ट्रंप का ईरान के खर्ग द्वीप पर तबाही का बड़ा दावा, होर्मुज जलडमरूमध्य के पास भड़का अमेरिका-ईरान तनाव

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भू-राजनीतिक मोर्चे पर एक बार फिर मध्य पूर्व (Middle East) से बड़ी और तनावपूर्ण खबरें सामने आ रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण खर्ग द्वीप को लेकर किए गए एक बड़े दावे ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। ट्रंप के इस दावे के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से सुलग रहा तनाव एक बार फिर से भड़क उठा है। इस ताजा घटनाक्रम ने न केवल खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्था को खतरे में डाल दिया है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों और कच्चे तेल की कीमतों में भी भारी उथल-पुथल मचा दी है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट शेयर करते हुए दावा किया कि ईरान का प्रमुख खर्ग द्वीप धुएं में उड़ाया जा रहा है और उसे पूरी तरह तबाह कर दिया गया है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि खर्ग फारस की खाड़ी (Persian Gulf) में ईरान का मुख्य तेल-निर्यात केंद्र और देश की आर्थिक रीढ़ माना जाता है। हालांकि, रक्षा और तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप द्वारा शेयर किया गया यह वीडियो क्लिप वास्तविक लाइव स्ट्राइक का फुटेज न होकर एआई-जनरेटेड (AI-generated) प्रतीत होता है। इसके बावजूद, ट्रंप पिछले कई महीनों से खर्ग द्वीप को लगातार धमकियां देते रहे हैं और उनका यहतर्क रहा है कि अमेरिकी बलों ने पहले भी वहां की तेल सुविधाओं को आंशिक रूप से बख्शते हुए विशिष्ट सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है।

यह पूरा तनाव तब और अधिक गहरा गया जब अमेरिकी सेना ने लारक द्वीप (Larak Island) पर एक सुनियोजित हमला किया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस सैन्य कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के उन जवानों को रोकना था जो होर्मुज स्ट्रेट में खतरनाक समुद्री माइंस (Sea Mines) बिछाने की तैयारी कर रहे थे। अमेरिकी सेना का दावा है कि ये रॉकेट लॉन्चर और माइंस अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और नौवहन के लिए बड़ा खतरा बन सकते थे। इस अमेरिकी हमले के परिणामस्वरूप कई ईरानी सैनिकों और नागरिकों के हताहत होने की खबरें सामने आईं, जिसके जवाब में ईरान ने भी आक्रामक रुख अपनाते हुए जॉर्डन में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागकर अपनी नाराजगी जाहिर की।

खर्ग द्वीप को अक्सर भू-राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा ईरान का ‘काला खजाना’ कहा जाता है, क्योंकि यह देश के पेट्रोलियम उद्योग का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण टर्मिनल है। उत्तरी फारस की खाड़ी में स्थित यह छोटा सा प्रवाल द्वीप (Coral Island) मुख्य ईरानी तट से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर और सामरिक रूप से संवेदनशील स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग 483 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है। महज 6 किलोमीटर की लंबाई वाले इस द्वीप से ईरान के कुल कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों में भेजा जाता है। यही कारण है कि इसे ईरान के तेल उद्योग की असली जीवनरेखा और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के लिए राजस्व का सबसे बड़ा प्राथमिक स्रोत माना जाता है।

खर्ग द्वीप के सामरिक महत्व का दायरा केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध वैश्विक महाशक्ति चीन से भी जुड़ा हुआ है। इस द्वीप से निर्यात होने वाले भारी मात्रा में कच्चे तेल का सबसे बड़ा और प्रमुख खरीदार चीन है। इस तेल व्यापार के जरिए ईरान को न केवल अपनी अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए भारी-भरकम वित्तीय राजस्व प्राप्त होता है, बल्कि पश्चिमी देशों के कड़े प्रतिबंधों के बीच एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में चीन का मजबूत कूटनीतिक और रणनीतिक साथ भी मिलता है। ऐसे में, यदि अमेरिका या उसके सहयोगी दल खर्ग द्वीप की तेल सुविधाओं पर कोई बड़ा सैन्य हमला करते हैं, तो इससे चीन का नाराज होना स्वाभाविक है, जो इस पूरे क्षेत्रीय संघर्ष को एक बड़े वैश्विक शीत युद्ध में बदल सकता है।

सैन्य संघर्ष और तनाव के इस माहौल का सबसे पहला और सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ा है। अमेरिकी हमले और उसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया सामने आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भयंकर उछाल दर्ज किया गया। सोमवार को बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतें उछलकर 90.3 डॉलर प्रति बैरल के आंकड़े को पार कर गईं, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड (WTI Crude) भी बढ़कर 84.98 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंचा। इसके अलावा, भारत जैसे विकासशील देशों के लिए प्रासंगिक मानी जाने वाली इंडियन बास्केट में भी कच्चे तेल की कीमतें चढ़कर 89.52 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। तेल की बढ़ती कीमतों ने दुनिया भर के देशों में महंगाई का खतरा एक बार फिर बढ़ा दिया है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव गहराता जा रहा है।