KGMU Trauma Centre Lucknow: केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर के बाहर निजी अस्पताल के एजेंटों का जाल, प्रयागराज के बेबस पिता का दर्दनाक वीडियो वायरल

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के ट्रॉमा सेंटर के बाहर से एक बेहद झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के इर्द-गिर्द पनप रहे कथित बिचौलियों के नेटवर्क को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पूरे उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से गंभीर मरीज जिंदगी की उम्मीद लेकर केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर पहुंचते हैं। लेकिन आरोप है कि ट्रॉमा सेंटर के गेट और पार्किंग क्षेत्र के बाहर ऐसे कथित एजेंट और निजी एंबुलेंस संचालक सक्रिय रहते हैं जो तीमारदारों की मजबूरी, बदहवासी और लाचारी का फायदा उठाते हैं। ये लोग परिजनों को सरकारी अस्पताल में ‘बेड नहीं मिलने’, ‘डॉक्टरों की अनुपलब्धता’ या ‘उचित देखभाल न होने’ का डर दिखाकर उन्हें निजी अस्पतालों में ले जाने के लिए फुसलाते हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो ने इस काले धंधे की जमीनी हकीकत को उजागर करते हुए प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।

इंटरनेट पर तेजी से प्रसारित हो रहे वीडियो में प्रयागराज निवासी एक पीड़ित पिता अपने आंसुओं के साथ आपबीती सुनाता नजर आ रहा है। पीड़ित के अनुसार, वह अपनी बेटी की गंभीर बीमारी का इलाज कराने बड़ी उम्मीदों के साथ लखनऊ केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर पहुंचा था। अस्पताल परिसर के पास पहुंचते ही उसकी मुलाकात एक निजी एंबुलेंस कर्मचारी से हुई, जिसकी पहचान पीड़ित ने दिलीप त्रिवेदी के रूप में बताई है। पीड़ित पिता का आरोप है कि उक्त कर्मचारी ने उसे यह कहकर बुरी तरह डरा दिया कि सरकारी अस्पताल में लंबी लाइन है, कोई वरिष्ठ डॉक्टर मरीज को देखने नहीं आएगा और इलाज में देरी हुई तो बच्ची की जान खतरे में पड़ जाएगी। इसके बजाय उसने शहर के एक निजी अस्पताल में कम खर्च पर तुरंत वीआईपी इलाज और सभी आधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने का सब्जबाग दिखाया। घबराए पिता ने बच्ची की जान बचाने के चक्कर में उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

पीड़ित पिता का कहना है कि निजी अस्पताल पहुंचने के बाद शुरुआत से ही लूट-खसोट का सिलसिला शुरू हो गया। भर्ती कराने से लेकर आईसीयू, महंगी दवाइयां, तरह-तरह की जांचों और वेंटिलेटर चार्ज के नाम पर परिजनों से लगातार मोटी रकम वसूली जाती रही। पिता के मुताबिक, जब तक उसके पास जमा पूंजी और कर्ज का पैसा रहा, अस्पताल प्रबंधन ने उसे झूठी तसल्ली दी। लेकिन जब पीड़ित परिवार पाई-पाई के लिए मोहताज हो गया और इलाज का भारी-भरकम बिल चुकाने में असमर्थ होने लगा, तब तक बच्ची की हालत और बिगड़ चुकी थी। आखिरकार इलाज के दौरान उस मासूम बच्ची ने दम तोड़ दिया। अपनी बेटी को खो चुके और लाखों रुपये के कर्ज में डूबे पिता ने रो-रोकर एंबुलेंस कर्मचारी और निजी अस्पताल के सिंडिकेट पर आर्थिक शोषण व लापरवाही का खुला आरोप लगाया है।

यह दर्दनाक वाकया केवल किसी एक परिवार की त्रासदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लखनऊ के बड़े सरकारी अस्पतालों (केजीएमयू, पीजीआई, लोहिया संस्थान) के इर्द-गिर्द फैले संगठित ‘कट-कमीशन’ कल्चर की पोल खोलता है। आए दिन ऐसी शिकायतें सामने आती हैं कि निजी एंबुलेंस चालकों, पैथोलॉजी लैब प्रतिनिधियों और कुछ निजी क्लीनिक्स के बीच सांठगांठ होती है। मरीज को किसी विशेष निजी अस्पताल तक पहुंचाने के बदले इन एजेंटों को भारी कमीशन मिलता है। दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले सीधे-सादे तीमारदार कागजी औपचारिकताओं और ट्रॉमा सेंटर में भारी भीड़ देखकर वैसे ही घबराए रहते हैं। ऐसे में ये दलाल हमदर्द बनकर उन्हें अपने जाल में फंसाते हैं और सीधे निजी नर्सिंग होम में शिफ्ट करा देते हैं, जहां से मरीज के परिजनों के आर्थिक व मानसिक दोहन का सिलसिला शुरू होता है।

वायरल वीडियो के संज्ञान में आने के बाद स्थानीय लोगों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज कर दी है। हालांकि, वायरल वीडियो में लगाए गए आरोपों की अभी तक कोई आधिकारिक या स्वतंत्र प्रशासनिक पुष्टि नहीं हुई है। लखनऊ पुलिस और संबंधित स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम द्वारा मामले की पड़ताल की जा रही है। जांच अधिकारियों का कहना है कि वीडियो में नामित एंबुलेंस कर्मचारी और संबंधित निजी अस्पताल के दस्तावेजों, बिलों और सीसीटीवी फुटेज की बारीकी से जांच की जाएगी। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों और अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कानूनी धाराओं में कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी ताकि किसी अन्य पीड़ित के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो सके।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन ने सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों और उनके परिजनों से अपील की है कि वे किसी भी अज्ञात व्यक्ति, अनाधिकृत एंबुलेंस चालक या एजेंट की बातों में न आएं। केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर में ट्रायज एरिया और जनसंपर्क अधिकारी (PRO) काउंटर 24 घंटे कार्यरत रहते हैं। किसी भी असमंजस की स्थिति में सीधे अस्पताल के रिसेप्शन या ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों और मेडिकल स्टाफ से संपर्क करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति सरकारी इलाज को लेकर गुमराह करे या जबरन निजी अस्पताल ले जाने का दबाव बनाए, तो तुरंत अस्पताल में बने पुलिस चौकी या यूपी-112 पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए ताकि इन बिचौलियों पर लगाम कसी जा सके।