
सनातन संस्कृति और प्राचीन भारतीय ग्रंथों में ज्ञान, विज्ञान और अध्यात्म का ऐसा अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है, जिसे पढ़कर आज के आधुनिक वैज्ञानिक भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। हमारे महान ग्रंथों में से एक ‘श्रीमद्भागवत पुराण’ (Shrimad Bhagavata Puran) में ब्रह्मांड की रचना, ग्रहों की चाल, सूर्य की गति और ऋतुचक्र के बदलाव को समझाने के लिए एक बहुत ही सुंदर और सटीक दार्शनिक उदाहरण दिया गया है, जिसकी तुलना कुम्हार के घूमते हुए चाक (Potter’s Wheel) से की गई है। पुराणों के अनुसार, जिस प्रकार एक कुशल कुम्हार अपने चाक को तेजी से घुमाता है और उस पर रखी मिट्टी से सुंदर घड़े व बर्तन गढ़ता है, ठीक उसी प्रकार काल चक्र और प्रकृति की शक्तियां इस पूरे ब्रह्मांडीय तंत्र को निरंतर गतिमान रखती हैं। इस आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से हमारे ऋषियों ने सदियों पहले ही यह समझा दिया था कि इस सृष्टि में कुछ भी स्थिर नहीं है, बल्कि हर एक ग्रह, तारा और ऋतु एक निश्चित चाक की तरह निरंतर घूम रही है और अपने नियत समय पर परिणामों को जन्म दे रही है।
श्रीमद्भागवत पुराण के पांचवें स्कंध और अन्य अध्यायों में खगोलीय घटनाओं का अत्यंत सूक्ष्म और वैज्ञानिक विवरण मिलता है, जिसमें सूर्य की गति को ब्रह्मांड का मुख्य इंजन बताया गया है। ग्रंथ के अनुसार, सूर्य देव इस काल चक्र के रथ पर सवार होकर निरंतर अपनी दिशा और गति बदलते रहते हैं, जिससे दिन और रात का चक्र तथा विभिन्न महीनों का निर्धारण होता है। जिस प्रकार कुम्हार का चाक एक धुरी पर टिककर गोल-गोल घूमता है, उसी प्रकार हमारे सौरमंडल में सूर्य की परिक्रमा और उसकी गति इस पूरी प्रकृति को संचालित करती है। जब सूर्य उत्तर या दक्षिण की ओर गमन करता है, तो पृथ्वी पर प्रकाश और ऊर्जा का संतुलन बदलता है, जिसे आधुनिक विज्ञान भी आज उत्तरायण और दक्षिणायن के रूप में पूरी तरह से प्रमाणित कर चुका है। प्राचीन आचार्यों ने इस खगोलीय प्रक्रिया को बहुत ही सरल भाषा में आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए कुम्हार के चाक का यह रूपक दिया था ताकि हर कोई यह समझ सके कि यह पूरा संसार एक अदृश्य और सुव्यवस्थित नियम के तहत बंधा हुआ है।
गर्मी, सर्दी, बरसात, बसंत और शरद जैसी विभिन्न ऋतुओं का समय पर आना और जाना इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि प्रकृति अपने निर्धारित नियमों के अनुसार कितनी अनुशासित है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, कुम्हार के चाक की गति की तरह ही यह ऋतुचक्र भी निरंतर घूमता रहता है, जहाँ एक ऋतु के समाप्त होते ही दूसरी ऋतु का प्रवेश उसी चाक के अगले हिस्से की तरह सामने आ जाता है। जब चाक घूमता है तो उसके अलग-अलग हिस्से पर अलग-अलग आकृतियां बनती हैं, ठीक उसी तरह इस ऋतुचक्र के बदलने से पृथ्वी पर कभी फसलें लहलहाती हैं, कभी नदियां उफनती हैं तो कभी पतझड़ के बाद नए पत्तों का सृजन होता है। हमारे जीवन का पूरा चक्र भी इसी प्रकृति के साथ जुड़ा हुआ है, और यदि मनुष्य इस ब्रह्मांडीय लय को समझ ले तो वह अपने जीवन को और अधिक संतुलित तथा आनंदमय बना सकता है। प्राचीन ऋषियों का यह ज्ञान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से खगोल विज्ञान (Astronomy) और मौसम विज्ञान (Meteorology) का एक अनमोल खजाना है।
आज के इस वैज्ञानिक युग में जब इंसान अंतरिक्ष की गहराइयों को टटोलने और ब्लैक होल के रहस्यों को जानने की कोशिश कर रहा है, तब प्राचीन ग्रंथों में छिपे इन वैज्ञानिक सत्यों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। आधुनिक खगोलविदों ने यह मान लिया है कि हमारे पूर्वजों ने बिना किसी आधुनिक टेलीस्कोप के केवल अपनी सूक्ष्म दृष्टि और ध्यान की शक्ति से ब्रह्मांड की गतियों का जो आकलन किया था, वह आज केMathematical models के बिल्कुल करीब बैठता है। श्रीमद्भागवत पुराण में दिए गए इन प्रतीकों और रहस्यों को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना बेहद जरूरी है ताकि वे यह जान सकें कि हमारी सनातन संस्कृति अवैज्ञानिक नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे गहरे सत्यों को बहुत पहले ही उजागर कर चुकी है। जब हम कुम्हार के चाक के इस दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को गहराई से समझते हैं, तो हमें यह अहसास होता है कि हमारे ग्रंथ केवल धर्म की किताबें नहीं हैं, बल्कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड के विज्ञान का एक मुकम्मल दस्तावेज हैं जो हर युग में मानवता को सही दिशा दिखाते रहेंगे।
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