
भारतीय कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा माने जाने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून को लेकर हर साल मौसम वैज्ञानिकों और किसानों की नजर प्रशांत महासागर की हलचलों पर टिकी होती है। हाल के दिनों में अल नीनो (El Nino) की संभावित सक्रियता और उससे देश में 70% तक सूखे का खतरा बढ़ने से जुड़े दावों ने किसानों और आम नागरिकों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, मौसम विज्ञान के वास्तविक सिद्धांतों और आधिकारिक पूर्वानुमानों को देखने पर स्थिति उतनी भयावह नहीं है जितनी सोशल मीडिया पर चित्रित की जा रही है।
अल नीनो क्या है और इसका भारतीय मानसून से क्या संबंध है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी की मौसमी परिघटना है। जब समुद्र की सतह गर्म होती है, तो यह वैश्विक वायु परिसंचरण तंत्र (Atmospheric Circulation) को प्रभावित करती है।
ऐतिहासिक आंकड़ों के मुताबिक, जब भी तीव्र अल नीनो विकसित होता है, तो भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जाती है। लेकिन इसका यह कतई मतलब नहीं है कि हर अल नीनो वर्ष सूखे या भुखमरी में ही तब्दील होगा।
क्या अल नीनो का मतलब हमेशा सूखा ही होता है?
मौसम विज्ञानियों के अनुसार, अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच का संबंध एकतरफा नहीं है:
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इंडियन ओशन डिपोल (IOD): हिंद महासागर में बनने वाला ‘पॉजिटिव आईओडी’ (Positive IOD) अक्सर अल नीनो के नकारात्मक असर को पूरी तरह बेअसर कर देता है और देश में पर्याप्त बारिश सुनिश्चित करता है।
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ऐतिहासिक आंकड़े: पिछले 140 वर्षों के डेटा बताते हैं कि कई अल नीनो वर्षों में भारत में सामान्य और सामान्य से अधिक वर्षा भी दर्ज की गई है।
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स्थानिक वितरण (Spatial Distribution): मानसून का प्रभाव पूरे देश में एक समान नहीं होता; यदि किसी एक हिस्से में बारिश की कमी होती है, तो दूसरे तटीय व पूर्वोत्तर इलाकों में प्रचुर वर्षा होती है।
कृषि क्षेत्र पर प्रभाव और सरकार की पूर्व-तैयारियां
खरीफ सीजन की मुख्य फसलें जैसे धान, सोयाबीन, मक्का, कपास और दलहन सीधे तौर पर मानसूनी बारिश पर निर्भर करती हैं। किसी भी संभावित मौसमी बदलाव से निपटने के लिए कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) पहले से ही जलवायु-अनुकूल (Climate-Resilient) बीजों और कम पानी वाली फसलों की बुवाई के लिए दिशा-निर्देश जारी करते हैं।
इसके अलावा, देश के प्रमुख जलाशयों (Reservoirs) में जल भंडारण स्तर और विस्तारित सिंचाई नेटवर्क के कारण अब भारतीय कृषि मौसमी अनिश्चितताओं से निपटने में पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्षम और मजबूत है।
मौसम विभाग (IMD) की सलाह और सतर्कता
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने स्पष्ट किया है कि लंबी अवधि के पूर्वानुमानों (Long-Range Forecasts) को नियमित अंतराल पर अपडेट किया जाता है। किसानों को सोशल मीडिया पर फैलाई जाने वाली सनसनीखेज खबरों और अफवाहों पर ध्यान देने के बजाय आईएमडी के आधिकारिक बुलेटिन और ‘मेघदूत’ व ‘दामिनी’ जैसे सरकारी मौसम ऐप्स पर मिलने वाली स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर ही बुवाई और सिंचाई की योजना बनानी चाहिए।
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