मथुरा जेल में ही क्यों दी जाती है महिला कैदियों को फांसी

भारतीय न्याय प्रणाली में मौत की सजा यानी फांसी का प्रावधान सबसे कठोर दंड माना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों की विभिन्न जेलों में पुरुष दोषियों को फांसी देने के लिए फांसी घर बने हुए हैं, लेकिन जब बात महिला मुजरिमों को फांसी देने की आती है, तो देश भर में केवल एक ही नाम सबसे पहले सामने आता है—उत्तर प्रदेश की ऐतिहासिक मथुरा जिला जेल। देश के किसी भी अन्य कोने में महिलाओं के लिए अलग से फांसी घर का प्रावधान नहीं है। यही वजह है कि जब भी देश में किसी महिला को मौत की सजा दिए जाने की चर्चा होती है, तो मथुरा जेल का यह रहस्यमयी और एकांत में बना फांसी घर सुर्खियों में आ जाता है। अमरोहा की चर्चित बहुचर्चित आरोपी शबनम की दया याचिका खारिज होने और उससे पहले रामश्री के मामले के दौरान यह सवाल देश भर में बहस का केंद्र बन गया था कि आखिर महिला कैदियों के लिए फांसी की यह विशेष व्यवस्था सिर्फ मथुरा में ही क्यों और कैसे शुरू हुई थी।

मथुरा जिला कारागार के भीतर स्थित यह महिला फांसी घर कोई आज की आधुनिक संरचना नहीं है, बल्कि इसका इतिहास करीब डेढ़ दशक यानी ब्रिटिश काल से जुड़ा हुआ है। अंग्रेजों ने अपने शासनकाल के दौरान सन 1870 में इस विशेष जेल परिसर का विस्तार करते हुए महिलाओं के लिए अलग से फांसी घर का निर्माण करवाया था। उस दौर के जेल मैनुअल और औपनिवेशिक कानूनों के तहत यह तय किया गया था कि महिला कैदियों को पुरुषों से अलग और एकांत परिसर में सजा-ए-मौत दी जानी चाहिए। तब से लेकर आज तक उत्तर प्रदेश या देश के किसी अन्य हिस्से में महिलाओं के लिए कोई दूसरा फांसी घर नहीं बनाया गया। हालांकि, सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाला सच यह है कि आजादी के बाद से लेकर अब तक इस 150 साल पुराने ऐतिहासिक महिला फांसी घर में एक बार भी किसी महिला को असल में फांसी पर नहीं लटकाया गया है, और यह अपनी पहली कैदी की गर्दन का इंतजार कर रहा है।

आजादी के बाद यह दूसरा मौका था जब मथुरा जेल का यह महिला फांसी घर चर्चाओं के केंद्र में आया था। इससे पहले लगभग दो दशक पहले (1998 के दौर में) उत्तर प्रदेश के ही एक अन्य सनसनीखेज मामले में रामश्री नाम की महिला को फांसी दिए जाने की पूरी तैयारियां कर ली गई थीं। उस वक्त भी रातों-रात अंग्रेजों के जमाने के इस जीर्ण-शीर्ण फांसी घर की सफाई करवाई गई थी, उसका तख्ता और लीवर दुरुस्त किया गया था। लेकिन ठीक अंतिम समय में मानवीय दृष्टिकोण, महिला संगठनों के भारी विरोध और दया याचिका के आधार पर रामश्री की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया था। इसके बाद अमरोहा जिले के बावनखेड़ी गांव की रहने वाली शबनम का मामला देश भर में सामने आया, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही परिवार के सात सदस्यों की कुल्हाड़ी से काटकर बेरहमी से हत्या कर दी थी। जब राष्ट्रपति द्वारा शबनम की दया याचिका खारिज की गई, तब एक बार फिर से मथुरा जेल के इस बंद पड़े महिला फांसी घर के ताले खोले गए और इसकी साफ-सफाई व मरम्मत का काम तेजी से शुरू हुआ।

चूंकि पूरे भारत में कानूनी और प्रशासनिक तौर पर महिलाओं के लिए फांसी देने की अधिकृत और सुरक्षित संरचना केवल मथुरा जेल में ही मौजूद है, इसलिए यदि किसी भी अन्य राज्य की अदालत द्वारा किसी महिला मुजरिम की दया याचिका खारिज होती है और डेथ वारंट जारी होता है, तो उसे नियमों के तहत मथुरा जेल ही स्थानांतरित किए जाने का प्रावधान माना जाता है। इस फांसी घर की बनावट ऐसी है कि यहां एक साथ तीन कैदियों को फांसी पर लटकाए जाने की क्षमता है, हालांकि इसके चारों तरफ बनी ऊंची दीवारों और जेल के मुख्य परिसर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर स्थित होने के कारण यहां पूरी तरह से गोपनीयता बरती जाती है। देश के जाने-माने जल्लादों ने भी समय-समय पर आकर इस स्थान का निरीक्षण किया है और यहां की तकनीकी कमियों जैसे लकड़ी के तख्ते और लोहे के लीवर को ठीक करने के निर्देश दिए हैं।

मथुरा जेल का यह महिला फांसी घर भारतीय न्यायपालिका के कड़े नियमों और औपनिवेशिक इतिहास का एक ऐसा अनूठा प्रतीक है जो दशकों से खामोश खड़ा है। हालांकि समय-समय पर मानवाधिकार संगठनों और कानूनविदों द्वारा यह सवाल भी उठाया जाता रहा है कि क्या आधुनिक भारत में ऐसे विशेष और पुराने प्रावधानों की अब भी उतनी ही प्रासंगिकता बची है, या फिर इसे बदला जाना चाहिए। बावजूद इसके, जब तक कानून में कोई संशोधन नहीं होता, तब तक मथुरा की यह जेल देश की इकलौती ऐसी जगह बनी हुई है, जिसे महिला अपराध और उसकी अंतिम सजा के इतिहास के साथ जोड़कर देखा जाता है। यह स्थान इस बात की गवाही देता है कि कानून की नजर में अपराध चाहे पुरुष करे या महिला, उसके अंजाम की रूपरेखा कितनी गंभीर और सुनियोजित हो सकती है।