13वीं सदी के अमीर खुसरो की कविता से सजा लता-आशा का यह सदाबहार गीत, बृजभाषा के इस मास्टरपीस को पूरे हुए 48 साल

भारतीय संगीत जगत में कुछ ऐसी धुनें और आवाजें होती हैं, जो समय की सीमाओं से परे जाकर अमर हो जाती हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे गाने बने हैं जिन्होंने अपनी सुरीली गायिकी और बेहतरीन रचना के बल पर पीढ़ियों का दिल जीता है। ऐसा ही एक आइकॉनिक और कल्ट क्लासिक गीत ‘छाप तिलक सब छीनी रे तोसे नैना मिलाइके…’ है, जिसे महान गायिका लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) और उनकी बहन आशा भोसले (Asha Bhosle) ने अपनी जादुई आवाजों से सजाया था। अपनी स्थापना के 48 साल बीत जाने के बाद भी यह गाना आज उतना ही ताजा और लोकप्रिय है, जितना अपने रिलीज के वक्त था। आइए जानते हैं इस सदाबहार गीत के इतिहास और उससे जुड़ी दिलचस्प कहानियों के बारे में।

13वीं सदी के महान कवि अमीर खुसरो की रचना से प्रेरित है गीत

बहुत कम लोग जानते हैं कि इस खूबसूरत गाने की जड़ें आधुनिक युग से बहुत पुरानी हैं। इस गीत के बोल मूल रूप से 13वीं सदी के सबसे प्रसिद्ध सूफी संत, संगीतकार, विद्वान और कवि अमीर खुसरो (Amir Khusro) द्वारा लिखे गए थे। अमीर खुसरो ने सूफी परंपरा और प्रेम के रंग में रंगी यह रचना अपने आध्यात्मिक गुरु हजरत निजामुद्दीन औलिया के प्रति प्रेम और समर्पण भाव व्यक्त करने के लिए लिखी थी।

सदियों पुरानी इस कालजयी कविता को जब हिंदी सिनेमा के पटल पर उतारा गया, तो इसने इतिहास रच दिया। बृजभाषा (Braj Bhasha) में रचे गए इन शब्दों की मिठास और गहराई ने हर सुनने वाले को मंत्रमुग्ध कर दिया। सदियों पुरानी यह लोक शैली आज भी इस गाने के माध्यम से लोगों की जुबान पर जिंदा है।

48 साल पहले फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ में हुआ था इस्तेमाल

यह जादुई गीत 70 के दशक की बेहद लोकप्रिय और सुपरहिट फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (Main Tulsi Tere Aangan Ki) का हिस्सा है। साल 1978 में रिलीज हुई इस फिल्म का निर्देशन राज खोसला और सुदेश इस्सर ने संयुक्त रूप से किया था। फिल्म में नूतन, विनोद खन्ना, आशा पारेख, विजय आनंद और देब मुखर्जी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अपने शानदार अभिनय से चार चांद लगाए थे।

फिल्म के सभी गाने अपने आप में बेहतरीन थे, लेकिन ‘छाप तिलक सब छीनी रे’ ने दर्शकों के दिलों पर जो गहरी छाप छोड़ी, वह आज भी बरकरार है। इस साल इस फिल्म और इस गाने को रिलीज हुए पूरे 48 साल हो चुके हैं, लेकिन इसकी लोकप्रियता में जरा भी कमी नहीं आई है।

लता मंगेशकर और आशा भोसले की सुरीली जुगलबंदी

इस गीत को अमर बनाने में भारत की दो सबसे बड़ी कोकिलाओं—लता मंगेशकर और आशा भोसले की गायिकी का सबसे बड़ा योगदान रहा है। संगीत जगत की इन दोनों दिग्गज बहनों ने जब एक साथ इस बृजभाषा गीत को अपनी आवाज दी, तो यह संगीत प्रेमियों के लिए एक अमूल्य तोहफा बन गया।

इस बेहतरीन गीत को प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल (Laxmikant-Pyarelal) ने अपने शानदार और रूहानी संगीत से सजाया था। लोक संगीत की मिठास और शास्त्रीय संगीत की बारीकियों का ऐसा संगम शायद ही किसी अन्य गाने में देखने को मिले। दोनों बहनों की सुरों की जुगलबंदी ने इस गाने को एक ऐसा आयाम दिया जो आज भी संगीत के छात्रों और प्रेमियों के लिए किसी मास्टरक्लास से कम नहीं है।

पाकिस्तान और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बन चुके हैं कई रीमेक

इस गाने की लोकप्रियता सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सरहद पार भी इसे उतना ही प्यार मिला है। पिछले चार दशकों में इस खूबसूरत गीत पर कई आधुनिक रीमेक और वर्जन बनाए जा चुके हैं। लोकप्रिय पाकिस्तानी संगीत मंच ‘कोक स्टूडियो’ (Coke Studio) के सातवें सीजन में प्रसिद्ध गायक राहत फतेह अली खान ने भी इस गीत को अपने अंदाज में गाकर श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया था।

इसके अलावा, हालिया फिल्मों और विभिन्न म्यूजिक एल्बमों में भी इस धुन का इस्तेमाल किया गया है। हालांकि, आधुनिक तकनीक और नए दौर के रीमेक आने के बाद भी मूल गीत की आत्मा—जो लता और आशा की आवाजों में बसती है—उसका मुकाबला कोई नहीं कर पाया है। यह गाना आज भी इस बात का प्रमाण है कि सच्चा और शुद्ध संगीत कभी पुराना नहीं होता।