किम जोंग की बढ़ती ताकत से टेंशन में अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भू-राजनीतिक पटल पर एक बार फिर से कोरियाई प्रायद्वीप का तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है। उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता किम जोंग उन की आक्रामक नीतियों, लगातार हो रहे अत्याधुनिक मिसाइल परीक्षणों और परमाणु हथियारों के आधुनिकीकरण ने वैश्विक सुरक्षा चिंताओं को और अधिक गहरा कर दिया है। उत्तर कोरिया की इस बढ़ती सैन्य ताकत ने सीधे तौर पर महाशक्ति अमेरिका के साथ-साथ उसके दो सबसे करीबी एशियाई सहयोगियों—दक्षिण कोरिया और जापान की नींद उड़ा रखी है। वाशिंगटन से लेकर सियोल और टोक्यो तक के हुक्मरानों के बीच इस बात को लेकर हाई-लेवल मंथन का दौर तेज हो गया है कि कैसे किम जोंग उन के इस खतरनाक परमाणु विस्तार को रोका जाए। इसी रणनीतिक चिंता के बीच तीनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने एक बार फिर से एकजुट होकर उत्तर कोरिया के पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण यानी कंप्लीट डीन्यूक्लियराइजेशन के संकल्प को दोहराया है। वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इस बात पर गहरी चर्चा हो रही है कि क्या यह त्रिपक्षीय गठबंधन किम जोंग की आक्रामकता पर लगाम कसने में कामयाब हो पाएगा या फिर शीत युद्ध जैसा तनाव एक बार फिर दुनिया को किसी बड़ी तबाही की ओर धकेलेगा।

उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षण और प्योंगयांग का आक्रामक रुख

पिछले कुछ महीनों के दौरान किम जोंग उन के नेतृत्व वाले उत्तर कोरिया ने अपनी सैन्य क्षमताओं के विस्तार में जिस तेजी से कदम बढ़ाए हैं, उसने पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को बारूद के ढेर पर ला खड़ा कर दिया है। एक के बाद एक अत्याधुनिक सामरिक मिसाइलें, मल्टीपल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम और एआई-सपोर्टेड तकनीक के परीक्षण इस बात की गवाही दे रहे हैं कि प्योंगयांग अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की परवाह किए बिना अपनी सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ाने में जुटा हुआ है। प्योंगयांग प्रशासन ने हाल ही में पश्चिमी देशों और संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले समूहों के बयानों को सिरे से खारिज करते हुए यह साफ कर दिया है कि वह दुनिया की किसी भी ताकत के दबाव में आने वाला नहीं है। उत्तर कोरियाई हुक्मरानों का यह कड़ा रुख और कानूनी तौर पर खुद को एक स्थापित परमाणु संपन्न राष्ट्र घोषित कर देना इस बात का साफ संकेत है कि कूटनीति के रास्ते पर चलने के लिए प्योंगयांग तैयार नहीं है। इस अनियंत्रित होती स्थिति के कारण ही अमेरिका और उसके पड़ोसी एशियाई लोकतांत्रिक देशों की चिंताएं इस उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं कि किसी भी छोटी सी रणनीतिक चूक से बड़ा क्षेत्रीय युद्ध छिड़ सकता है।

अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान की तिकड़ी ने कसी कमर

प्योंगयांग की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और लगातार बढ़ती धमकियों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान ने अपनी रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत कर लिया है। हाल ही में तीनों देशों के शीर्ष अधिकारियों और कूटनीतिक प्रतिनिधियों के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठकों में इस बात पर पूरी तरह सहमति बनी है कि उत्तर कोरिया को कभी भी एक वैध परमाणु राज्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। त्रिपक्षीय मंच से यह दो टूक संदेश दिया गया है कि क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए उत्तर कोरिया का पूरी तरह से परमाणु-मुफ्त (Denuclearization) होना एकमात्र अंतिम विकल्प है। इन तीनों देशों ने अपनी खुफिया जानकारियों (Intelligence Sharing) को आपस में और अधिक सहजता से साझा करने तथा किसी भी आपातकालीन मिसाइल हमले या उकसावे की कार्रवाई का संयुक्त और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया देने का कड़ा संकल्प लिया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आर्थिक प्रतिबंधों के कड़े फंदे कसने के साथ-साथ इन देशों की सेनाओं द्वारा संयुक्त युद्धाभ्यास को भी लगातार बढ़ाया जा रहा है ताकि किम जोंग उन को यह कड़ा संदेश मिल सके कि उनकी किसी भी दुस्साहसिक कार्रवाई का करारा और निर्णायक जवाब दिया जाएगा।

कूटनीति और संभावित वार्ताओं के बीच मंडराते अनिश्चितता के बादल

एक तरफ जहां अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान सैन्य मोर्चे पर पूरी तरह चौकस हैं और परमाणु निरस्त्रीकरण की अपनी जिद पर कायम हैं, वहीं दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस बात के भी कयास लगाए जा रहे हैं कि क्या आने वाले समय में वाशिंगटन और प्योंगयांग के बीच किसी शीर्ष स्तर की वार्ता का दौर शुरू हो सकता है। कूटनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वैश्विक मंचों पर हो रही हलचल और आगामी अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों (जैसे APEC शिखर सम्मेलन) के मद्देनजर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच परदे के पीछे संपर्क साधने की कोशिशें चल सकती हैं। हालांकि, दूसरी कठोर सच्चाई यह भी है कि उत्तर कोरिया किसी भी ऐसे समझौते के लिए आसानी से राजी होने से साफ इनकार कर रहा है जिसमें उसके परमाणु शस्त्रागार को खत्म करने की शर्त शामिल हो। उत्तर कोरियाई हुक्मरान अपनी परमाणु ताकत को अपनी सबसे बड़ी सुरक्षा ढाल मानते हैं, जिसे वह किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में कूटनीति के रास्ते खुलने की उम्मीदें बेहद धुंधली नजर आती हैं और दोनों पक्ष एक बार फिर शक्ति परीक्षण के मुहाने पर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।

वैश्विक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चेतावनी बनता कोरियाई प्रायद्वीप

कोरियाई प्रायद्वीप में पनप रहा यह भारी तनाव केवल एशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी दूरगामी और घातक परिणाम हो सकते हैं। रूस और चीन जैसे देशों की परोक्ष या अपरोक्ष रणनीतिक कूटनीति के समर्थन के चलते उत्तर कोरिया का हौसला लगातार बुलंद होता जा रहा है, जिससे पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाला गठबंधन और अधिक चिंतित हो गया है। अमेरिका, दक्षिण कोरिया और जापान का यह संयुक्त संकल्प कि वे कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से पूरी तरह मुक्त करवा कर रहेंगे, आने वाले दिनों में कूटनीतिक संघर्षों को और अधिक तीव्र कर सकता है। एक तरफ जहां किम जोंग उन अपनी सैन्य ताकत के दम पर दुनिया को झुकाने की फिराक में हैं, वहीं दूसरी तरफ लोकतांत्रिक देशों का यह त्रिपक्षीय गठबंधन अंतरराष्ट्रीय नियमों और संप्रभुता की रक्षा के लिए चट्टान की तरह खड़ा नजर आ रहा है। इस महासंग्राम के बीच यह देखना बेहद दिलचस्प और चिंताजनक होगा कि आने वाले समय में कूटनीति की जीत होती है या फिर हथियारों की होड़ इस पूरी दुनिया को एक नए और भयावह संकट की तरफ खींच ले जाती है।