नेतन्याहू या गादी आइजेनकोट: इजरायल में सरकार गठन पर संशय

इजरायल की राजनीति में इन दिनों भूचाल आया हुआ है और देश एक बेहद ऐतिहासिक एवं निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों के बाद राजनीतिक दलों के बीच गतिरोध इस हद तक बढ़ गया है कि अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति भवन पर टिकी हैं। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी तथा पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के बीच सत्ता की यह रस्साकशी चरम पर पहुंच चुकी है। इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ मैराथन परामर्श बैठकें पूरी कर ली हैं और उन्होंने यह साफ कर दिया है कि देश में अगली सरकार बनाने का न्योता किसे मिलेगा, इसका आधिकारिक ऐलान वे रविवार को करेंगे। इस राजनीतिक उठापटक के बीच यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या देश की कमान लंबे समय से सत्ता में काबिज नेतन्याहू के पास रहती है या फिर विपक्ष के हाथ में सत्ता की चाबी सौंपकर इजरायल में एक नए राजनीतिक युग का सूत्रपात होता है।

राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की मैराथन बैठकें और राजनीतिक दलों की स्थिति

इजरायल की 120 सदस्यीय नेसेट (संसद) में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण चुनाव परिणाम त्रिशंकु रहे हैं। इसके बाद राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने संविधान के मुताबिक सभी निर्वाचित दलों के प्रमुखों के साथ सिलसिलेवार बातचीत शुरू की। परामर्श दौर के दौरान इजरायल की राजनीति में अप्रत्याशित समीकरण देखने को मिले हैं। एक तरफ जहां कार्यवाहक प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाले दक्षिणपंथी-धार्मिक गठबंधन को कुल 53 सीटों का समर्थन हासिल है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दलों और गादी आइजेनकोट के खेमे को विभिन्न दलों व अरब बहुसंख्यक पार्टियों का बड़ा समर्थन मिला है। राष्ट्रपति हर्जोग इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि किस नेता के पास संसद में बहुमत जुटाने और एक स्थिर सरकार देने की वास्तविक क्षमता है। राष्ट्रपति के इस आगामी फैसले पर इजरायल के भविष्य का पूरा राजनीतिक ताना-बाना टिका हुआ है।

गादी आइजेनकोट को मिला भारी समर्थन और सांसदों की संख्या का गणित

इस बार के राजनीतिक समीकरणों में विपक्ष के उम्मीदवार और ‘यशार’ पार्टी के नेता गादी आइजेनकोट ने अप्रत्याशित बढ़त हासिल कर ली है। राष्ट्रपति के सामने चली आ रही बैठकों में गादी आइजेनकोट के पक्ष में कुल 67 सांसदों (MKs) की सिफारिशें दर्ज की गई हैं। इसमें विपक्षी दलों के साथ-साथ अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों जैसे कि ‘राम’ (Ra’am) और ‘ज्इंट लिस्ट’ (Joint List) ने भी आइजेनकोट के पक्ष में समर्थन का ऐलान किया है। संख्या बल के इस आंकड़े में आइजेनकोट भले ही नेतन्याहू से काफी आगे निकल गए हों, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि वैचारिक रूप से बेहद विभाजित दलों को एक साथ लाकर 61 के जादुई बहुमत वाले स्थायी गठबंधन को जमीन पर उतारना उनके लिए भी आसान नहीं होगा। इसके बावजूद, इतनी बड़ी संख्या में नाम आने के बाद प्रेसीडेंसी की ओर से उन्हें सरकार बनाने का पहला मौका मिलने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।

बेंजामिन नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ीं और भविष्य की चुनौतियां

दूसरी ओर, देश पर लंबे समय तक शासन करने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह दौर राजनीतिक अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई बनता जा रहा है। उनकी पार्टी ‘लिकुड’ ने चुनावों में सबसे बड़े एकल दल के रूप में 27 सीटें जीती हैं, लेकिन उनके पारंपरिक सहयोगियों को मिलाकर कुल आंकड़ा 53 सीटों पर ही सिमट गया है। इसके अलावा, कुछ धुर-रूढ़िवादी और कट्टरपंथी दलों के रुख में बदलाव तथा यूनाइटेड टोरा जुडाइज्म (UTJ) द्वारा तुरंत समर्थन न देने के कारण नेतन्याहू का कुनबा कमजोर होता नजर आ रहा है। हालांकि नेतन्याहू खेमा लगातार यह दावा कर रहा है कि केवल वही देश को पुख्ता सुरक्षा दे सकते हैं, लेकिन जिस तरह से विपक्ष ने गोलबंदी की है, उससे उनकी राह बेहद कठिन हो गई है। यदि रविवार को राष्ट्रपति हर्जोग विपक्षी खेमे को सरकार गठन का न्योता देते हैं, तो इजरायल की राजनीति में दशकों पुराना समीकरण हमेशा के लिए बदल सकता है।