
अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार और आधुनिक सैन्य रणनीतियों के बीच रूस के सबसे चर्चित चौथी पीढ़ी के T-14 आर्माता (T-14 Armata) मेन बैटल टैंक को लेकर एक चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। यूक्रेनी युद्धक्षेत्र की कठिन परिस्थितियों में जिस टैंक को रूस ने अपना सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ हथियार घोषित किया था, वही टैंक वास्तविक जंग में तकनीकी और व्यावहारिक मोर्चे पर बुरी तरह विफल साबित हुआ है। रूसी रक्षा उद्योगों द्वारा निर्मित इस हाइटेक्स बख्तरबंद वाहन को युद्ध के मैदान में इंजन संबंधी गंभीर समस्याओं, अत्यधिक जटिल इलेक्ट्रॉनिक्स प्रणाली और बेतहाशा रखरखाव लागत का सामना करना पड़ा। यही वजह रही कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके शीर्ष सैन्य कमांडरों ने इस टैंक को यूक्रेन के फ्रंटलाइन युद्धक्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उतारने से साफ परहेज किया। रूस की अपनी सेना ने भी माना कि आर्थिक और परिचालन की दृष्टि से यह टैंक अभी उस विश्वसनीयता पर खरा नहीं उतरा है, जिसकी उम्मीद इतने महंगे प्रोजेक्ट से की जाती है।
जब रूस की अपनी सेना T-14 आर्माता को युद्ध में तैनात करने से झिझक रही है, तब यह सवाल उठना लाजिमी है कि मॉस्को इसे भारत जैसे अपने सबसे भरोसेमंद रक्षा साझेदार को क्यों पेश कर रहा है? इसके पीछे रूस की सोची-समझी कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति छिपी हुई है। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के कारण रूस के रक्षा उद्योग और अनुसंधान बजट को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है। इस महत्वाकांक्षी टैंक प्रोजेक्ट में अरबों डॉलर बहाने के बाद रूस को अब इसके वित्तीय बोझ को साझा करने के लिए एक बड़े और सक्षम साझेदार की सख्त जरूरत है। भारत अपनी पुरानी पड़ चुकी T-72 टैंकों की फ्लीट को बदलने के लिए नेक्स्ट-जेनरेशन मेन बैटल टैंक (NGMBT) की तलाश में है। रूस इसी मौके का फायदा उठाकर भारत को ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) पहल के तहत T-14 आर्माता के स्थानीय उत्पादन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) और संयुक्त विकास का लुभावना ऑफर दे रहा है ताकि प्रोजेक्ट को डूबने से बचाया जा सके।
भारतीय थल सेना के आधुनिकीकरण के एजेंडे में भविष्य के बहु-आयामी युद्धक्षेत्रों से निपटने के लिए आधुनिक बख्तरबंद वाहनों की भारी मांग है। रूस द्वारा दिए गए इस नए प्रस्ताव में कहा गया है कि T-14 आर्माता के मूल प्लेटफॉर्म में भारतीय सेना की भौगोलिक और सामरिक आवश्यकताओं के हिसाब से बड़े बदलाव किए जा सकते हैं। इस टैंक की मानवरहित बुर्ज (Unmanned Turret) प्रणाली और क्रू प्रोटेक्शन कैप्सूल तकनीकी रूप से काफी उन्नत माने जाते हैं। हालांकि, यूक्रेन युद्ध में इसके खराब रिकॉर्ड को देखते हुए भारतीय रक्षा विशेषज्ञ और थल सेना बेहद सतर्क रुख अपना रहे हैं। भारतीय रणनीतिकारों का मानना है कि यदि इस टैंक को भारतीय सेना में शामिल करना भी पड़े, तो इसमें स्वदेशी एंटी-ड्रोन सिस्टम, भारतीय थर्मल इमेजर्स, एक्टिव प्रोटेक्शन सिस्टम और शक्तिशाली स्वदेशी इंजन का इस्तेमाल करना अनिवार्य होगा, ताकि यह लद्दाख की हाड़ कंपाने वाली ऊंचाइयों और थार के तपते रेगिस्तान में बिना रुकावट काम कर सके।
रूस का यह आक्रामक रक्षा प्रस्ताव केवल एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया और वैश्विक रक्षा बाज़ार में शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला कदम है। यदि भारत इस प्रोजेक्ट पर विचार करता है, तो यह रूस के रक्षा निर्यात को नया जीवन दे सकता है, लेकिन इसके साथ ही कई बड़ी तकनीकी और कूटनीतिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। T-14 आर्माता के कई संवेदनशील पुर्जे विदेशी कलपुर्जों पर निर्भर रहे हैं, जिनकी आपूर्ति वैश्विक प्रतिबंधों के कारण प्रभावित हुई है। इसके अलावा, भारत के पास पहले से ही स्वदेशी ‘अर्जुन’ टैंक का अनुभव और T-90 ‘भीष्म’ टैंकों के बड़े पैमाने पर निर्माण का सफल ट्रैक रिकॉर्ड मौजूद है। ऐसे में भारतीय रक्षा मंत्रालय और वैज्ञानिक समुदाय रूस के इस प्रस्ताव का बारीकी से तकनीकी मूल्यांकन कर रहे हैं, ताकि देश की सुरक्षा प्राथमिकताओं और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प से कोई समझौता न हो।
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