
मेक इन इंडिया और वेस्ट टू वेल्थ की तर्ज पर अब पूरी दुनिया में निर्माण कार्यों के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी बदलाव देखने को मिल रहा है। अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर के मैनहट्टन (Manhattan) इलाके में दुनिया की सबसे आधुनिक और पर्यावरण के अनुकूल मानी जाने वाली जेपी मॉर्गन चेज (JPMorgan Chase) की नई 60 मंजिला गगनचुंबी इमारत ने वास्तुकला और विज्ञान की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया है। इस विशालकाय टावर को बनाने में किसी आम निर्माण सामग्री का ही उपयोग नहीं किया गया, बल्कि इसमें पर्यावरण संरक्षण की मिसाल पेश करते हुए करीब 3 करोड़ यानी लगभग 2.9 करोड़ से अधिक बेकार और फेंकी गई कांच की बोतलों का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया है। यह प्रोजेक्ट इस बात का पुख्ता सबूत है कि आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक सोच के जरिए किस तरह कचरे को एक मजबूत और टिकाऊ बुनियादी ढांचे में बदला जा सकता है।
आज के दौर में जब पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है, ऐसे में कंस्ट्रक्शन सेक्टर से निकलने वाला कार्बन उत्सर्जन सबसे बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। पारंपरिक सीमेंट और कंक्रीट के उत्पादन में बड़े पैमाने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस रिलीज होती है जो हमारे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाती है। इस चुनौती से पार पाने के लिए जेपी मॉर्गन के इस नए मुख्यालय (270 पार्क एवेन्यू) के निर्माण में एक अनोखा रास्ता अपनाया गया। इंजीनियरों और आर्किटेक्ट्स ने मिलकर पारंपरिक पोर्टलैंड सीमेंट के विकल्प के रूप में रीसाइक्लिक कांच के बारीक पाउडर यानी ग्राउंड-ग्लास पोज्जोलन (Pozzotive) का उपयोग किया। इस तकनीक के माध्यम से बिल्डिंग के निर्माण में लगने वाले पारंपरिक सीमेंट का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पिसे हुए कांच से रिप्लेस कर दिया गया। ऐसा करने से न सिर्फ हजारों टन खतरनाक कार्बन एमिशन को रोका गया, बल्कि कचरे के रूप में फेंकी जाने वाली बोतलों को भी लैंडफिल में जाने से बचा लिया गया।
आम लोगों के मन में यह सवाल आना लाजिमी है कि क्या कांच से बनी सामग्री किसी इमारत को उतनी मजबूती दे सकती है जितनी पारंपरिक कंक्रीट देती है? इस तकनीकी और वैज्ञानिक पहलू को स्पष्ट करते हुए स्ट्रक्चरल इंजीनियरों ने बताया कि जब रीसाइक्ल्ड कांच के महीन पाउडर को कंक्रीट और पानी के मिश्रण में मिलाया जाता है, तो इसमें एक खास रासायनिक प्रक्रिया शुरू होती है। कांच में मौजूद रिएक्टिव सिलिका कंक्रीट हाइड्रेशन के उपउत्पाद कैल्शियम हाइड्रॉक्साइड के साथ मिलकर कैल्शियम-सिलिकेट-हाइड्रेट का एक सघन और मजबूत नेटवर्क तैयार करती है। यह मुख्य यौगिक कंक्रीट को उसकी अंतिम और असाधारण संपीड़न शक्ति (Compressive Strength) प्रदान करता है। इंजीनियरिंग रिपोर्ट्स के अनुसार, कांच के इस खास मिश्रण का उपयोग करने से न केवल टावर की संरचनात्मक मजबूती कई गुना बढ़ गई, बल्कि कंक्रीट की ड्युरिबिलिटी और नमी रोकने की क्षमता में भी अभूतपूर्व सुधार हुआ है।
इस भव्य 60 मंजिला और करीब 22 लाख वर्ग फीट में फैली कमर्शियल गगनचुंबी इमारत के निर्माण ने पूरी ग्लोबल कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इस प्रोजेक्ट के दौरान पर्यावरण अनुकूल उपायों को अपनाने की वजह से निर्माण कार्य के शुरुआती चरणों में ही 5,000 टन से अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को सीधे तौर पर वातावरण में घुलने से रोका गया। इसके अलावा, इस विशेष कांच-आधारित कंक्रीट का हल्का रंग सामान्य भूरे रंग के कंक्रीट की तुलना में सूर्य की रोशनी को ज्यादा रिफ्लेक्ट करता है। इस खूबी के कारण इमारत की सतह पर गर्मी का अवशोषण कम होता है, जिससे अंदर का तापमान नियंत्रित रहता है और कूलिंग पर खर्च होने वाली ऊर्जा की खपत में भी भारी कमी आती है। यह ग्रीन बिल्डिंग आर्किटेक्चर आने वाले समय में अर्बन हीट आइलैंड के प्रभाव को कम करने में भी काफी मददगार साबित हो रही है।
जेपी मॉर्गन की इस शानदार इमारत की सफलता ने अमेरिका के अन्य राज्यों और परिवहन प्राधिकरणों को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। न्यूयॉर्क और कनेक्टिकट जैसे बड़े क्षेत्रों में अब सार्वजनिक राजमार्गों, रेलवे बुनियादी ढांचे और अन्य बड़े कमर्शियल प्रोजेक्ट्स के लिए ग्राउंड-ग्लास पोज्जोलन के इस्तेमाल को आधिकारिक रूप से प्राथमिकता दी जाने लगी है। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आधुनिक विज्ञान, जनहित और पर्यावरण की सुरक्षा अगर एक साथ मिलकर काम करें, तो असंभव दिखने वाले लक्ष्यों को भी आसानी से हासिल किया जा सकता है। तीन करोड़ कांच की बोतलों से खड़ी की गई यह ऐतिहासिक इमारत यह साबित करती है कि हमारा भविष्य रीसाइक्लिंग, सस्टेनेबिलिटी और ग्रीन टेक्नोलॉजी के कंधों पर ही टिका हुआ है।
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