इंसान नहीं, यहां सांप करते हैं शिव भक्ति! बालाघाट के मंदिर में आरती होते ही खुद चले आते हैं नाग-नागिन

देवों के देव महादेव और नागों का संबंध अनादि काल से माना जाता है। भगवान शिव के गले में वासुकी नाग का वास हमेशा से भक्तों के लिए श्रद्धा का केंद्र रहा है। लेकिन मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले से एक ऐसा हैरान कर देने वाला और अलौकिक वाकया सामने आता रहा है, जिसे देखकर कोई भी दांतों तले उंगली दबा ले। यहां सावन के पावन महीने में केवल इंसान ही नहीं, बल्कि जहरीले सांप और नाग-नागिन का जोड़ा भी बाकायदा भगवान भोलेनाथ की आरती में शामिल होने के लिए मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच जाता है।

शंख और घंटी की आवाज सुनते ही खिंचे चले आते हैं नाग देवता

स्थानीय ग्रामीणों और मंदिर के पुजारियों के अनुसार, यह कोई एक दिन की घटना नहीं है बल्कि पिछले कई वर्षों से सावन के दौरान यह सिलसिला लगातार देखा जा रहा है। जैसे ही शाम को मंदिर में संध्या आरती का समय होता है और शंख, घड़ियाल तथा घंटों की गूंज वातावरण में फैलती है, पास की झाड़ियों या बिलों से नाग-नागिन का जोड़ा रेंगते हुए सीधे मंदिर की ओर बढ़ने लगता है।

सांप बिना किसी को नुकसान पहुंचाए शांत भाव से शिवलिंग की परिक्रमा करते हैं और कई बार फन फैलाकर शिवलिंग के समीप ऐसे बैठ जाते हैं मानो वे पूरी तन्मयता से महादेव की आरती का हिस्सा बन रहे हों।

भक्तों में नहीं कोई खौफ, अटूट आस्था का अद्भुत नजारा

आमतौर पर जहरीले सांपों को देखते ही लोगों में दहशत का माहौल बन जाता है और लोग भागने लगते हैं। हालांकि, इस मंदिर में दृश्य बिल्कुल विपरीत होता है। स्थानीय श्रद्धालुओं का कहना है कि नाग-नागिन का यह जोड़ा मंदिर परिसर में मौजूद सैकड़ों श्रद्धालुओं के बीच से होकर गुजरता है, लेकिन उन्होंने आज तक किसी भी भक्त या जीव को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है।

आरती समाप्त होने और प्रसाद वितरण के बाद यह जोड़ा धीरे-धीरे अपनी जगह वापस लौट जाता है। श्रद्धालु इसे भगवान शिव का प्रत्यक्ष चमत्कार और नाग देवता की अनन्य भक्ति मानकर पूरी श्रद्धा से नमन करते हैं।

सावन के बाद रहस्यमयी तरीके से ओझल हो जाता है जोड़ा

इस मंदिर की सबसे रहस्यमयी बात यह है कि नाग-नागिन की यह नियमित उपस्थिति मुख्य रूप से केवल सावन के महीने में ही देखने को मिलती है। सावन का महीना समाप्त होते ही यह जोड़ा मंदिर परिसर से अपने आप ओझल हो जाता है और फिर अगले साल सावन के दिनों में ही दिखाई देता है। इस चमत्कारी दृश्य को अपनी आंखों से देखने के लिए सावन के सोमवार और नागपंचमी के मौके पर दूर-दराज के क्षेत्रों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन और जलाभिषेक करने के लिए पहुंचते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाम आस्था का विश्वास

जीव विज्ञानियों और वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश और सावन के मौसम में बिलों में पानी भरने और भोजन की तलाश में सांप अक्सर बाहर निकलते हैं तथा कई बार मंदिर के शांत या ठंडे फर्श पर शरण लेते हैं।

इसके उलट, स्थानीय भक्तों और सनातन परंपरा में विश्वास रखने वालों का दृढ़ मत है कि ध्वनि और कंपन से भागने वाले संवेदनशील सरीसृप यदि तेज आरती और भीड़ के बीच शांति से शिवलिंग के पास बैठ रहे हैं, तो यह केवल विज्ञान नहीं बल्कि महादेव के प्रति जीवों के आत्मिक समर्पण और अलौकिक शिव भक्ति का साक्षात प्रमाण है।