CJI से स्थायी 5 जजों की संविधान पीठ बनाने की मांग, फैसलों में लेटलतीफी को बताया ‘संस्थागत असहजता’

देश की शीर्ष अदालत ने संवैधानिक व्याख्या और मौलिक अधिकारों से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मामलों के वर्षों तक लंबित रहने पर बेहद तीखी और गंभीर चिंता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठ न्यायाधीशों—न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा—ने इस व्यवस्थागत ढिलाई पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए इसे ‘संस्थागत असहजता’ (Institutional Embarrassment) करार दिया है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयुक्तों (EC) की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अपनी राय दर्ज करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के व्याख्या से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्नों का समय पर निस्तारण न होना सीधे तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। अदालत ने स्पष्ट माना कि अब वह समय आ चुका है जब न्यायपालिका को अपनी इस कार्यप्रणाली पर गंभीर आत्मनिरीक्षण (Introspection) करने की सख्त आवश्यकता है।

दोनों न्यायाधीशों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से एक बेहद ऐतिहासिक और प्रणालीगत आग्रह किया है। पीठ ने सिफारिश की है कि सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक प्रश्नों, कानूनों की वैधता और नीतिगत संदर्भों का तेजी से निपटारा करने के लिए एक ‘स्थायी पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ’ (Permanent 5-Judge Constitution Bench) गठित करने पर गंभीरता से विचार किया जाए। वर्तमान व्यवस्था में जब भी कोई मामला वृहद पीठ को संदर्भित किया जाता है, तो उसके लिए रोस्टर और जजों की उपलब्धता के आधार पर तदर्थ (Ad-hoc) पीठों का गठन किया जाता है, जिसके कारण मामलों की पहली सुनवाई शुरू होने में ही कई-कई साल बीत जाते हैं। एक स्थायी पीठ के अस्तित्व में आने से संवैधानिक संदर्भों का नियमित और बिना किसी अनावश्यक व्यवधान के समाधान संभव हो सकेगा।

अपनी इस गंभीर चिंता को तार्किक और अकाट्य आंकड़ों के साथ सिद्ध करने के लिए न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट के दो बहुचर्चित ऐतिहासिक मामलों का विस्तृत दृष्टांत दिया। पीठ ने सबसे पहले ‘अनूप बरनवाल बनाम केंद्र सरकार’ मामले का उल्लेख किया, जिसमें चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर वर्ष 2015 में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर की गई थी। इस याचिका को पांच जजों की संविधान पीठ को भेजने में ही तीन वर्ष लग गए और यह संदर्भ 2018 में भेजा गया। इसके बाद संविधान पीठ द्वारा विस्तृत सुनवाई कर अंतिम फैसला सुनाने में पांच वर्ष का लंबा समय और बीत गया। इस प्रकार एक अत्यंत बुनियादी और लोकतांत्रिक महत्व के मामले को निर्णय तक पहुंचने में पूरे आठ वर्ष लग गए, जिसके बाद संसद ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तें अधिनियम 2023 पारित किया।

इसके अलावा पीठ ने ‘उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह’ के ऐतिहासिक विवाद की याद दिलाई, जो न्याय प्रणाली में लेटलतीफी का एक अप्रत्याशित उदाहरण है। इस मामले में पहले संदर्भ 2002 से लगभग 15 वर्षों तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। इसके बाद सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा किए गए संदर्भ को नौ न्यायाधीशों की वृहद पीठ तक पहुंचने में 9 साल का लंबा वक्त लग गया, और नौ जजों की पीठ के गठन के बाद निर्णय आने में पांच महीने और लगे। इस प्रकार दो दशकों से अधिक का समय केवल न्यायिक संदर्भों के एक पीठ से दूसरी पीठ तक स्थानांतरित होने में बीत गया। पीठ ने कहा कि जब देश की सबसे बड़ी अदालत में ही निर्णयों की यह गति हो, तो याचिकाकर्ताओं की यह आशंका और घबराहट पूरी तरह उचित और स्वाभाविक प्रतीत होती है कि पांच जजों की पीठ को भेजे गए मामले कई वर्षों तक अनिर्णीत ही पड़े रह जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने दो टूक शब्दों में रेखांकित किया कि संवैधानिक प्रश्नों का निष्पक्ष, त्वरित और प्रामाणिक समाधान निकालना इस अदालत और उसके न्यायाधीशों का सबसे पहला और प्राथमिक वैधानिक दायित्व है। इस मूल कार्य को किसी भी परिस्थिति में दोयम दर्जे पर नहीं रखा जा सकता और यह हमेशा न्यायालय की सर्वोच्च कार्य-प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए। जजों ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि किसी मामले का पांच वर्ष, दस वर्ष या बीस वर्ष से भी अधिक समय तक बिना किसी ठोस निर्णय के लंबित रहना किसी भी तरह से इस महान न्यायिक संस्थान की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा के अनुकूल नहीं है।

अदालत ने कहा कि यदि न्यायपालिका के पिछले आंकड़ों को ही मार्गदर्शक पैमाना मान लिया जाए, तो आज कोई भी व्यक्ति, विधि विशेषज्ञ या याचिकाकर्ता विश्वास के साथ यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि किसी वृहद पीठ को भेजा गया मामला कब सुना जाएगा और उसका अंतिम समाधान कब निकलकर सामने आएगा। पीठ ने कहा कि मामलों में यह अंतहीन देरी न्याय की अवधारणा को ही समाप्त कर देती है। इसलिए अब वह निर्णायक मोड़ आ गया है जब सुप्रीम कोर्ट को इस संस्थागत व्याधि का समाधान उसी तात्कालिकता, गंभीरता और तत्परता के साथ करना होगा, जिसकी यह संवैधानिक मांग करती है।

अपने आदेश के समापन खंड में जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा ने इस बात पर विशेष बल दिया कि पांच जजों या उससे बड़ी संविधान पीठ के समक्ष जो भी कानूनी मुद्दे विचार के लिए आते हैं, वे किसी दो पक्षों का निजी दीवानी विवाद नहीं होते, बल्कि वे देश के लोकतांत्रिक ढांचे, संसदीय संप्रभुता और करोड़ों नागरिकों के मौलिक अधिकारों के अस्तित्व से जुड़े होते हैं। ऐसे विषयों पर निर्णय में विलंब का सीधा असर देश की विधायिका, कार्यपालिका और आम जनता के अधिकारों पर पड़ता है। जब तक संविधान पीठ किसी कानून पर अपना स्पष्ट मत नहीं देती, तब तक देश में नीतिगत अनिश्चितता का माहौल बना रहता है।

पीठ ने उम्मीद और दृढ़ विश्वास जताया कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मौजूदा संदर्भ को उन पुराने मुकदमों की तरह वर्षों के लंबे और अंतहीन इंतजार का शिकार नहीं होना पड़ेगा। न्यायाधीशों ने विश्वास व्यक्त किया कि सीजेआई इस मामले की संवेदनशीलता और भविष्य के संवैधानिक संकटों को ध्यान में रखते हुए स्थायी संविधान पीठ के गठन की दिशा में ठोस और ऐतिहासिक कदम उठाएंगे, ताकि भारतीय न्यायपालिका की साख, पारदर्शिता और त्वरित न्याय देने की उसकी संवैधानिक प्रतिबद्धता अक्षुण्ण बनी रहे।