
देश और दुनिया में ‘विश्व की फार्मेसी’ के रूप में अपनी साख मजबूत कर चुके भारत के दवा उद्योग में गुणवत्ता से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ केंद्र की मोदी सरकार ने बेहद कड़ा और निर्णायक रुख अख्तियार कर लिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय (Ministry of Health and Family Welfare) ने ड्रग्स रूल्स, 1945 (Drugs Rules, 1945) में संशोधन का नया ड्राफ्ट जारी करते हुए यह कड़ा प्रावधान प्रस्तावित किया है कि यदि सरकारी विश्लेषक (Government Analyst) की जांच में किसी भी कंपनी की दवा महत्वपूर्ण गुणवत्ता मानकों (Critical Quality Standards) पर खरी नहीं उतरती है, तो उस कंपनी का मैन्युफैक्चरिंग लाइसेंस बिना किसी प्रशासनिक देरी के तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया जाएगा।
सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य उन सभी खामियों को जड़ से समाप्त करना है, जिनके चलते पहले दवा ‘नॉट ऑफ स्टैंडर्ड क्वालिटी’ (NSQ) घोषित होने के बाद भी लंबी कानूनी व प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण संबंधित बैच या यूनिट पर कार्रवाई में हफ्तों और महीनों का समय लग जाता था। नए सख्त नियमों के तहत अब मरीजों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति लागू की जा रही है।
पूर्ववर्ती व्यवस्था में जब किसी दवा का सैंपल लैब में फेल होता था, तो रेगुलेटरी अथॉरिटीज कंपनियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी करती थीं। इसके बाद कंपनियों से जवाब मांगा जाता था, उनकी सफाई आती थी और फिर सुनवाई का लंबा दौर चलता था। इस पूरी कागजी प्रक्रिया के दौरान कंपनियों को कई बार उत्पादन जारी रखने या कानूनी पैंतरेबाजी का अवसर मिल जाता था, जिससे मरीजों तक असुरक्षित दवाओं के पहुंचने का खतरा बना रहता था।
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नए मसौदे के अनुसार, जैसे ही सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) या स्टेट ड्रग रेगुलेटरी अथॉरिटी के सरकारी विश्लेषक द्वारा किसी दवा को सबस्टैंडर्ड या मानकों के विपरीत पाया जाएगा, लाइसेंसिंग अथॉरिटी को तुरंत उस दवा के उत्पादन लाइसेंस को निलंबित (Immediate Suspension) करने का सीधा अधिकार होगा। इससे कार्रवाई और रिपोर्ट के बीच का टाइम-गैप शून्य हो जाएगा।
नए नियमों में केवल लाइसेंस सस्पेंड करने का ही नहीं, बल्कि निलंबन वापस लेने (Revocation of Suspension) की प्रक्रिया को भी बेहद पारदर्शी और सख्त बनाया गया है।
ड्राफ्ट नियमों के अनुसार, किसी भी दवा निर्माता कंपनी का सस्पेंशन तब तक बहाल नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह निम्नलिखित अनिवार्य शर्तों को पूरा नहीं कर लेती:
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सुधारात्मक और निवारक उपाय (CAPA): कंपनी को यह साबित करना होगा कि दवा में आई तकनीकी कमी की वजह क्या थी और भविष्य में ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
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नियामक अधिकारियों का ऑन-साइट वेरिफिकेशन: केवल कागजी रिपोर्ट देने से काम नहीं चलेगा; ड्रग इंस्पेक्टर्स और लाइसेंसिंग अथॉरिटी की टीम द्वारा मैन्युफैक्चरिंग प्लांट का भौतिक निरीक्षण (Physical Verification) किया जाएगा।
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पुनः परीक्षण में खरा उतरना: संशोधित बैच के सभी सैंपलों को स्वतंत्र सरकारी लैब्स में दोबारा प्रमाणित कराने के बाद ही फैक्ट्री को दोबारा चालू करने की अनुमति दी जाएगी।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय का यह कड़ा फैसला विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के ‘गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेज’ (GMP) के अनुरूप भारत के शेड्यूल एम (Schedule M) को अपग्रेड करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
विगत वर्षों में कुछ कफ सिरप और दूषित दवाओं से जुड़े विवादों के बाद केंद्र सरकार ने पूरे देश के दवा निर्माण इकोसिस्टम को पारदर्शी बनाने का व्यापक अभियान छेड़ रखा है। इसके तहत सभी छोटी-बड़ी फार्मा कंपनियों के लिए डिजिटल ट्रैकिंग, क्यूआर कोड आधारित पैकेजिंग, ऑटोमेटेड टेस्टिंग उपकरण और जीएमपी का अनुपालन अनिवार्य किया गया है। 65वीं ड्रग्स कंसल्टेटिव कमेटी (DCC) और 92वीं ड्रग्स टेक्निकल एडवाइजरी बोर्ड (DTAB) की सिफारिशों के बाद इस नए नियम का अंतिम मसौदा तैयार किया गया है।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस नए मसौदा नियम को सार्वजनिक करते हुए सभी हितधारकों, फार्मा उद्योग के प्रतिनिधियों और आम जनता से 30 दिनों के भीतर अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराने का समय दिया है।
कोई भी नागरिक या उद्योग प्रतिनिधि स्वास्थ्य मंत्रालय के उप सचिव (ड्रग्स) को डाक द्वारा या ईमेल के माध्यम से अपने सुझाव भेज सकता है। इस 30 दिवसीय परामर्श अवधि के समाप्त होते ही सरकार इस संशोधित नियम को अंतिम रूप से गजट में अधिसूचित कर पूरे देश में अनिवार्य रूप से लागू कर देगी।
केंद्र सरकार के इस सख्त फैसले का सीधा लाभ देश के 140 करोड़ नागरिकों को मिलेगा:
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नकली और घटिया दवाओं का खात्मा: बाजार में कम असरदार या हानिकारक केमिकल वाली दवाओं के सर्कुलेशन पर पूरी तरह लगाम लगेगी।
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वैश्विक मंच पर भारतीय फार्मा की साख: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मेड इन इंडिया’ दवाओं की विश्वसनीयता और गुणवत्ता को नया भरोसा मिलेगा।
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लापरवाह निर्माताओं पर नकेल: कम लागत में घटिया कच्चा माल इस्तेमाल करने वाली या बुनियादी सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाली कंपनियों को अपना प्लांट बंद करना पड़ेगा या कड़े मानकों का पालन करना होगा।
सरकार के इस रुख ने साफ संकेत दे दिया है कि जनस्वास्थ्य और दवाओं की गुणवत्ता के साथ किसी भी स्तर का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
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