (Glandular Tissue) का विकास कम हो सकता है, जिससे शुरुआती दिनों में लो मिल्क सप्लाई (Low Milk Supply) की शिकायत देखने को मिलती है।
IVF और ब्रेस्टफीडिंग से जुड़े मिथक बनाम डॉक्टरी सच्चाई
भारतीय समाज में IVF और लैक्टेशन को लेकर कई तरह की भ्रांतियां और मिथक फैले हुए हैं, जिन्हें दूर करना बेहद आवश्यक है:
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मिथक: IVF में ली गई हैवी दवाओं से मां का दूध विषैला या नुकसानदायक हो जाता है।
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सच्चाई: यह पूरी तरह से बेबुनियाद है। डिलीवरी के समय बनने वाला पहला गाढ़ा पीला दूध (कोलोस्ट्रम – Colostrum) और बाद में बनने वाला दूध पोषक तत्वों, एंटीबॉडीज और प्रोटीन्स से भरपूर होता है। यह बच्चे की इम्युनिटी के लिए सर्वोत्तम है।
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मिथक: यदि बच्चा डोनर एग (Donor Egg) या डोनर स्पर्म से पैदा हुआ है, तो मां का दूध नहीं बनेगा।
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सच्चाई: जैविक रूप से मां का शरीर गर्भाशय में पल रहे बच्चे और डिलीवरी के बाद होने वाले हार्मोनल बदलावों के अनुसार दूध बनाने के लिए खुद-ब-खुद तैयार होता है। चाहे अंडा डोनर का हो या अपना, जन्म देने वाली मां का शरीर स्तनपान कराने में पूरी तरह सक्षम होता है।
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IVF माताओं के लिए लैक्टेशन एक्सपर्ट्स के खास सुझाव
यदि आप IVF के माध्यम से मां बनी हैं और स्तनपान शुरू करने में थोड़ी हिचकिचाहट या परेशानी महसूस कर रही हैं, तो इन आसान और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर दूध की सप्लाई को प्राकृतिक रूप से बढ़ा सकती हैं:
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स्किन-टू-स्किन कॉन्टैक्ट (Skin-to-Skin Contact): बच्चे के जन्म के तुरंत बाद उसे मां की छाती पर नग्न त्वचा से सटाकर रखें। इससे मां के मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन हार्मोन का स्तर तुरंत बढ़ता है और दूध बनने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
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अर्ली लैचिंग (Early Latching): डिलीवरी के 1 से 2 घंटे के भीतर बच्चे को छाती से लगाने की कोशिश करें। भले ही शुरुआत में दूध की कुछ बूंदें ही निकलें, लेकिन बच्चे का चूसना (Sucking) दिमाग को दूध उत्पादन का संकेत देता है।
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ब्रेस्ट पंप का सही इस्तेमाल: यदि सी-सेक्शन के बाद दर्द अधिक है या बच्चा ठीक से लैच नहीं कर पा रहा है, तो हॉस्पिटल-ग्रेड इलेक्ट्रिक या मैनुअल ब्रेस्ट पंप का इस्तेमाल करके मिल्क ग्लैंड्स को स्टिम्युलेट (उत्तेजित) करें।
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लैक्टेशन कंसलटेंट की सलाह: यदि 3-4 दिन बीत जाने के बाद भी दूध का प्रवाह सही न हो, तो किसी प्रमाणित लैक्टेशन एक्सपर्ट या डॉक्टर की मदद लें। वे सही स्थिति (Positions) और लैचिंग तकनीक सिखाकर आपकी समस्या का समाधान कर सकते हैं।
संक्षेप में कहें तो IVF के बाद स्तनपान कराना न केवल पूरी तरह सुरक्षित है, बल्कि यह मां और बच्चे दोनों की सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है। शुरुआती 1-2 हफ्तों की मामूली परेशानियों को सही मार्गदर्शन, धैर्य, पौष्टिक आहार और तनावमुक्त रहकर आसानी से दूर किया जा सकता है।
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