
प्रकृति के भीषण प्रकोप से जूझ रहे हिमालयी क्षेत्र पर एक और बड़ा संकट टूट पड़ा है। नेपाल और चीन नियंत्रित तिब्बत सीमा पर विनाशकारी बाढ़, चट्टानें खिसकने और ग्लेशियर टूटने से मची भारी तबाही के अभी दो हफ्ते भी पूरे नहीं हुए थे कि मंगलवार देर रात धरती के भीतर मची भीषण हलचल ने पूरे पर्वतीय अंचल को दहला दिया। यूरोपियन-मेडिटेरेनियन सिस्मोलॉजिकल सेंटर (EMSC) और स्थानीय भूकंप विज्ञान केंद्रों के अनुसार, तिब्बत-नेपाल सीमावर्ती क्षेत्र में रिक्टर पैमाने पर 5.3 की तीव्रता वाला शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया। मंगलवार रात करीब 9:38 से 9:53 बजे के आसपास जब लोग अपने घरों में सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी अचानक जमीन हिलने लगी और ऊंची इमारतों में लगे पंखे व सामान हिलते देख लोग चीखते-पुकारते खुले मैदानों की तरफ भागने लगे।
भूकंप निगरानी केंद्रों के शुरुआती वैज्ञानिक आंकड़ों के मुताबिक, इस भूकंप का केंद्र उत्तर-पश्चिमी नेपाल के मुस्तांग जिले के लोमंथंग के पास और उससे सटे तिब्बत के सीमावर्ती इलाके में स्थित था। यह इलाका राजधानी काठमांडू से लगभग 375 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में पड़ता है। यूरोपीय एजेंसी ईएमएससी ने बताया कि भूकंप का हाइपोसेंटर (केंद्र बिंदु) सतह से करीब 35 किलोमीटर की गहराई पर था। वहीं भारत के नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी (NCS) ने भी इस भूकंपीय झटके की पुष्टि करते हुए इसकी तीव्रता 5.0 और गहराई दर्ज की। हालांकि इस ताजा भूकंप के कारण तुरंत किसी बड़ी जान-माल की हानि या इमारत ढहने की आधिकारिक सूचना नहीं आई है, लेकिन नेपाल के मनांग, डोल्पा, म्याग्दी और काठमांडू घाटी सहित तिब्बत के कई दूरदराज के रिहायशी इलाकों में झटके इतने तेज थे कि लोगों के बीच दोबारा आपदा आने की दहशत फैल गई।
यह भूकंप ऐसे अत्यंत संवेदनशील समय में आया है जब नेपाल और तिब्बत पहले से ही सदी की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में से एक का दंश झेल रहे हैं। 26 अगस्त को उच्च हिमालयी क्षेत्र में विशाल ग्लेशियर और बर्फीली चट्टानें ढहने (Ice-rock avalanche) से भोटेकोशी नदी और सहायक धाराओं में जलप्रलय आ गया था। इस विनाशकारी सैलाब ने रास्ते में आने वाले सैकड़ों गांवों, पक्के मकानों, सड़कों, वाहनों और प्रमुख पुलों को तिनके की तरह बहा दिया था। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण प्राधिकरण (NDRRMA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल में अब तक 1,357 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 5,326 लोग अब भी लापता हैं। उधर चीनी सीमा में भी तिब्बत के भीतर 43 लोगों के मारे जाने और 500 से अधिक लोगों के लापता होने की पुष्टि हुई है, जिससे दोनों देशों में कुल मौतों का आंकड़ा 1,400 के पार पहुंच चुका है।
आपदाग्रस्त क्षेत्रों में राहत और बचाव अभियान पहले से ही बेहद विषम भौगोलिक परिस्थितियों में चल रहा है। बाढ़ और मलबे के कारण कम से कम 11 प्रमुख जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाएं तबाह हो चुकी हैं और उनकी भूमिगत सुरंगों (Tunnels) में 120 से अधिक इंजीनियर और मजदूर फंसे हुए हैं, जिन्हें निकालने के लिए सेना और बचाव दल दिन-रात मशीनों से खुदाई कर रहे हैं। इस बीच लगातार आ रहे भूकंपीय झटकों ने बचाव दलों की चिंता कई गुना बढ़ा दी है। पिछले एक हफ्ते के भीतर तिब्बत और हिमालयी सीमा पर 5 तीव्रता से ऊपर का यह दूसरा भूकंप है। भूगर्भ वैज्ञानिकों का कहना है कि भारी बारिश और बाढ़ के कारण पहले से गीली और कमजोर हो चुकी पहाड़ी ढलानों पर भूकंप के हल्के झटके भी बड़े पैमाने पर नए भूस्खलन को न्योता दे सकते हैं, जिससे नदियों के रास्ते रुकने और कृत्रिम झीलें बनने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
चीनी विज्ञान अकादमी (CAS) और वैश्विक जलवायु वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पूरा किंघाई-तिब्बत पठार और हिमालयी बेल्ट इस समय अत्यधिक संवेदनशील भूगर्भीय और पर्यावरणीय संकट से गुजर रहा है। वैज्ञानिकों के अध्ययनों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग और तापमान में तेज वृद्धि के कारण पिछले छह दशकों में इस क्षेत्र के करीब 24% से 40% ग्लेशियर पिघलकर सिकुड़ चुके हैं। तिब्बत के करीब 33,000 ग्लेशियरों में से 187 ग्लेशियर बेहद खतरनाक स्थिति में हैं, जिनके फटने या खिसकने की चौबीसों घंटे सैटेलाइट मॉनिटरिंग की जा रही है। टेक्टोनिक प्लेटों की आपसी रगड़ से उत्पन्न हो रहे लगातार भूकंप और अनियंत्रित मौसमी बदलाव मिलकर पूरे हिमालयी और दक्षिण एशियाई क्षेत्र के लिए एक बड़े खतरे का अलार्म बजा रहे हैं।
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