जाकिर नाइक ने लड़कियों की पढ़ाई पर तालिबान के बैन को बताया जायज

अफगानिस्तान की धरती पर कट्टरपंथी संगठन तालिबान द्वारा लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर लगाए गए विवादित प्रतिबंध को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक बार फिर से भारी बहस और जनाक्रोश देखने को मिल रहा है। भारत से फरार होकर मलेशिया में शरण लेने वाले विवादित इस्लामिक उपदेशक डॉ. जाकिर नाइक द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान ने इस पूरे मुद्दे को और अधिक तूल दे दिया है। जाकिर नाइक ने तालिबानी हुकूमत के लड़कियों के माध्यमिक और उच्च शिक्षा पर बैन के फैसले का खुलकर बचाव किया है और इसे जायज ठहराने की कोशिश की है। नाइक के इस आपत्तिजनक बयान के सामने आते ही केवल अफगानिस्तान और भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों और नागरिकों में भारी गुस्सा फैल गया है। इस बयान के खिलाफ अफगान नागरिक और भारतीय समुदाय के लोग एक साथ मिलकर विरोध में खड़े हो गए हैं और तालिबान के साथ-साथ जाकिर नाइक की भी तीखी आलोचना कर रहे हैं।

भगोड़े उपदेशक जाकिर नाइक ने अपने हालिया सोशल मीडिया वीडियो में यह दावा किया कि मीडिया में दिखाई जा रही खबरें पूरी तरह सच नहीं हैं और तालिबान ने लड़कियों की शिक्षा पर हमेशा के लिए कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है। नाइक ने तालिबानी प्रवक्ताओं के तर्कों को दोहराते हुए कहा कि अफगानिस्तान में अभी सुरक्षा का माहौल बेहतर नहीं है और वहां महिला शिक्षकों की भारी कमी है, जिस वजह से उच्च शिक्षा को केवल कुछ समय के लिए टाला गया है। उसने यह भी तर्क दिया कि जब तक उपयुक्त माहौल और महिला शिक्षक उपलब्ध नहीं हो जातीं, तब तक स्कूली शिक्षा को स्थगित रखने में कोई बुराई नहीं है। इसके अलावा उसने दावा किया कि महिलाएं इस्लामी अध्ययन में शरिया और कुरान की पढ़ाई में पीएचडी और स्नातकोत्तर डिग्रियां हासिल कर रही हैं, इसलिए इसे शिक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध कहना गलत है। नाइक के इन तर्कों ने जलते हुए दिए में तेल डालने जैसा काम किया है।

जाकिर नाइक के इस बयान के सार्वजनिक होते ही अफगान शरणार्थियों, निर्वासित अफगान महिला नेताओं और भारतीय विद्वानों ने सामूहिक रूप से नाइक के दावों की धज्जियां उड़ा दीं। नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई के पिता और प्रसिद्ध शिक्षा कार्यकर्ता जियाउद्दीन यूसुफजई ने नाइक की कड़ी आलोचना करते हुए उनके बयान को बेहद निराशाजनक और लैंगिक रंगभेद (Gender Apartheid) को बढ़ावा देने वाला करार दिया। अफगान कार्यकर्ताओं और विश्लेषकों ने नाइक से सीधा सवाल पूछा कि जब लड़कियों को स्कूल और कॉलेज जाने की ही अनुमति नहीं होगी, तो भविष्य में महिला शिक्षक आसमान से टपकेंगी क्या? पूर्व अफगान महिला सांसदों और पत्रकारों ने नाइक को नसीहत दी कि यदि उन्हें तालिबानी नीतियां इतनी ही पसंद हैं, तो वे मलेशिया का आराम छोड़कर खुद अफगानिस्तान जाकर तालिबान के शासन में रहकर दिखाएं।

जाकिर नाइक के दावों के विपरीत संयुक्त राष्ट्र और यूनिसेफ (UNICEF) की रिपोर्ट्स एक बेहद भयानक और खौफनाक तस्वीर पेश करती हैं। आंकड़ों के मुताबिक, तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद से 2.6 मिलियन से अधिक अफगान लड़कियों को माध्यमिक और उच्च शिक्षा से पूरी तरह बेदखल कर दिया गया है। अफगानिस्तान आज पूरी दुनिया में इकलौता ऐसा देश है जहां लड़कियों और महिलाओं के लिए स्कूल, कॉलेज और मेडिकल ट्रेनिंग तक के दरवाजे आधिकारिक रूप से पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं। नाइक द्वारा इसे महज “सुरक्षा कारणों से देरी” बताना लाखों अफगान लड़कियों के भविष्य और उनके मानवाधिकारों का मजाक उड़ाने जैसा है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय तालिबान के इस कदम को मानवीय मूल्यों के खिलाफ मान रहा है।

जाकिर नाइक के इस गैर-जिम्मेदाराना बयान ने एक दुर्लभ वैश्विक एकजुटता को जन्म दिया है, जहां भारत, अफगानिस्तान और यहां तक कि पाकिस्तान के प्रगतिशील विचारक और आम जनता एक मंच पर आकर इस कट्टरपंथी सोच का विरोध कर रहे हैं। भारतीय विचारकों और विद्वानों ने मलेशियाई सरकार पर भी सवाल उठाए हैं कि वे भारत के भगोड़े आरोपी जाकिर नाइक को अपने देश में शरण देकर इस तरह के बयानों के लिए मंच प्रदान कर रहे हैं। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि धर्म और सुरक्षा की आड़ लेकर आधी आबादी को शिक्षा से वंचित रखना किसी भी आधुनिक और सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता। अफगान और भारतीय समुदाय के लोगों ने संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों से गुहार लगाई है कि वे तालिबानी तुगलकी फरमानों और जाकिर नाइक जैसी चरमपंथी सोच फैलाने वाली हस्तियों के खिलाफ सख्त कदम उठाएं ताकि अफगान बेटियों को उनका पढ़ने का मौलिक अधिकार वापस मिल सके।