नेपाल आपदा के बाद भारत ने बढ़ाई हिमालय पर निगरानी, उत्तराखंड के ग्लेशियरों और झीलों पर विशेष नजर

नेपाल और तिब्बत की सीमा पर हाल ही में घटी भीषण प्राकृतिक आपदा और ग्लेशियर धंसने की भयावह घटना के बाद भारत ने कड़े सुरक्षात्मक कदम उठाए हैं। इस बड़े हादसे से सबक लेते हुए भारत सरकार और पड़ोसी पर्वतीय राज्यों ने चीन तथा नेपाल से लगते अपने संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में निगरानी तंत्र को बेहद मजबूत कर दिया है। अधिकारियों ने शनिवार को इस बात की पुष्टि की कि सीमावर्ती पर्वतीय इलाकों में स्थित सभी महत्वपूर्ण ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों (Glacial Lakes) की अब विशेष और सतत निगरानी की जाएगी, ताकि किसी भी संभावित खतरे को समय रहते भांपा जा सके।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) की ओर से जारी शुरुआती और विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, 26 अगस्त को तिब्बत-नेपाल सीमा पर जो विनाशकारी आपदा आई थी, वह असल में एक विशाल ग्लेशियर के अचानक ध्वस्त होने से पैदा हुई थी। इस भयानक घटना के बाद अचानक भारी मात्रा में पानी, कीचड़ और चट्टानों का एक महाकाय प्रवाह नीचे की मैदानी और घाटी वाले इलाकों की तरफ बढ़ा, जिसने रास्ते में आने वाले गांवों और कस्बों को नेस्तनाबूद कर दिया। आधिकारिक और उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस अप्रत्याशित आपदा में अब तक 633 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि लगभग 3,000 लोग अभी भी लापता बताए जा रहे हैं, जिनकी तलाश में राहत एजेंसियां जुटी हुई हैं।

भारत के सबसे खूबसूरत और भौगोलिक रूप से संवेदनशील हिमालयी राज्यों में शुमार उत्तराखंड ने नेपाल की इस त्रासदी के बाद तुरंत कड़े कदम उठाए हैं। उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने प्रमुख समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत करते हुए स्पष्ट किया कि नेपाल के साथ हमारी साझा सीमा और लगभग एक जैसी चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए राज्य सरकार ने एहतियातन निगरानी बढ़ाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। उन्होंने दो-टूक कहा कि चूंकि हमारी भौगोलिक स्थिति काफी हद तक नेपाल से मिलती-जुलती है, इसलिए हमने अपने आपदा प्रबंधन और संबंधित विभागों को क्षेत्र के सभी सक्रिय ग्लेशियरों और खतरनाक हिमनदीय झीलों की बारीक निगरानी करने के कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं। राज्य की प्रशासनिक और राहत टीमों को पूरी तरह सतर्क रहने और मौसम तथा भू-गर्भीय गतिविधियों पर लगातार नजर रखने को कहा गया है, ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति की पहचान शुरुआती चरण में ही करके जनजीवन को सुरक्षित बचाया जा सके।

विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों के अनुसार, उत्तराखंड भारत के सबसे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील (Ecologically Sensitive) क्षेत्रों में प्रमुख स्थान रखता है। सरकारी आंकड़ों और वैज्ञानिक सर्वेक्षणों के मुताबिक, अकेले इस पर्वतीय राज्य में करीब 1,266 हिमनदीय झीलें मौजूद हैं, जो समय के साथ और वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण लगातार बदल रही हैं। देश-विदेश के वैज्ञानिक और पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि पूरा हिमालयी क्षेत्र ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। हिमालय के ये विशाल ग्लेशियर, जो एशिया की प्रमुख नदियों के स्रोत हैं और लगभग दो अरब लोगों को जीवनदायिनी पानी उपलब्ध कराते हैं, अब इतिहास की तुलना में कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। इसके चलते पर्वतीय समुदायों और बस्तियों के सिर पर हमेशा एक बड़ी प्राकृतिक आपदा का तलवार लटकती रहती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान के कारण केवल ग्लेशियर ही नहीं पिघल रहे, बल्कि पहाड़ों की चट्टानों के भीतर सदियों से स्थायी रूप से जमी बर्फ यानी पर्माफ्रॉस्ट (Permafrost) भी पिघल रही है। पर्माफ्रॉस्ट के पिघलने से पर्वतीय ढलानों की अंदरूनी स्थिरता और पकड़ बेहद कमजोर हो जाती है, जिससे अचानक बड़े पैमाने पर भूस्खलन (Landslides) और चट्टानें खिसकने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। इस तरह की भौगोलिक उथल-पुथल किसी भी समय भारी तबाही का कारण बन सकती है, और नेपाल की घटना इसका सबसे ताज़ा और दर्दनाक उदाहरण है।

इस बीच, दुनिया भर के वैज्ञानिक नेपाल-तिब्बत आपदा के सटीक और संभावित कारणों का गहराई से अध्ययन करने में जुटे हैं। एएफपी से बातचीत करते हुए कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस प्रकार की भयावह घटनाएं भविष्य में अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी दोहराई जा सकती हैं। न्यूजीलैंड के प्रतिष्ठित जीएनएस साइंस शोध संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक साइमन कॉक्स ने स्पष्ट किया कि जब पहाड़ का कोई विशाल हिस्सा अचानक भरभरा कर गिर जाता है, तो उसके आसपास के भू-भाग भी अस्थिर हो जाते हैं। उनके अनुसार, इस तरह की प्रक्रिया से उसी क्षेत्र में दोबारा बड़े पैमाने पर ध्वंस या हिमस्खलन की आशंका हमेशा बनी रहती है।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) का यह भी कहना है कि नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुआ ग्लेशियर का यह ध्वंस इतना अधिक शक्तिशाली था कि उससे निकलने वाली ऊर्जा रिक्टर पैमाने पर लगभग 5.2 तीव्रता के एक जोरदार भूकंप के बराबर आंकी गई, जिसके झटकों और कंपन के कारण क्षेत्र में कई क्रमिक भूस्खलन दर्ज किए गए। फ्रांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र (CNRS) के प्रमुख ग्लेशियर विशेषज्ञ एतियां बेर्तिये ने भी इस बात की पुष्टि की है कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि हिमालय क्षेत्र की जटिल और युवा भूगर्भीय बनावट इन आपदाओं के प्रभाव को और अधिक व्यापक बना देती है।

कार्डिफ विश्वविद्यालय के पर्यावरणीय जोखिम और आपदा विशेषज्ञ ट्रिस्ट्रम हेल्स ने आंकड़े साझा करते हुए बताया कि पिछले एक दशक के दौरान दुनियाभर के पर्वतीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है, और उन्होंने इसके लिए हिमालय के साथ-साथ स्विट्जरलैंड जैसे यूरोपीय क्षेत्रों का भी उदाहरण दिया। हालांकि, इन सबके बावजूद कई जाने-माने वैज्ञानिकों ने इस विशेष आपदा को सीधे तौर पर जल्दबाजी में जलवायु परिवर्तन से जोड़ने को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है।

एकीकृत पर्वतीय विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय केंद्र (ICIMOD) ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि जलवायु परिवर्तन हिमालयी ग्लेशियरों, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और पर्वतीय ढलानों के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना अभी बहुत जल्दबाजी होगी कि इस विशेष घटना में केवल ग्लोबल वार्मिंग की क्या भूमिका रही। विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे मामले पर पुख्ता मुहर लगाने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अनुसंधान और वैज्ञानिक भाषा में तथाकथित “एट्रिब्यूशन स्टडी” (Attribution Study) की आवश्यकता है, जिसके पूरा होने के बाद ही जलवायु परिवर्तन और इस विशिष्ट आपदा के बीच के प्रत्यक्ष और वैज्ञानिक संबंधों पर ठोस निष्कर्ष निकाला जा सकेगा। तब तक भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए यही बुद्धिमत्ता है कि वे अपनी निगरानी प्रणालियों को अत्याधुनिक और चौकस रखें।