
दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय परियोजनाओं में शामिल अफ्रीका का ‘ग्रेट GREEN WALL’ (ग्रेट ग्रीन वॉल) अभियान इस समय पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। लगभग 8,000 किलोमीटर लंबी यह ऐतिहासिक पहल पश्चिमी अफ्रीका के सेनेगल के अटलांटिक तट से शुरू होकर पूर्वी अफ्रीका के जिबूती तक फैली हुई है। इस पूरी योजना का मुख्य मकसद सिर्फ पेड़ लगाना भर नहीं है, बल्कि उन इलाकों को दोबारा से हरा-भरा और जीवंत बनाना है जो दशकों से भीषण सूखे, रेगिस्तान के बढ़ते फैलाव और जलवायु परिवर्तन की तगड़ी मार झेल रहे हैं। अफ्रीकी संघ (African Union) ने इस दूरदर्शी परियोजना की शुरुआत साल 2007 में की थी।
शुरुआत में सिर्फ पेड़ लगाने का था प्लान, फिर यूं बदली पूरी रणनीति
शुरुआती दिनों में वैज्ञानिकों और योजनाकारों की सोच सहारा रेगिस्तान की दक्षिणी सीमा पर पेड़ों की एक सीधी, लंबी और चौड़ी पट्टी तैयार करने की थी, ताकि रेगिस्तानी हवाओं और रेत को आगे बढ़ने से रोका जा सके। हालांकि, जैसे-जैसे समय बीता, पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने अध्ययन में पाया कि केवल पेड़ों की कतारें खड़ी कर देने से इस गंभीर संकट का स्थायी हल संभव नहीं है। इसके बाद परियोजना की रणनीति में बुनियादी बदलाव किया गया। अब इसका मुख्य फोकस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को नए सिरे से पुनर्जीवित करने पर है। इसके तहत जंगलों, प्राकृतिक घास के मैदानों, कृषि योग्य जमीनों, आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) और स्थानीय प्रजाति की वनस्पतियों को फिर से पनपाया जा रहा है।
आखिर साहेल क्षेत्र को क्यों पड़ी इस विशाल हरित दीवार की जरूरत?
अफ्रीका का साहेल (Sahel) क्षेत्र कई दशकों से लगातार बड़े पर्यावरणीय संकट से जूझता रहा है। यहां रेगिस्तान का दायरा बढ़ता गया, लंबे समय तक अकाल और सूखे की स्थिति बनी रही, मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घटती गई और जलवायु परिवर्तन के असर से बारिश का समय व चक्र पूरी तरह अनिश्चित हो गया। साहेल की एक बड़ी आबादी पूरी तरह से पारंपरिक खेती और पशुपालन पर निर्भर है। जमीन की उर्वरता घटने और बारिश न होने से फसलों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ, जिससे क्षेत्र में भोजन का गंभीर संकट खड़ा हो गया और लोगों की कमाई के साधन छिन गए। यही वजह है कि इस अभियान के माध्यम से मिट्टी की सेहत सुधारने, जमीन में नमी व पानी रोकने की क्षमता बढ़ाने और खेती को दोबारा मुनाफेदार बनाने की कोशिश की जा रही है।
सिर्फ पेड़ों की कतार नहीं, स्थानीय जरूरतों के हिसाब से तैयार हुई रणनीति
नाम में भले ही ‘ग्रीन वॉल’ यानी हरी दीवार जुड़ा हो, लेकिन यह कोई सीधी या एकसार पेड़ों की पट्टी नहीं है। असल में यह स्थानीय इलाकों की जरूरत के मुताबिक ढाली गई सैकड़ों छोटी-बड़ी पुनर्स्थापन परियोजनाओं का एक व्यवस्थित समूह है। जहां जिस चीज की जरूरत है, वहां वैसा काम किया जा रहा है—कहीं स्थानीय किस्म के पेड़ रोपे जा रहे हैं, तो कहीं खुद-ब-खुद उगने वाली प्राकृतिक वनस्पतियों को सुरक्षित किया जा रहा है। कई क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव को रोकने, वर्षा जल संचयन (रेनवाटर हार्वेस्टिंग) को बढ़ावा देने, घास के मैदानों को हरा-भरा करने और टिकाऊ खेती के नए तरीकों को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है। इस तरह हर इलाके की भौगोलिक स्थिति और जलवायु के अनुसार अलग रणनीति अपनाई गई है।
वर्ष 2030 तक क्या हासिल करने का है महालक्ष्य?
ग्रेट ग्रीन वॉल परियोजना के तहत साल 2030 तक के लिए कुछ बेहद ठोस और बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं:
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लगभग 10 करोड़ हेक्टेयर खराब और बंजर हो चुकी भूमि को फिर से उपजाऊ बनाना।
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वायुमंडल से करीब 25 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड को प्राकृतिक रूप से अवशोषित करना।
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अफ्रीका में लगभग 1 करोड़ नए हरित रोजगार (Green Jobs) के अवसर पैदा करना।
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साहेल क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों के भोजन की सुरक्षा और आजीविका के साधनों को मजबूत करना।
इस विशाल महाअभियान में 20 से भी अधिक अफ्रीकी देश एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठन, वैश्विक विकास बैंक और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी संस्थाएं भी इसमें वित्तीय और तकनीकी सहयोग दे रही हैं।
अब तक कितना हुआ काम और क्या हैं जमीनी चुनौतियां?
यह सच है कि परियोजना अभी अपने अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुंची है, लेकिन कई भागीदार देशों में इसके शानदार परिणाम देखने को मिले हैं। सेनेगल में अब तक लाखों पेड़ लगाए जा चुके हैं और वहां की बड़े पैमाने पर बंजर हो चुकी जमीन दोबारा हरी-भरी हो गई है। इथियोपिया ने भी अपने स्तर पर बड़े पैमाने पर भूमि सुधार कार्यक्रम चलाए हैं। वहीं नाइजीरिया और नाइजर जैसे देशों में टिकाऊ भूमि प्रबंधन के जरिए सकारात्मक बदलाव आए हैं।
हालिया सरकारी और पर्यावरण आकलनों के मुताबिक, अब तक लगभग 3 करोड़ हेक्टेयर भूमि को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया जा चुका है। हालांकि, पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि 2030 तक के सभी लक्ष्यों को शत-प्रतिशत हासिल करने के लिए और अधिक अंतरराष्ट्रीय निवेश, क्षेत्रीय देशों के बीच बेहतर आपसी तालमेल और सुरक्षा चुनौतियों से प्रभावित क्षेत्रों में शांति व्यवस्था की सख्त आवश्यकता होगी।
प्रकृति के साथ-साथ आम जनता के लिए भी वरदान बनी परियोजना
बंजर जमीन और हरियाली का यह पुनर्जीवन केवल प्रकृति के बचाव तक सीमित नहीं है। एक स्वस्थ और मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी के बहाव को रोकता है, जमीनी जल स्तर (ग्राउंडवाटर) को सुधारता है और हवा से घातक कार्बन सोखता है। इसके साथ ही, स्थानीय कीटों, पक्षियों और अन्य वन्यजीवों के लिए एक बेहतर सुरक्षित प्राकृतिक आवास तैयार होता है। दूसरी ओर, स्थानीय किसानों और पशुपालकों को फसलों का बेहतर पैदावार, मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा और नियमित आय की गारंटी मिलती है। भीषण सूखे जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी ऐसी संवारी गई जमीन ज्यादा समय तक टिकी रहती है।
पूरी दुनिया के लिए क्यों बेहद खास है यह अफ्रीकी मॉडल?
आज के समय में ग्रेट ग्रीन वॉल को दुनिया की सबसे बड़ी पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापना (Ecosystem Restoration) परियोजनाओं में गिना जाता है। इसकी महत्ता केवल अफ्रीका महाद्वीप तक सीमित नहीं है, क्योंकि जमीन का बंजर होना और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियां पूरी दुनिया की साझी समस्या हैं। अगर यह मॉडल पूरी तरह सफल रहता है, तो दुनिया के अन्य शुष्क (Arid) और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए भी यह एक बेहतरीन मिसाल साबित होगा। यह परियोजना साबित करती है कि पर्यावरण की रक्षा और आर्थिक विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
इंसानों और प्रकृति को जोड़ने वाली उम्मीद की एक अनोखी दीवार
इतिहास गवाह है कि दुनिया में अधिकांश दीवारें इंसानों को आपस में बांटने और सीमाएं खींचने के लिए बनाई गईं, लेकिन अफ्रीका की यह ‘ग्रेट ग्रीन वॉल’ इंसानों और प्रकृति को दोबारा एक-दूसरे से जोड़ने की अनूठी कोशिश है। इस विशाल अभियान की असली सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितने पौधे रोपे गए, बल्कि इससे आंकी जाएगी कि कितनी बंजर जमीन फिर से अनाज उगाने लायक बनी, कितने परिवारों का जीवन स्तर सुधरा, जैव विविधता में कितना सुधार आया और जलवायु परिवर्तन के झटकों का सामना करने में स्थानीय समुदाय कितने सक्षम बने। यही वजह है कि यह हरित दीवार केवल आज का अभियान नहीं, बल्कि आने वाले भविष्य के सामाजिक और आर्थिक बदलाव की एक मजबूत बुनियाद है।
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