संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर भारत को मिला यूएन महासचिव का बड़ा साथ

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारत के लिए एक बेहद राहत भरी और बड़ी खबर सामने आई है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों और भारत की स्थायी सदस्यता के लंबे समय से चल रहे दावों को अब खुद संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व का मजबूत समर्थन मिल गया है। यूएन महासचिव ने अपने विदाई भाषण और कार्यकाल के आखिरी दौर में सुरक्षा परिषद के मौजूदा ढांचे को अप्रचलित बताते हुए इसमें तत्काल और व्यापक सुधारों की जोरदार वकालत की है। महासचिव के इस स्पष्ट समर्थन से वैश्विक पटल पर भारत की कूटनीतिक स्थिति और अधिक मजबूत हो गई है, क्योंकि भारत दशकों से यह मांग करता आ रहा है कि बदलती हुई दुनिया के भू-राजनीतिक समीकरणों के मुताबिक सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना अनिवार्य है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पुराने ढांचे पर महासचिव की दो टूक टिप्पणी

अपने संबोधन में यूएन के शीर्ष अधिकारी ने दो टूक शब्दों में कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाए गए संयुक्त राष्ट्र के नियम और सुरक्षा परिषद का ढांचा आज की आधुनिक दुनिया की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता है। उन्होंने साफ तौर पर रेखांकित किया कि मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों की व्यवस्था अब वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में नाकाम साबित हो रही है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक असमानता और क्षेत्रीय संघर्षों से जूझती दुनिया में यदि संयुक्त राष्ट्र को अपनी प्रासंगिकता और विश्वसनीयता बचाए रखनी है, तो यूएनएससी का विस्तार करना ही होगा। इस बयान को कूटनीतिक हलकों में भारत के उस रुख की बड़ी जीत माना जा रहा है, जिसमें भारत लगातार यह कहता रहा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति को सुरक्षा परिषद से बाहर रखना वैश्विक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

भारत की स्थायी सदस्यता की मांग और वैश्विक कूटनीति का बदलता परिदृश्य

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार रहा है। भारत का यह तर्क पूरी तरह तार्किक है कि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे अधिक आबादी वाले देश को वैश्विक शांति और सुरक्षा तय करने वाले सबसे बड़े मंच पर स्थायी जगह मिलनी ही चाहिए। यूएन महासचिव द्वारा अपने आखिरी कार्यकाल में इस मुद्दे को इतनी प्रमुखता से उठाया जाना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस बात को स्वीकार करने लगा है कि भारत के बिना संयुक्त राष्ट्र में कोई भी सुधार अधूरा है। हालांकि, कुछ देश अपने निहित स्वार्थों के चलते इस प्रक्रिया में लगातार अड़ंगे लगाने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन वैश्विक जनमत और अधिकांश देशों का बढ़ता समर्थन भारत की स्थिति को हर मोर्चे पर अपरिहार्य बना रहा है।

ग्लोबल साउथ की आवाज और भारत का नेतृत्व

आज के समय में भारत केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि पूरे ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील और पिछड़े देशों के अधिकारों के लिए एक मजबूत आवाज बनकर उभरा है। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर जब भी अफ्रीकी, एशियाई और लातीनी अमेरिकी देशों के प्रतिनिधित्व की बात आती है, तो भारत सबसे आगे खड़ा नजर आता है। यूएन महासचिव ने भी अपने भाषण में इस बात पर विशेष जोर दिया कि सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों की अनुपस्थिति के कारण वैश्विक फैसलों पर पश्चिमी देशों का दबदबा बना रहता है, जिसे बदला जाना अब समय की सबसे बड़ी मांग है। भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय की नीतियों का ही असर है कि आज दुनिया के तमाम बड़े देश और खुद संयुक्त राष्ट्र का नेतृत्व भारत को एक जिम्मेदार और नेतृत्वकर्ता वैश्विक शक्ति के रूप में देखने लगे हैं।

भविष्य की चुनौतियां और सुरक्षा परिषद सुधारों की लंबी राह

भले ही संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व ने सुरक्षा परिषद में सुधारों और भारत के पक्ष में खुलकर अपनी बात रखी हो, लेकिन इस राह में अभी कई कूटनीतिक और प्रक्रियागत बाधाएं बाकी हैं। यूएनएससी के चार्टर में संशोधन करने और स्थायी सदस्यता का विस्तार करने के लिए सभी मौजूदा स्थायी सदस्यों की सहमति और आमसहमति की लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बावजूद, महासचिव के इस आखिरी और ऐतिहासिक भाषण ने वैश्विक बहस को एक नई दिशा दे दी है। आने वाले समय में जब भी संयुक्त राष्ट्र महासभा या सुरक्षा परिषद की उच्चस्तरीय बैठकें होंगी, तो यह बयान भारत के पक्ष में एक मजबूत हथियार साबित होगा। इससे यह तय हो गया है कि वैश्विक पटल पर भारत की अनदेखी करना अब किसी भी देश के लिए मुमकिन नहीं होगा और आने वाला समय भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत का गवाह बनेगा।