यूएनजीए में कश्मीर राग अलापने वाले तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन को भारत का दो टूक और करारा जवाब

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के उच्चस्तरीय वार्षिक सत्र के दौरान दुनिया ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक दांव-पेच और तीखे बयानों का एक नया दौर देखा, जब तुर्की के राष्ट्रपति रेचप तय्यप एर्दोगन ने अपने संबोधन में एक बार फिर कश्मीर का राग अलापा। हमेशा की तरह इस बार भी तुर्की के राष्ट्रपति ने अपने भाषण में भारत के आंतरिक मामलों में दखل देने की कोशिश की और कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उछालने का असफल प्रयास किया। हालांकि, इस नापाक हरकत का भारत ने अपनी स्थापित कूटनीतिक परंपरा के अनुरूप बेहद कड़ा, स्पष्ट और करारा जवाब दिया। भारतीय राजनयिकों ने यूएन मंच पर ही तुर्की के दोहरे चरित्र और आंतरिक विरोधाभासों को उजागर करते हुए उसकी सबसे संवेदनशील और कमजोर नस यानी ‘साइप्रस विवाद’ पर सीधा प्रहार किया। भारत की इस नपी-तुली और आक्रामक कूटनीतिक प्रतिक्रिया के बाद अंतरराष्ट्रीय गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि नई दिल्ली अब किसी भी देश द्वारा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी और हर मोर्चे पर माकूल जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है।

संयुक्त राष्ट्र के मंच से तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने अपने पारंपरिक रवैये को दोहराते हुए भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का जिक्र किया और आत्मनिर्णय के अधिकारों जैसी बेतुकी बातें कहीं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का मानना है कि एर्दोगन वैश्विक मंच पर खुद को इस्लामिक दुनिया के तथाकथित मसीहा या नेता के रूप में पेश करने के लिए लगातार इस तरह के बयान देते रहते हैं, ताकि घरेलू राजनीति में उनकी लोकप्रियता बनी रहे। हालांकि, वे इस बात को बार-बार नजरअंदाज कर देते हैं कि कश्मीर पूरी तरह से भारत का एक आंतरिक और अभिन्न मामला है, जिस पर किसी भी बाहरी देश को टिप्पणी करने का कोई नैतिक या कानूनी अधिकार नहीं है। भारत ने हमेशा से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों के इस तरह के एजेंडे को सिरे से खारिज किया है और स्पष्ट शब्दों में यह संदेश दिया है कि द्विपक्षीय मुद्दों पर तीसरे पक्ष के दखल की कोई गुंजाइश नहीं है।

भारत का कड़ा पलटवार और साइप्रस के मुद्दे पर तुर्की की घेराबंदी

जब तुर्की के राष्ट्रपति ने कश्मीर पर बयानबाजी की, तो संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के युवा और तेजतर्रार राजनयिक ने राइट टू रिप्लाई (जवाब देने के अधिकार) का इस्तेमाल करते हुए अंकारा को आईना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत ने पूरी दुनिया के सामने तुर्की को याद दिलाया कि जो देश खुद अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करते हैं और दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान नहीं करते, उन्हें मानवाधिकार और लोकतंत्र पर उपदेश देने का कोई अधिकार नहीं है। भारत ने सीधे तौर पर ‘साइप्रस’ के मुद्दे को हवा देते हुए तुर्की की सबसे बड़ी कूटनीतिक कमजोरी पर चोट की। भारत ने स्पष्ट किया कि तुर्की खुद उत्तरी साइप्रस के अवैध सैन्य कब्जे और वहां के मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कटघरे में खड़ा है, इसलिए अंकारा को किसी अन्य देश के आंतरिक मामलों पर बोलने से पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। भारत के इस तीखे और सटीक प्रहार ने तुर्की की बोलती बंद कर दी और वैश्विक मंच पर एर्दोगन प्रशासन को असहज स्थिति में ला खड़ा किया।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीतिक समीकरणों पर असर

भारत द्वारा तुर्की को इस तरह सार्वजनिक रूप से साइप्रस के मामले पर घेरना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब भारतीय विदेश नीति आक्रामक रक्षात्मक (Offensive-Defensive) रुख अपना रही है। कूटनीतिक जानकारों का यह मानना है कि पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ सैन्य और रणनीतिक गठजोड़ के कारण तुर्की लंबे समय से भारत के खिलाफ बयानबाजी करता रहा है, लेकिन नई दिल्ली ने अब यह तय कर लिया है कि ऐसे बयानों का उसी की भाषा में और दोगुने कूटनीतिक वजन के साथ जवाब दिया जाएगा। साइप्रस गणराज्य के साथ भारत के संबंध ऐतिहासिक रूप से काफी प्रगाढ़ रहे हैं और भारत हमेशा से संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत साइप्रस की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का समर्थन करता आया है। ऐसे में, तुर्की द्वारा कश्मीर पर अनर्गल प्रलाप करने पर भारत का साइप्रस कार्ड खेलना एक बेहद मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ है। इस पूरी घटना ने यह साबित कर दिया है कि भारत अब अपने राष्ट्रीय हितों और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने से पीछे नहीं हटेगा, चाहे वह मंच संयुक्त राष्ट्र का ही क्यों न हो।