
भारतीय क्रिकेट इतिहास (Indian Cricket History) के सबसे यशस्वी, आक्रामक और बेबाक कप्तानों में शुमार सौरव गांगुली (Sourav Ganguly) का नाम जब भी लिया जाता है, तो जेहन में एक ऐसे लीडर की तस्वीर उभरती है जिसने टीम इंडिया को विदेशों में आंखें मिलाकर जीतना सिखाया। ‘प्रिंस ऑफ कोलकाता’ और ‘दादा’ के नाम से मशहूर सौरव गांगुली अपने करियर की शुरुआत से ही अपने कड़े तेवरों और बेबाक अंदाज के लिए पहचाने जाते रहे हैं। हालांकि, उनका यह आक्रामक और दबंग स्वभाव कई बार उनके लिए विवादों का सबब भी बन गया। अपने लंबे और शानदार करियर के दौरान गांगुली के कई विवादों से पाला पड़ा, जिसमें पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीव वॉ को टॉस के लिए इंतजार करवाना हो या फिर भारतीय कोच ग्रेग चैपल के साथ उनका वह मशहूर और बहुचर्चित विवाद, जिसने भारतीय क्रिकेट में भूचाल ला दिया था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारतीय टीम के लिए अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में कदम रखने से पहले ही सौरव गांगुली पर ‘घमंडी’ होने और टीम के अनुशासन को तोड़ने के गंभीर आरोप लग चुके थे? उनके करियर के शुरुआती दिनों में यह बात आग की तरह फैली थी कि उन्होंने मैच के दौरान मैदान पर खिलाड़ियों के लिए ‘ड्रिंक्स ले जाने से साफ इनकार’ कर दिया था। आइए विस्तार से जानते हैं कि दादा के करियर से जुड़ी इस अनसुनी और सनसनीखेज कहानी की पूरी सच्चाई क्या थी और तब के कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन का इस पर क्या कहना था।
जब सौरव गांगुली पर लगा था घमंडी होने का ठप्पा और अनुशासनहीनता का आरोप
सौरव गांगुली ने अपना ऐतिहासिक टेस्ट डेब्यू तत्कालीन कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन (Mohammed Azharuddin) की कप्तानी में साल 1996 में लॉर्ड्स के मैदान पर किया था, जहां उन्होंने अपने पहले ही मैच में शानदार शतक जड़कर तहलका मचा दिया था। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर चमकने से पहले घरेलू क्रिकेट और शुरुआती दौर के कुछ मुकाबलों के दौरान उनके इर्द-गिर्द कई तरह की नकारात्मक बातें और अफवाहें तैरने लगी थीं।
मीडिया और क्रिकेट गलियारों में लंबे समय तक यह चर्चा जोरों पर रही कि युवा सौरव गांगुली के भीतर जरूरत से ज्यादा अहंकार (Arrogance) आ गया है। इस विवाद की शुरुआत तब हुई जब गांगुली को शुरुआती मैचों में अपेक्षाकृत कम स्कोर करने के बाद प्लेइंग-11 (Playing XI) से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। रिपोर्ट्स और उस समय की कहानियों के अनुसार, जब गांगुली को टीम से बाहर किया गया, तो वे चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के इस फैसले से बेहद खफा हो गए थे। इसके बाद यह दावा किया जाने लगा कि जब टीम को जरूरत थी, तब गांगुली ने मैदान पर खिलाड़ियों के लिए पानी और ड्रिंक्स ले जाने से साफ मना कर दिया था। इस एक घटना को आधार बनाकर उन्हें एक ‘घमंडी और अनुशासनहीन खिलाड़ी’ के रूप में पेश करने की कोशिश की गई थी, जिसने उस दौर के क्रिकेट प्रेमियों को भी हैरान कर दिया था।
क्या वाकई सौरव गांगुली ने किया था ड्रिंक्स ले जाने से इनकार? जानिए सच्चाई
क्रिकेट के गलियारों में जब भी किसी युवा खिलाड़ी पर अनुशासनहीनता के आरोप लगते हैं, तो वह मामला तूल पकड़ लेता है। सौरव गांगुली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्षों तक खेल पत्रिकाओं और मीडिया में यह कहानी चटखारे लेकर सुनाई जाती रही कि दादा ने टीम के लिए पानी ले जाने से मना कर दिया था क्योंकि वे टीम से ड्रॉप किए जाने से आहत थे।
लेकिन, इन तमाम अफवाहों और मीडिया रिपोर्ट्स में कितनी सच्चाई थी, इसका खुलासा खुद उस समय के कप्तान और सौरव गांगुली ने मिलकर किया था। बाद के वर्षों में जब गांगुली से सीधे तौर पर इस विवाद के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। दादा का स्पष्ट रूप से यह कहना था कि ये खबरें पूरी तरह से मनगढ़ंत, निराधार और सिर्फ सनसनी फैलाने के उद्देश्य से फैलाई गई अफवाहें थीं। उन्होंने कभी भी मैदान पर किसी भी अनुशासनहीनता को बढ़ावा नहीं दिया था और टीम के प्रति उनका समर्पण हमेशा से शत-प्रतिशत रहा था।
पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन ने भी इन खबरों को बताया था बकवास
इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे तत्कालीन भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन ने भी बाद में इस मामले पर खुलकर अपनी चुप्पी तोड़ी थी। अजहरूद्दीन ने साफ शब्दों में मीडिया में चल रही उन तमाम कहानियों को खारिज कर दिया जिनमें गांगुली को घमंडी या अनुशासनहीन कहा गया था।
अजहरूद्दीन का यह मानना था कि सौरव गांगुली बेहद प्रतिभाशाली, जुझारू और खेल के प्रति पूरी तरह समर्पित खिलाड़ी थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि गांगुली ने कभी भी टीम के नियमों के खिलाफ जाकर ऐसा कोई काम नहीं किया था और न ही उन्होंने कभी ड्रिंक्स ले जाने से इनकार किया था। शुरुआती दौर में युवा खिलाड़ियों को लेकर अक्सर इस तरह की बेबुनियाद बातें उड़ जाती हैं, जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं होता है। अजहरूद्दीन के इस बयान के बाद इन अफवाहों पर हमेशा के लिए विराम लग गया और यह साबित हो गया कि मैदान के बाहर दादा की छवि को धूमिल करने के लिए इन कहानियों को तूल दिया गया था।
मैदान की आक्रामकता और टीम इंडिया को विनर बनाने वाले कप्तान बने ‘दादा’
शुरुआती दौर के इन विवादों और संघर्षों से पार पाते हुए सौरव गांगुली ने भारतीय क्रिकेट में एक नए युग की शुरुआत की। जब साल 2000 में मैच-फिक्सिंग के काले साए से घिरी भारतीय क्रिकेट टीम को उबारने की जिम्मेदारी गांगुली के कंधों पर डाली गई, तो उन्होंने अपनी कप्तानी से यह साबित कर दिया कि उनका वह ‘अहकार’ या आक्रामकता असल में मैदान पर जीतने का जज्बा था।
उन्होंने सहवाग, युवराज, हरभजन और जहीर खान जैसे युवा खिलाड़ियों को तराशकर एक ऐसी विश्वस्तरीय टीम तैयार की जिसने विदेशी धरती पर आंखें मिलाकर मुकाबला करना सिखाया। लॉर्ड्स की बालकनी में शर्ट उतारकर जश्न मनाने वाले से लेकर बीसीसीआई अध्यक्ष बनने तक का उनका सफर यह बताता है कि विवादों से परे सौरव गांगुली भारतीय खेल जगत के एक ऐसे महानायक हैं जिन्हें उनकी शर्तों और उनकी बेबाक लीडरशिप के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। शुरुआती दौर के वे आरोप समय के साथ केवल एक अफवाह बनकर रह गए, और मैदान पर गांगुली के बल्ले व फैसलों ने आलोचकों को हमेशा के लिए करारा जवाब दे दिया।
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