
हिमालय को धरती का ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और अनियंत्रित इंसानी हस्तक्षेप के कारण यह खूबसूरत पर्वत श्रृंखला अब एक गंभीर पर्यावरणीय और भूगर्भीय संकट के मुहाने पर खड़ी है। ऊंचे पर्वतीय इलाकों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और भारी भूस्खलन (लैंडस्लाइड) के कारण नदियों के प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो रहे हैं। जब सैकड़ों टन वजनी मलबा, विशाल चट्टानें और बर्फ संकरी घाटियों में गिरते हैं, तो वे बहते पानी को रोककर एक कच्चा प्राकृतिक बांध बना देते हैं, जिसके पीछे लाखों-करोड़ों लीटर पानी का अथाह भंडार इकट्ठा हो जाता है। वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार, ये अस्थाई झीलें पहाड़ों के लिए किसी टिक-टिक करते ‘वाटर बम’ से कम नहीं हैं।
भू-विज्ञान की भाषा में इस परिघटना को मुख्य रूप से दो रूपों में समझा जाता है:
-
ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF): जब ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियर पिघलकर पीछे हटते हैं, तो अपने पीछे मिट्टी, बोल्डर और चट्टानी मलबे का एक ऊंचा ढेर छोड़ देते हैं, जिसे ‘मोरेन’ (Moraine) कहा जाता है। इस मोरेन के पीछे पिघली हुई बर्फ का पानी भरकर एक प्रोग्लेशियल झील बना लेता है। जब यह कच्ची मोरेन दीवार पानी के भारी दबाव, भूकंप के झटके या हिमस्खलन के कारण टूटती है, तो लाखों क्यूसेक पानी प्रचंड वेग से नीचे उतरता है।
-
लैंडस्लाइड डैम्ड लेक (अस्थाई भूस्खलन झील): बारिश या सिस्मिक हलचल के कारण जब पूरी की पूरी पहाड़ी ढहकर नदी के प्रवाह को पूरी तरह बंद कर देती है, तो नदी का पानी वहीं ठहर जाता है। यह मिट्टी और पत्थरों से बना बांध कोई पक्का स्ट्रक्चर नहीं होता। पानी का दबाव बढ़ते ही यह बांध पलक झपकते ही ध्वस्त हो जाता है और तबाही का सैलाब ले आता है।
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी और इसरो (ISRO) के हालिया उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, पूरे हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में 24,400 से अधिक हिमनदीय और सुप्राग्लेशियल झीलों की मैपिंग की गई है। इनमें से 10,000 से अधिक झीलें 0.01 वर्ग किलोमीटर से बड़े क्षेत्रफल में फैली हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 221 झीलें बेहद खतरनाक और अस्थिर श्रेणी (High-Risk GLOF Threat) में रखी गई हैं। इनमें कोसी बेसिन, तीस्ता बेसिन, चेनाब, झेलम, ब्यास और मानस बेसिन की झीलें शामिल हैं, जहां थोड़ा सा भी विचलन नीचे स्थित बस्तियों को पूरी तरह जलमग्न कर सकता है।
अस्थाई झीलों के टूटने पर आने वाली बाढ़ सामान्य बाढ़ की तुलना में 100 गुना अधिक विनाशकारी होती है। ऊंचाई और तीव्र ढलान (Steep Gradient) के कारण पानी की गति 50 से 80 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच जाती है। यह बहाव अपने साथ विशालकाय चट्टानें, पेड़, रेत और गाद (Debris Flow) बहाकर लाता है। यह भारी मलबा कंक्रीट के बड़े-बड़े पुलों, पक्के मकानों, सड़कों और सुरंगों को तिनके की तरह बहा ले जाता है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी, 2021 की चमोली ऋषिगंगा आपदा और 2023 की सिक्किम साउथ ल्होनाक झील का टूटना इस भयावहता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
नदी घाटियों में बनी जलविद्युत परियोजनाएं (Hydroelectric Dams), राजमार्ग, रेलवे नेटवर्क और घनी रिहायशी बस्तियां सीधे इन झीलों के फ्लैश फ्लड के निशाने पर हैं। संकीर्ण घाटियों में जब पानी अचानक 30 से 40 फीट तक ऊपर उठता है, तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भागने के लिए 5 से 10 मिनट का समय भी नहीं मिल पाता। न केवल पहाड़ी राज्य जैसे उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और सिक्किम, बल्कि नेपाल से बहकर आने वाली नदियों के जरिए बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके भी इस अनियंत्रित जलप्रलय के सीधे खतरे में आ जाते हैं।
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि प्रकृति के इस ‘डेथ ट्रैप’ से बचने के लिए त्वरित और दीर्घकालिक नीतिगत कदम उठाने होंगे:
-
सैटेलाइट रियल-टाइम मॉनिटरिंग: संवेदनशील झीलों के जलस्तर और मोरेन बांधों की 24×7 उपग्रह और ड्रोन से निगरानी।
-
अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS): नदियों के ऊपरी हिस्सों में ऑटोमैटिक सेंसर और सायरन लगाना, जो पानी का स्तर अचानक बढ़ते ही निचली बस्तियों को तत्काल अलर्ट भेज सकें।
-
नियंत्रित जल निकासी (Siphoning): अत्यधिक खतरनाक हो चुकी झीलों से बड़े पाइपों और पंपों के जरिए पानी का स्तर खतरे के निशान से नीचे रखना।
-
संवेदनशील जोनिंग: उच्च जोखिम वाले फ्लड प्लेन एरिया में भारी निर्माण, अनियोजित ब्लास्टिंग और अंधाधुंध होटल-रिसॉर्ट निर्माण पर सख्त कानूनी रोक।
Focus Times – Focus Times, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया