
दक्षिण एशियाई राजनीति में इस समय एक अभूतपूर्व उबाल देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से ही ढाका से लेकर नई दिल्ली तक राजनीतिक और कूटनीतिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ी हुई है। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सबसे घोर आलोचक और हालिया छात्र आंदोलन के प्रमुख अगुआ नाहिद इस्लाम ने भारत में जारी नागरिक अधिकारों और विभिन्न आंदोलनों को लेकर एक ऐसा बयान दिया है, जिसने पूरे उपमहाद्वीप में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। नाहिद इस्लाम, जिन्होंने बांग्लादेश में शेख हसीना के शासन के खिलाफ सिविल जॉइंट प्लेटफॉर्म (CJP) और छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया था, अब भारत में विचाराधीन बंदियों और छात्र कार्यकर्ताओं के हक में खुलकर आवाज उठा रहे हैं।
नाहिद इस्लाम ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्होंने भारत के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के पूर्व छात्रों उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य प्रदर्शनकारियों का विशेष रूप से जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और विरोध की आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए। उनका मानना है कि युवाओं और छात्रों को अपनी मांगें रखने और राजनीतिक सुधारों के लिए आवाज उठाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। नाहिद इस्लाम के इस बयान को शेख हसीना के भारत में रहने और दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण होते संबंधों के संदर्भ में बेहद रणनीतिक और तीखा माना जा रहा है।
भारत में साल 2020 के दिल्ली दंगों और सीएए (CAA) विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम लंबे समय से जेल में बंद हैं। इस मुद्दे पर भारत की न्यायपालिका और कानून प्रवर्तन एजेंसियां पूरी निष्पक्षता और संवैधानिक दायरे में रहकर काम कर रही हैं। हालांकि, बांग्लादेश के नए राजनीतिक नेतृत्व और छात्र संगठनों द्वारा इस मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने के प्रयास को कई विशेषज्ञ भारत के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी के रूप में देख रहे हैं। नाहिद इस्लाम का दावा है कि जिस तरह बांग्लादेश में छात्रों और युवाओं की आवाज को दबाने की कोशिश की गई थी, ठीक उसी तरह पूरी दुनिया में कहीं भी लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए। उनके इस बयान से दक्षिण एशिया में छात्र राजनीति और मानवाधिकारों को लेकर नया विमर्श शुरू हो गया है।
शेख हसीना के भारत में शरण लेने के बाद से ही बांग्लादेश की नई अंतरिम व्यवस्था और भारत सरकार के बीच कूटनीतिक तनाव की स्थिति बनी हुई है। ढाका में मौजूद नए सत्ता केंद्रों की ओर से लगातार ऐसे बयान सामने आ रहे हैं, जो भारतीय राजनीति और नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश करते दिखते हैं। नाहिद इस्लाम द्वारा सीजेपी प्रदर्शनकारियों, जेएनयू के छात्र नेताओं और भारतीय न्याय प्रणाली के तहत चल रहे मामलों पर टिप्पणी करना दोनों देशों के रिश्तों में और खटास घोल सकता है। भारतीय कूटनीतिज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश के नेताओं को अपने देश की आंतरिक स्थिति, अर्थव्यवस्था और कानून-व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि भारत के आंतरिक कानूनी और प्रशासनिक मामलों पर बयानबाजी करनी चाहिए।
दक्षिण एशिया में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह बयान सिर्फ एक टिप्पणी मात्र नहीं है, बल्कि इसके गहरे कूटनीतिक मायने हैं। एक तरफ जहां बांग्लादेश की नई पीढ़ी अपने देश को एक नए लोकतांत्रिक ढर्रे पर ले जाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देशों के संवेदनशील आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश कर रही है। भारत सरकार ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि उसकी न्यायिक प्रणाली पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी है, जहाँ हर नागरिक को कानून के अनुसार निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि नाहिद इस्लाम के इस रुख पर भारत सरकार और विदेश मंत्रालय की क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया आती है और इसका असर भारत-बांग्लादेश के ऐतिहासिक संबंधों पर किस तरह पड़ता है।
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