
सनातन संस्कृति और हमारे प्राचीन भारतीय गृह निर्माण और जीवन शैली में वास्तु शास्त्र (Vastu Shastra) का बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण स्थान माना गया है, जिसमें घर के हर एक कोने और विशेषकर पूजा घर की बनावट को लेकर बेहद सख्त नियम बताए गए हैं। अक्सर लोग अनजाने में या केवल सजावट के चक्कर में अपने घर के मंदिर या पूजा रूम में भगवान की मूर्तियों और तस्वीरों को इस तरह से स्थापित कर देते हैं कि उनका मुख एक-दूसरे के बिल्कुल सामने यानी आमने-सामने आ जाता है। प्रसिद्ध वास्तु गुरुओं और ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार, पूजा घर में कभी भी देवी-देवताओं की मूर्तियों को आमने-सामने भूलकर भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि इसके पीछे बहुत ही गहरे नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव जुड़े होते हैं। जब भगवान की प्रतिमाएं एक-दूसरे की ओर मुख करके रखी जाती हैं, तो उससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का टकराव (Energy Clash) होता है, जिससे घर का सूक्ष्म वातावरण प्रभावित होता है और पारिवारिक जीवन में बिना वजह के तनाव, कलह और अशांति के बादल मंडराने लगते हैं। इसलिए घर की सुख-शांति और सकारात्मक माहौल को बनाए रखने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि हम मंदिर की सजावट करते समय इन बुनियादी वास्तु नियमों का पूरी निष्ठा के साथ पालन करें।
घर का मंदिर वह पवित्र स्थान होता है जहाँ बैठकर व्यक्ति अपने पूरे दिन की थकान और मानसिक चिंताओं को भुलाकर ईश्वर से जुड़ता है, इसलिए इस स्थान की ऊर्जा हमेशा शांत, पवित्र और सकारात्मक होनी चाहिए। वास्तु के नियमों के मुताबिक, पूजा घर में कभी भी भगवान की बहुत बड़ी या भारी मूर्तियां स्थापित नहीं करनी चाहिए, और यदि घर में मूर्तियां रखी भी गई हैं, तो उनकी ऊंचाई अंगूठे के पोर यानी लगभग 6 इंच से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इसके अलावा, कभी भी गणेश जी, हनुमान जी या माता दुर्गा की उग्र या बैठी हुई ऐसी मुद्राएं जिनमें वे क्रोध में हों, घर के मंदिर में नहीं रखनी चाहिए; हमेशा शांत, सौम्य और मुस्कुराते हुए स्वरूप की प्रतिमाएं ही पूजनीय मानी जाती हैं। मंदिर का स्थान हमेशा घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा में होना सबसे उत्तम माना जाता है, क्योंकि यह दिशा देवताओं की दिशा मानी जाती है और इस ओर मुख करके पूजा करने से व्यक्ति की एकाग्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा में जबरदस्त वृद्धि होती है। पूजा घर कभी भी शौचालय या बाथरूम के ठीक बगल में या उसके ऊपर-नीचे नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे घर में भारी वास्तु दोष उत्पन्न हो जाता है।
जब हम पूजा घर में देवी-देवताओं की तस्वीरें या मूर्तियां स्थापित करते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह ध्यान रखनी होती है कि भगवान की दृष्टि किस दिशा में पड़ रही है और वे किस ओर मुख करके बैठे हैं। वास्तु गुरुओं का यह स्पष्ट निर्देश होता है कि पूजा करते समय व्यक्ति का मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए, जिसका अर्थ है कि भगवान की मूर्तियां पश्चिम या दक्षिण दिशा की दीवार पर इस प्रकार स्थापित की जानी चाहिए कि उनका मुख पूर्व या उत्तर की तरफ रहे। कभी भी किसी भी देवता की पीठ (Back) मुख्य दरवाजे की तरफ नहीं होनी चाहिए और न ही भगवान की मूर्ति की पीठ के दर्शन पूजा करने वाले को होने चाहिए, क्योंकि भगवान की पीठ के दर्शन करना अशुभ माना जाता है। मूर्तियों को हमेशा दीवार से कम से कम एक या दो इंच की दूरी पर रखना चाहिए ताकि उनके चारों तरफ हवा और ऊर्जा का प्रवाह सुचारू रूप से बना रहे। इन छोटी-छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बातों की अनदेखी करने से घर में बरकत रुक जाती है और सदस्यों की तरक्की में बार-बार बाधाएं आने लगती हैं।
वास्तु शास्त्र केवल कुछ दीवारों और सामानों को सेट करने का विज्ञान नहीं है, बल्कि यह हमारे आसपास की प्रकृति और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं के बीच एक खूबसूरत तालमेल बिठाने का प्राचीन जरिया है। जब हम अपने घर के पूजा स्थल को पूरी तरह से वास्तु के नियमों के अनुसार सजाते हैं—जैसे कि दीप प्रज्वलित करने का सही स्थान, घंटियों और शंख की सही दिशा, और मूर्तियों का उचित विन्यास—तो पूरे घर में एक दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। सुबह और शाम के समय जब परिवार के सभी सदस्य एक शांत और अनुशासित पूजा रूम में बैठकर प्रार्थना करते हैं, तो उससे मिलने वाली मानसिक शांति और आत्मीय बल अमूल्य होता है। इसलिए, यदि आपके भी घर के मंदिर में भगवान की मूर्तियां आमने-सामने रखी हैं या अन्य कोई वास्तु दोष है, तो किसी योग्य वास्तु गुरु की सलाह लेकर उन्हें तुरंत ठीक कर लें ताकि आपके घर में हमेशा सुख, शांति, वैभव और मां लक्ष्मी का वास बना रहे।
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