
वैश्विक जलवायु परिवर्तन और लगातार गर्म होती धरती को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने अब तक की सबसे गंभीर, चौंकाने वाली और भयावह चेतावनी जारी की है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा जारी की गई नई वैज्ञानिक रिपोर्ट ‘लिमिटिंग ओवरशूट’ (Limiting Overshoot) ने स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया अब उस खतरनाक दहलीज को पार करने जा रही है, जिससे बचने के लिए पिछले एक दशक से तमाम अंतरराष्ट्रीय संधियां की जा रही थीं। रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व-औद्योगिक काल (Pre-industrial levels) की तुलना में वैश्विक औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी की सीमा को पार करना (Overshoot) अब लगभग ‘अपरिहार्य’ (Unavoidable) हो चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि सभी देश अपनी मौजूदा कार्बन कटौती की प्रतिबद्धताओं और ‘नेट-जीरो’ लक्ष्यों को पूरी ईमानदारी से लागू भी कर दें, तब भी एक आशावादी परिदृश्य (Optimistic Scenario) में इस सदी के मध्य तक वैश्विक तापमान औसतन 1.8 डिग्री सेल्सियस के शिखर तक पहुंच सकता है। यूएनईपी के एडेप्टेशन एंड रेजिलिएंस विंग की प्रमुख और रिपोर्ट की समन्वयक माइरे अताल्लाह (Mirey Atallah) ने साफ कहा है कि अब दुनिया के नीति-निर्माताओं को अपनी मानसिकता बदलनी होगी—अब चुनौती यह नहीं है कि हम 1.5 डिग्री के नीचे कैसे रहें, बल्कि चुनौती यह है कि हम इस सीमा को पार करने के बाद इसे न्यूनतम समय में वापस नीचे कैसे लाएं। यह चेतावनी दर्शाती है कि जलवायु संकट अब कोई भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि हमारे दरवाजे पर खड़ी वर्तमान की हकीकत बन चुका है।
वैश्विक तापमान में होने वाली मात्र दशमलव डिग्री की वृद्धि भी पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और वायुमंडलीय संतुलन में प्रलयंकारी उथल-पुथल मचाने के लिए पर्याप्त है। भौतिकी के बुनियादी नियम के अनुसार, वायुमंडल का तापमान प्रति 1 डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर उसकी नमी सोखने की क्षमता लगभग 7 प्रतिशत बढ़ जाती है। इसका सीधा और घातक परिणाम यह हो रहा है कि बादल असामान्य रूप से भारी हो रहे हैं, जिसके चलते दुनिया भर में बादल फटने (Cloudbursts), अत्यधिक तीव्र वर्षा और अचानक आने वाली फ्लैश फ्लड्स (Flash Floods) की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। जहां कुछ ही घंटों में पूरे महीने भर का पानी बरस जाता है, वहीं दूसरी तरफ जमीन से नमी तेजी से भाप बनकर उड़ने के कारण सूखे (Drought) का संकट गहरा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि यदि तापमान 1.5 डिग्री के ऊपर टिकता है, तो घातक हीटवेव्स (जानलेवा लू) की आवृत्ति 4 से 5 गुना बढ़ जाएगी। मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागरीय क्षेत्र के विशाल इलाके गंभीर जल संकट की चपेट में आ जाएंगे, जहां पीने के पानी के स्रोत पूरी तरह सूख सकते हैं। इसके साथ ही जंगलों की बेकाबू आग (Wildfires) पहले से कहीं अधिक विनाशकारी हो जाएगी, जिससे न केवल अरबों डॉलर की संपत्ति और जैव विविधता राख में तब्दील होगी, बल्कि वायुमंडल में भारी मात्रा में धुआं और कार्बन डाइऑक्साइड घुलकर सांस लेना दूभर कर देंगे।
संयुक्त राष्ट्र की इस नई चेतावनी का सबसे खौफनाक पहलू ‘क्लाइमेट टिपिंग पॉइंट्स’ (Climate Tipping Points) का सक्रिय होना है। टिपिंग पॉइंट वह स्थिति होती है जिसके बाद प्रकृति में होने वाला नुकसान ‘अपरिवर्तनीय’ (Irreversible) हो जाता है, यानी तापमान दोबारा कम होने पर भी उस नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती।
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अमेज़न के वर्षावनों का पतन: धरती के फेफड़े कहे जाने वाले अमेज़न के सघन जंगल अत्यधिक सूखे और तापमान के चलते सूखकर घास के मैदानों (सवाना) में तब्दील हो सकते हैं, जिससे वे कार्बन सोखने के बजाय कार्बन उत्सर्जित करने वाले स्रोत बन जाएंगे।
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पर्माफ्रॉस्ट का पिघलना: आर्कटिक और साइबेरिया के बर्फीले क्षेत्रों में जमीन के भीतर हजारों वर्षों से जमी बर्फ (Permafrost) तेजी से पिघल रही है। इसके पिघलने से उसमें दबी खरबों टन मीथेन गैस वायुमंडल में रिलीज होगी, जो कार्बन डाइऑक्साइड से 28 गुना अधिक खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है।
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समुद्र का जलस्तर और द्वीपों का डूबना: अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की विशालकाय बर्फ की चादरों (Ice Sheets) का अस्थिर होना समुद्र के स्तर को कई मीटर तक बढ़ा सकता है। यूएन ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि कई छोटे द्वीपीय देश (SIDS) और दुनिया के दर्जनों प्रमुख तटीय महानगर समुद्र की लहरों में पूरी तरह समा सकते हैं, जिससे करोड़ों की आबादी बेघर होकर ‘क्लाइमेट रिफ्यूजी’ (जलवायु शरणार्थी) बनने पर मजबूर हो जाएगी।
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कोरल रीफ्स का खात्मा: समुद्र के बढ़ते तापमान और अम्लीकरण (Acidification) के कारण दुनिया की 90 से 99 प्रतिशत मूंगा चट्टानें (Coral Reefs) पूरी तरह नष्ट हो जाएंगी, जिससे समुद्री खाद्य श्रृंखला पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी।
भारत और समूचा दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप जलवायु परिवर्तन के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील और असुरक्षित क्षेत्रों में गिने जाते हैं। 1.5 डिग्री की सीमा टूटने का सीधा असर भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि अर्थव्यवस्था और जनसांख्यिकी पर पड़ेगा:
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हिमालयी ग्लेशियरों का संकट: हिमालय, जिसे पृथ्वी का ‘तीसरा ध्रुव’ (Third Pole) कहा जाता है, वहां के ग्लेशियर रिकॉर्ड गति से पिघल रहे हैं। इसके कारण शुरुआत में गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी बारहमासी नदियों में प्रलयंकारी बाढ़ और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट (GLOF) की आपदाएं आएंगी। इसके कुछ दशकों बाद जब ये ग्लेशियर सिकुड़ जाएंगे, तो इन नदियों में पानी का प्रवाह खतरनाक रूप से कम हो जाएगा, जिससे उत्तर भारत के 50 करोड़ से अधिक लोगों के सामने पेयजल और सिंचाई का अकाल पैदा हो जाएगा।
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अनियमित मानसून और फसलों की बर्बादी: भारत की 60 प्रतिशत से अधिक खेती मानसूनी बारिश पर निर्भर है। तापमान वृद्धि के कारण मानसून का पैटर्न अत्यंत अनिश्चित हो जाएगा—लंबे समय तक सूखा और उसके बाद चंद दिनों में विनाशकारी मूसलाधार बारिश। इससे गेहूं, धान और दलहन की पैदावार में 15 से 25 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है, जिससे देश में खाद्य मुद्रास्फीति और भुखमरी का खतरा गहराएगा।
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‘वेट-बल्ब’ तापमान और जानलेवा गर्मी: भारत के मैदानी और तटीय इलाकों में तापमान और अत्यधिक आर्द्रता का ऐसा जानलेवा मेल (Wet-Bulb Temperature) बन सकता है, जहां मानव शरीर का पसीना सूखना बंद हो जाएगा और बाहर खुले में काम करना असंभव हो जाएगा। इससे निर्माण कार्य, कृषि और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों की आजीविका सीधे तौर पर प्रभावित होगी।
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तटीय शहरों का डूबने का खतरा: 7,500 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा वाले भारत के मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, कोच्चि और सूरत जैसे घनी आबादी वाले आर्थिक केंद्रों पर समुद्र के बढ़ते जलस्तर और बार-बार आने वाले भयंकर चक्रवातों का अस्तित्वगत संकट मंडराने लगेगा।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने दुनिया को चेताया है कि यद्यपि 1.5 डिग्री का तापमान पार होना तय दिख रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि दुनिया हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए। रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि ‘ओवरशूट’ जितना छोटा और जितनी कम अवधि का होगा, धरती को बचाने की संभावनाएं उतनी ही अधिक रहेंगी। 1.6 डिग्री पर तापमान को रोकना 1.8 या 2.0 डिग्री पर जाने देने से कई गुना बेहतर है, क्योंकि तापमान में हर 0.1 डिग्री की अतिरिक्त वृद्धि लाखों जिंदगियों और खरबों डॉलर के नुकसान का फैसला करती है।
इस संकट से निपटने के लिए यूएन ने तीन बुनियादी कदमों को तत्काल लागू करने की मांग की है:
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जीवाश्म ईंधन का तेज फेज-आउट: कोयला, कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस पर सब्सिडी को तुरंत खत्म कर सौर, पवन और हरित ऊर्जा की ओर तेजी से कदम बढ़ाना।
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मीथेन उत्सर्जन पर तत्काल रोक: तेल कुओं, गैस पाइपलाइनों और कृषि अपशिष्टों से निकलने वाली मीथेन गैस पर कड़े प्रतिबंध लगाना, जो अल्पकाल में तापमान को तेजी से कम करने का सबसे असरदार तरीका है।
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वनीकरण और कार्बन कैप्चर तकनीक: वनों की कटाई पर पूर्ण विराम लगाना और वायुमंडल से सीधे कार्बन सोखने वाली तकनीकों (Carbon Dioxide Removal) में भारी वैश्विक निवेश करना।
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) और आगामी वैश्विक जलवायु सम्मेलनों (COP) के एजेंडे में यह नई रिपोर्ट सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बनने जा रही है। विकसित देशों, जो ऐतिहासिक रूप से वैश्विक प्रदूषण के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं, पर गरीब और विकासशील देशों को ‘क्लाइमेट फाइनेंस’ (जलवायु वित्त) और तकनीक हस्तांतरित करने का भारी नैतिक और कानूनी दबाव बन चुका है। यदि विश्व के बड़े औद्योगिक देश अपने अहंकार और आर्थिक स्वार्थों को छोड़कर एकजुट नहीं हुए, तो आने वाले दशकों में प्रकृति का यह बारूदी बदला मानव सभ्यता के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर देगा।
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