
पश्चिम एशिया की रणनीति और सुरक्षा के लिहाज से एक बेहद झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है, जहां यमन का गृहयुद्ध एक बार फिर सबसे भीषण और विनाशकारी मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन को तगड़ा झटका देते हुए यमन की अस्थायी राजधानी ‘अदन’ (Aden) की ओर तेजी से कदम बढ़ा दिए हैं। पिछले कुछ दिनों में हुए इस तेज सैन्य मूवमेंट के चलते हूती विद्रोही अदन शहर के बेहद करीब पहुंच चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सऊदी समर्थित सरकार के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडराने लगा है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की अत्याधुनिक सऊदी सेना और उनका शक्तिशाली एयर सपोर्ट भी हूती लड़ाकों की इस अप्रत्याशित आक्रामकता को थामने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। अदन के हवाई अड्डे और राष्ट्रपति भवन के आसपास लगातार हो रहे मिसाइल व ड्रोन हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। आज की इस विशेष विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में हम गहराई से समझेंगे कि आखिर अचानक यमन के मोर्चे पर ऐसा क्या हुआ, हूती लड़ाके अदन तक कैसे पहुंचे और इस बड़े उलटफेर का पूरे मध्य पूर्व की शांति और वैश्विक जहाजरानी (Shipping Route) पर क्या असर पड़ेगा।
यमन की रणनीतिक स्थिति और लाल सागर के नक्शे पर नजर डालें तो अदन शहर केवल एक प्रशासनिक राजधानी नहीं है, बल्कि यह देश का सबसे महत्वपूर्ण तटीय और आर्थिक केंद्र है। जब 2014-15 में हूती विद्रोहियों ने देश की राजधानी सना (Sanaa) पर कब्जा कर लिया था, तब सरकार को अदन से ही अपनी गतिविधियां संचालित करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। हालांकि, अब हूती लड़ाकों ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तटीय इलाकों और तैज़ (Taiz) शहर के आसपास के हिस्सों को पूरी तरह घेर लिया है और अदन से महज़ कुछ किलोमीटर की दूरी पर अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। वर्ष 2015 में यमन युद्ध की शुरुआत के बाद यह पहला मौका है जब हूती विद्रोही इतनी बड़ी बढ़त बनाते हुए सीधे अदन के दरवाजे पर आ पहुंचे हैं। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, हूती विद्रोहियों ने भारी गोलाबारी, लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों और सुसाइड ड्रोन का एक साथ इस्तेमाल करके सऊदी समर्थित सरकारी बलों की रक्षा पंक्तियों (Defence Lines) को छिन्न-भिन्न कर दिया है। अदन एयरपोर्ट को निशाना बनाए जाने के बाद उड़ानों का संचालन रोकना पड़ा है, जिससे अदन शहर देश के बाकी हिस्सों से लगभग कट सा गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने सऊदी अरब के सैन्य नेतृत्व और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की रणनीतिक योजनाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सऊदी अरब ने पिछले एक दशक में अरबों डॉलर के अमेरिकी व यूरोपीय अत्याधुनिक हथियार खरीदे हैं और यमन में अपने समर्थन वाली सरकार को बचाने के लिए एक विशाल सैन्य गठबंधन का नेतृत्व किया है। इसके बावजूद, जमीनी हकीकत यह है कि सऊदी गठबंधन की भारी हवाई बमबारी के बाद भी हूती लड़ाकों के हौसले पस्त नहीं किए जा सके। जानकारों का मानना है कि हूती विद्रोही गुरिल्ला वारफेयर (गैनिमी युद्ध) में बेहद माहिर हैं और उन्हें पहाड़ियों तथा कठिन भौगोलिक इलाकों का पूरा फायदा मिल रहा है। दूसरी तरफ, सऊदी समर्थित सरकारी बलों के भीतर आंतरिक गुटबाजी, दक्षिणी अलगाववादियों (STC) और वफादार बलों के बीच तालमेल की कमी ने हूती विद्रोहियों के काम को बेहद आसान बना दिया है। सऊदी वायुसेना के हवाई हमलों के बावजूद हूती लड़ाकों की सप्लाई लाइन को पूरी तरह से काटा नहीं जा सका, जिसका नतीजा यह हुआ कि लड़ाके सीधे अदन की सीमा पर आ पहुंचे।
हूती विद्रोहियों की अदन की ओर इस तेज बढ़त का असर केवल यमन की सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि इसका सीधा झटका अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री जहाजों की आवाजाही को लगेगा। अदन की खाड़ी और बाब-अल-मंदेब (Bab al-Mandeb) जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे व्यस्त और महत्वपूर्ण समुद्री जलमार्ग है, जहां से वैश्विक तेल और मालवाहक जहाजों का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। हूती लड़ाके पहले से ही लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय मर्चेंट जहाजों को निशाना बनाते रहे हैं और अब यदि अदन पर भी उनका दबदबा या सीधा नियंत्रण हो जाता है, तो पूरा समुद्री मार्ग उनके मिसाइल और ड्रोन की सीधी रेंज में आ जाएगा। इससे स्वेज नहर के रास्ते होने वाला वैश्विक व्यापार पूरी तरह प्रभावित हो सकता है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल और माल ढुलाई के खर्च में बड़ा इजाफा होने का खतरा पैदा हो गया है। अमेरिका और पश्चिमी देश इस स्थिति को लेकर बेहद चिंतित हैं क्योंकि इस जलमार्ग की सुरक्षा उनके लिए एक बड़ी प्राथमिकता रही है।
यमन की मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि संयुक्त राष्ट्र (UN) की मध्यस्थता में हुआ पिछला युद्धविराम अब पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है और यमन एक भयावह मानवीय और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ गया है। यदि सऊदी अरब और उसका सैन्य गठबंधन अगले कुछ घंटों या दिनों में हूती विद्रोहियों की इस बढ़त को पीछे धकेलने में नाकाम रहता है, तो अदन में बैठी सरकार को देश छोड़कर भागने या किसी तीसरे स्थान पर शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। इससे न केवल यमन में ईरान का प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ जाएगा, बल्कि सऊदी अरब के दक्षिणी सीमाओं की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी। मानवाधिकार संगठनों ने चेतावनी दी है कि अदन और आसपास के इलाकों में जारी इस घमासान के कारण लाखों की संख्या में आम नागरिक विस्थापित हो रहे हैं और देश में भोजन, पानी तथा दवाओं की भारी किल्लत होने लगी है। आने वाले कुछ दिन यमन के भविष्य और पूरे मध्य पूर्व के शक्ति संतुलन (Power Balance) को तय करने में बेहद निर्णायक साबित होने वाले हैं
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