शरद पूर्णिमा की रात जागरण करना क्यों माना जाता है बेहद शुभ, मां लक्ष्मी और श्रीकृष्ण के महारास से जुड़ा यह पावन रहस्य

सनातन हिंदू संस्कृति और पर्व-त्योहारों की इस बेहद पवित्र श्रृंखला में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का एक अलग ही आध्यात्मिक और ज्योतिषीय महत्व होता है। इस पावन तिथि को शरद पूर्णिमा (Sharad Purnima 2026) या कोजागरी पूर्णिमा (Kojagari Purnima) के नाम से पूरे भारतवर्ष में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, साल भर में आने वाली सभी पूर्णिमा तिथियों में शरद पूर्णिमा को सबसे खास और चमत्कारी माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस विशेष रात्रि को धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी मां लक्ष्मी (Maa Lakshmi) धरती के भ्रमण पर निकलती हैं और यह देखती हैं कि कौन-कौन से भक्त रात्रि के समय जागकर उनकी आराधना कर रहे हैं। इस रात जागरण करने और चंद्रमा की चांदनी में खीर रखने की परंपरा सदियों पुरानी है। आइए विस्तार से जानते हैं कि शरद पूर्णिमा की रात जागरण करना क्यों इतना फलदायी माना गया है और इसके पीछे मां लक्ष्मी तथा भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े कौन-कौन से पौराणिक रहस्य छिपे हैं।

क्या है शरद पूर्णिमा पर रातभर जागने (जागरण) का धार्मिक और आध्यात्मिक रहस्य

सनातन धर्म के ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की यह जादुई रात साधारण रातों जैसी नहीं होती है। इस रात को लेकर कई तरह की पौराणिक और वैज्ञानिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। सबसे मुख्य मान्यता यह है कि शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि को माता लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर सवार होकर पृथ्वी लोक पर आती हैं और वे हर घर के द्वार पर जाकर यह देखती हैं कि कौन जाग रहा है।

संस्कृत में एक प्रसिद्ध कहावत है— “को जागर्ति?” जिसका अर्थ होता है “कौन जाग रहा है?”। इसी से इस पूर्णिमा का नाम ‘कोजागरी पूर्णिमा’ पड़ा है। ऐसा माना जाता है कि जो भक्त इस रात सोने के बजाय जागकर मां लक्ष्मी के मंत्रों का जाप, भजन और कीर्तन करते हैं, माता लक्ष्मी उन पर अपनी विशेष कृपा बरसाती हैं। उनके जीवन से दरिद्रता हमेशा के लिए दूर हो जाती है और घर में सुख, शांति तथा स्थायी समृद्धि का वास होता है। इसलिए इस रात को सोने की मनाही होती है और रात्रि जागरण का विशेष विधान बताया गया है।

चंद्रमा की 16 कलाएं और अमृत वर्षा का अद्भुत वैज्ञानिक व धार्मिक संयोग

धार्मिक और ज्योतिषीय शास्त्रों के अनुसार, शरद पूर्णिमा ही साल की वह इकलौती ऐसी रात होती है, जब चंद्रमा अपनी पूरी 16 कलाओं (16 Kalas) से परिपूर्ण होकर आसमान में चमकता है। पूर्णिमा के इस अद्भुत प्रकाश में औषधीय गुण और विशेष ऊर्जा समाहित होती है।

ऐसी मान्यता है कि इस रात्रि को चंद्रमा की किरणों से सीधे तौर पर अमृत की वर्षा होती है। यही वजह है कि उत्तर भारत और देश के अन्य हिस्सों में इस रात दूध से बनी खीर को खुले आसमान के नीचे चांदनी रात में रखा जाता है, ताकि उसमें चंद्रमा की किरणें पड़ सकें और वह प्रसाद रूपी अमृत बन जाए। इस अमृतमयी चांदनी में जागरण करने और रात्रि के समय भजन-कीर्तन करने से शरीर की नसें शांत होती हैं, मन को असीम शांति मिलती है, मानसिक तनाव (Mental Stress) दूर होता है और शरीर में सकारात्मक ऊर्जा (Positive Energy) का संचार होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इस रात का जागना और चांदनी का लाभ उठाना बहुत फायदेमंद माना गया है।

भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के ‘महारास’ से जुड़ा है शरद पूर्णिमा का इतिहास

शरद पूर्णिमा की इस पावन रात का संबंध भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं से भी बहुत गहरा है। हिंदू धर्म के पवित्र ग्रंथ भागवत पुराण (Bhagwat Puran) में इस बात का बहुत ही सुंदर और विस्तृत वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी शरद पूर्णिमा की शीतल और मनोरम रात को वृंदावन में यमुना नदी के तट पर गोपियों के साथ महारास (Maharas) रचाया था।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने अपनी बांसुरी की ऐसी जादुई और सम्मोहक धुन बजाई, तो उस मोहक संगीत को सुनकर ब्रज की सारी गोपियां अपने सुध-बुध खोकर यमुना तट की ओर खिंची चली आईं। भगवान कृष्ण ने अपनी योगमाया से उस रात को बहुत लंबा कर दिया और सभी गोपियों के साथ रासलीला रचाई। यह महारास आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि शरद पूर्णिमा की रात को संगीत, नृत्य, भजन-कीर्तन और भगवान कृष्ण तथा मां लक्ष्मी के सामूहिक जागरण का आयोजन करने से विशेष आध्यात्मिक आनंद और पुण्य की प्राप्ति होती है।

इस साल कब है शरद पूर्णिमा 2026? जानिए सही तिथि और मुहूर्त

यदि आप भी इस वर्ष शरद पूर्णिमा का व्रत रखकर मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको सही तिथि और समय की जानकारी होनी चाहिए। वैदिक पंचांग के अनुसार, इस साल आश्विन पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर होगी, जबकि इस तिथि का समापन 26 अक्टूबर को सुबह 09 बजकर 41 मिनट पर होगा।

उदया तिथि और रात्रि व्यापिनी पूर्णिमा के नियमानुसार, शरद पूर्णिमा का यह महापर्व 25 अक्टूबर 2026 को ही मनाया जाएगा। इस दिन रात्रि के समय आसमान के नीचे बैठकर जागरण करना, माता लक्ष्मी के श्रीसूक्त का पाठ करना और दूध-चावल की खीर का भोग लगाना अत्यंत शुभ फलदायी रहेगा।