क्या बांग्लादेश में तारिक रहमान सरकार का भी होने वाला है तख्तापलट

दक्षिण एशियाई राजनीति के सबसे संवेदनशील केंद्र माने जाने वाले बांग्लादेश की राजधानी ढाका में एक बार फिर तख्तापलट (Coup) और भारी सियासी उथल-पुथल की खबरें बेहद तेज हो गई हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के प्रमुख तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ देश के सुरक्षा तंत्र, सेना और कट्टरपंथी गुटों के भीतर असंतोष का माहौल गहराता दिखाई दे रहा है। ढाका स्थित बंगभवन, प्रधान मंत्री कार्यालय और कैंटोनमेंट के प्रशासनिक गलियारों में देर रात तक उच्चस्तरीय बैठकों का सिलसिला जारी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले कुछ हफ्तों से देश में उभरे आर्थिक संकट, कपड़ा उद्योग में भड़की भीषण मजदूर हिंसा और विदेश नीति को लेकर पैदा हुए मतभेद ने सरकार की नींव हिला दी है। ढाका की सड़कों पर सुरक्षा बलों की गश्त अचानक बढ़ा दी गई है और पूरे शहर में संभावित सैन्य कार्रवाई या सरकार के पुनर्गठन को लेकर तरह-तरह की अटकलों का बाजार गर्म है।

तारिक रहमान सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती देश की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले रेडीमेड गारमेंट (RMG) सेक्टर का पूरी तरह ठप पड़ जाना बनी है। ढाका, गाजीपुर, आशुलिया और सावरे जैसे विशाल औद्योगिक केंद्रों में 500 से अधिक फैक्ट्रियों पर ताले लटक चुके हैं और 10 लाख से अधिक मजदूर सड़कों पर उतरकर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं। न्यूनतम वेतन वृद्धि और भुखमरी जैसी स्थिति से परेशान मजदूर पुलिस और बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के जवानों से सीधे टकरा रहे हैं। राजमार्गों पर आगजनी, बैंक और गोदामों में तोड़फोड़ की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि नई सरकार कानून व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा बांग्लादेश की विकास दर 40 वर्षों के सबसे निचले स्तर पर रहने का अनुमान जताए जाने के बाद सरकार के खिलाफ आम जनता के साथ-साथ व्यापारी वर्ग और प्रशासनिक अधिकारियों का गुस्सा भी अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुका है।

बांग्लादेश की अंदरूनी राजनीति में कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के बढ़ते वर्चस्व ने सेना और खुफिया एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। तारिक रहमान पर यह आरोप लग रहे हैं कि वे जमात के भारत-विरोधी नैरेटिव और रणनीतिक दबाव के आगे झुकते नजर आ रहे हैं। भारत के साथ 30 साल पुरानी ऐतिहासिक गंगा जल बंटवारा संधि (Farakka Barrage Water Treaty) के नवीनीकरण को लेकर सरकार के ढुलमुल रवैये और बार-बार राजनयिक बैठकों के टलने से पड़ोसी देशों के साथ-साथ बांग्लादेश के सैन्य प्रतिष्ठान में भी भारी बेचैनी है। बांग्लादेशी सेना का एक शक्तिशाली गुट यह मानता है कि भारत से रणनीतिक दूरी और पाकिस्तान की ओर अत्यधिक झुकाव देश के आर्थिक और सुरक्षा हितों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। इसी वजह से सेना के शीर्ष अधिकारी और नागरिक प्रशासन के वरिष्ठ प्रतिनिधि लगातार बंद कमरों में आपात बैठकें कर रहे हैं, जिसे एक नए प्रशासनिक तख्तापलट या अंतरिम शासन के रूप में देखा जा रहा है।

दूसरी ओर, भारत में रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री और अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना ने भी अपना रुख कड़ा कर लिया है और वे अपने खिलाफ लगे सभी मुकदमों को खारिज करने तथा निष्पक्ष जांच की मांग पर अड़ी हुई हैं। अवामी लीग के भूमिगत कार्यकर्ता और समर्थकों ने देश के विभिन्न हिस्सों में सरकार विरोधी गतिविधियों को तेज कर दिया है। शेख हसीना के बयानों और अवामी लीग की वापसी की रणनीति ने तारिक रहमान की BNP सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ जहाँ उन्हें अपनी ही सरकार के भीतर जमात-ए-इस्लामी के प्रभुत्व का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ शेख हसीना का राजनीतिक रूप से अड़े रहना और देशव्यापी असंतोष ढाका के मौजूदा सत्ता चक्र के अंत की ओर संकेत कर रहा है। यदि अगले 48 घंटों में ढाका की बैठकों से कोई ठोस प्रशासनिक समाधान नहीं निकला, तो बांग्लादेश एक बार फिर सैन्य हस्तक्षेप या बड़े तख्तापलट के मुहाने पर खड़ा हो सकता है।