गर्भावस्था में दुर्लभ संक्रमण और ऑटिज्म का खतरा: स्वीडन के बड़े अध्ययन में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

स्टॉकहोम। गर्भावस्था के दौरान मां का स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा तंत्र (Immune System) गर्भ में पल रहे शिशु के न्यूरोलॉजिकल और शारीरिक विकास में निर्णायक भूमिका निभाता है। स्वीडन के प्रतिष्ठित कारोलिंस्का इंस्टीट्यूट (Karolinska Institutet) के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक व्यापक और दीर्घकालिक अध्ययन में यह निष्कर्ष सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान गंभीर और दुर्लभ संक्रमणों की चपेट में आने वाली माताओं के बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder – ASD) विकसित होने का जोखिम लगभग तीन गुना (Three-Fold Risk) तक बढ़ सकता है।

लाखों बच्चों और माताओं के राष्ट्रीय स्वास्थ्य रजिस्टरों पर आधारित इस शोध ने चिकित्सा जगत का ध्यान उस ओर खींचा है कि गर्भावस्था के दौरान होने वाली गंभीर सूजन (Systemic Inflammation) और इम्यून एक्टिवेशन किस तरह गर्भस्थ शिशु के नाजुक न्यूरोडेवलपमेंटल पथ को प्रभावित कर सकते हैं। यह अध्ययन विशेष रूप से उन दुर्लभ संक्रमणों पर केंद्रित था जिनके चलते गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में भर्ती (Hospitalization) होने या गहन चिकित्सीय देखरेख की आवश्यकता पड़ी।

स्वीडिश शोधकर्ताओं ने कई दशकों के व्यापक डेटा का विश्लेषण करने के बाद पाया कि सामान्य मौसमी सर्दी-जुकाम की तुलना में गंभीर, अनियंत्रित या दुर्लभ संक्रामक स्थितियां अधिक संवेदनशील प्रभाव डालती हैं:

  • तीन गुना जोखिम: जिन गर्भवती महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान गंभीर जीवाणु (Bacterial) या विषाणुजनित (Viral) दुर्लभ संक्रमणों का सामना किया, उनके बच्चों में सामान्य आबादी की तुलना में ऑटिज्म का नैदानिक निदान (Clinical Diagnosis) मिलने की संभावना लगभग तीन गुना दर्ज की गई।

  • अस्पताल में भर्ती होने वाले मामले: अध्ययन में पाया गया कि जोखिम विशेष रूप से तब सबसे अधिक था जब संक्रमण इतना गंभीर था कि महिला को अस्पताल में अंतःशिरा (IV) एंटीबायोटिक्स, एंटीवायरल दवाओं या विशेष निगरानी में रखना पड़ा।

  • संक्रमण का समय (Trimester Sensitivity): पहली और दूसरी तिमाही (First and Second Trimesters) के दौरान संक्रमण का प्रभाव सबसे संवेदनशील देखा गया, क्योंकि इसी समयावधि में भ्रूण के मस्तिष्क की न्यूरोनल संरचनाएं, सिनैप्टिक कनेक्शन और कॉर्टिकल लेयर्स का प्राथमिक गठन हो रहा होता है।

शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि ज्यादातर मामलों में यह जरूरी नहीं कि कोई वायरस या बैक्टीरिया प्लेसेंटा (Placenta) को पार कर सीधे शिशु के मस्तिष्क तक पहुंचे। इसके पीछे मुख्य भूमिका मां के अपने इम्यून सिस्टम की होती है:

  • मैटर्नल इम्यून एक्टिवेशन (MIA): जब मां का शरीर किसी गंभीर या असामान्य संक्रमण से लड़ता है, तो भारी मात्रा में प्रदाहकारी रसायन (Pro-inflammatory Cytokines जैसे IL-6, IL-17a और TNF-alpha) रक्तप्रवाह में छोड़े जाते हैं।

  • प्लेसेंटल बैरियर और भ्रूण का दिमाग: अत्यधिक साइटोकाइन तूफान (Cytokine Storm) कभी-कभी प्लेसेंटा के माध्यम से भ्रूण के संचलन तंत्र तक पहुंच सकता है। यह भ्रूण के मस्तिष्क में माइक्रोग्लिया (Microglia – मस्तिष्क की प्रतिरक्षा कोशिकाएं) को सक्रिय कर देता है, जिससे न्यूरॉन्स के प्राकृतिक विकास और संचार पैटर्न में सूक्ष्म बदलाव आ सकते हैं।

  • दुर्लभ संक्रमणों की संवेदनशीलता: दुर्लभ या असामान्य रोगजनक शरीर में अधिक आक्रामक और अनियंत्रित प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं, जो लंबे समय तक उच्च सूजन का कारण बनती है।

चिकित्सा विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं ने गर्भवती महिलाओं को आगाह करते हुए यह भी समझाया है कि इस अध्ययन के परिणामों को भय या घबराहट के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए:

  • सापेक्ष जोखिम बनाम निरपेक्ष जोखिम: शोधकर्ताओं का कहना है कि तीन गुना जोखिम एक ‘सापेक्षिक आंकड़ा’ (Relative Risk) है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि गर्भावस्था में गंभीर संक्रमण से पीड़ित प्रत्येक महिला का बच्चा ऑटिज्म का शिकार होगा। ऑटिज्म एक बहु-कारकीय (Multifactorial) स्थिति है जिसमें आनुवंशिक प्रवृत्तियां (Genetics) 60 से 80 प्रतिशत तक मुख्य भूमिका निभाती हैं।

  • सामान्य संक्रमणों से अलग: सामान्य फ्लू, हल्का यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) या मौसमी जुकाम जिसका समय पर इलाज हो जाता है, आमतौर पर इस श्रेणी में नहीं आते। अध्ययन का जोर बिना इलाज के छोड़े गए, जटिल या दुर्लभ सिस्टेमिक इन्फेक्शन्स पर था।

  • रोकथाम और समय पर इलाज: यदि किसी गर्भवती महिला को तेज बुखार, लगातार ठंड लगना, या कोई असामान्य संक्रमण महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क कर एंटीबायोटिक या एंटीवायरल उपचार लेना चाहिए। बुखार और संक्रमण को नियंत्रित करने से साइटोकाइन के स्तर में तेजी से कमी आती है, जिससे भ्रूण पर पड़ने वाला जोखिम काफी हद तक टल जाता है।

गर्भावस्था के दौरान नियमित प्रसवपूर्व जांच (Antenatal Care), समय पर टीकाकरण और संक्रमण के किसी भी लक्षण पर तुरंत चिकित्सीय सलाह लेना ही मां और आने वाले शिशु दोनों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य की सबसे मजबूत ढाल है।