
मध्य पूर्व (Middle East) की भू-राजनीति में सऊदी अरब और ईरान के बीच की प्रतिद्वंद्विता दशकों से शक्ति संतुलन के केंद्र में रही है। अगर सैन्य खर्च और अत्याधुनिक हथियारों की बात करें, तो सऊदी अरब दुनिया के सबसे बड़े रक्षा खरीदारों में शुमार है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के मुताबिक, सऊदी अरब का सालाना सैन्य खर्च 70 से 83 अरब डॉलर के आसपास रहता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहे ईरान का आधिकारिक रक्षा बजट महज 7 से 8 अरब डॉलर के करीब सीमित है। यानी कागजों पर सऊदी अरब का सैन्य बजट ईरान से लगभग 11 गुना ज्यादा है। इसके बावजूद जब यमन में ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के खिलाफ युद्ध और सीमा पार से होने वाले हमलों की बात आई, तो सऊदी अरब के सामने गंभीर रणनीतिक चुनौतियां खड़ी हो गईं।
सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए मुख्य रूप से पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन से खरीदे गए आधुनिक हथियारों पर निर्भर रहा है। सऊदी वायुसेना के पास F-15SA, यूरोफाइटर टाइफून जैसे उन्नत लड़ाकू विमान और जमीन पर अमेरिकी पैट्रियट (Patriot PAC-3) और थाड (THAAD) मिसाइल डिफेंस सिस्टम मौजूद हैं।
दूसरी ओर, ईरान दशकों से कड़े अमेरिकी व अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, वित्तीय सीमाओं और पुरानी वायुसेना के साथ काम कर रहा है। इस भारी आर्थिक और तकनीकी असमानता के बावजूद युद्ध के मैदान में हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के तेल रिफाइनरी प्रतिष्ठानों (जैसे अरामको), हवाई अड्डों और सैन्य अड्डों को सटीक निशाना बनाए जाने ने रक्षा विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या केवल भारी रक्षा बजट से आधुनिक युद्ध जीता जा सकता है।
इस सैन्य असमानता के पीछे सबसे बड़ा कारण ‘असिमेट्रिक वॉरफेयर’ (Asymmetric Warfare) यानी असममित युद्ध रणनीति है।
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ईरान का स्वदेशी मॉडल: महंगे पारंपरिक लड़ाकू विमान खरीदने में असमर्थ ईरान ने अपनी पूरी ताकत कम लागत वाली बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और ‘कामिकेज़’ (आत्मघाती) ड्रोन्स (जैसे शहाब, कुद्स और समद सीरीज) के विकास में झोंक दी।
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हूतियों को तकनीकी ट्रांसफर: ईरान ने इस तकनीक और पुर्जों को यमन के हूती विद्रोहियों तक पहुंचाया, जिन्होंने स्थानीय वर्कशॉप्स में इन्हें असेंबल कर सऊदी अरब के खिलाफ रणनीतिक हथियार बना लिया।
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लागत का विनाशकारी खेल: हूती विद्रोही जिस ड्रोन से हमला करते हैं, उसकी निर्माण लागत महज 15,000 से 20,000 डॉलर (लगभग 15 से 20 लाख रुपये) होती है। वहीं, सऊदी अरब को उस एक ड्रोन को हवा में नष्ट करने के लिए अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल दागनी पड़ती है, जिसके एक इंटरसेप्टर रॉकेट की कीमत 30 लाख से 40 लाख डॉलर (लगभग 25 से 35 करोड़ रुपये) होती है।
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आर्थिक रूप से घाटे का सौदा: 20 हजार डॉलर के ड्रोन को गिराने के लिए 40 लाख डॉलर का हथियार खर्च करना लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में किसी भी देश के खजाने के लिए टिकाऊ नहीं हो सकता।
यमन का भूगोल किसी भी पारंपरिक और आधुनिक सेना के लिए सबसे बड़ा दुस्वप्न माना जाता है।
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गुरिल्ला रणनीति: हूती विद्रोही यमन के उत्तरी पहाड़ी इलाकों (जैसे सादा और सना) की गुफाओं, संकरी घाटियों और बीहड़ों में छिपे रहते हैं। वे आधुनिक सेना की तरह किसी बैरक या छावनी में नहीं रहते, बल्कि छोटे-छोटे दस्तों में बंटकर मोबाइल लॉन्चर्स से मिसाइल दागते हैं और तुरंत गायब हो जाते हैं।
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हाई-टेक हथियारों की सीमाएं: अरबों डॉलर के स्टील्थ फाइटर जेट्स और सैटेलाइट गाइडेड मिसाइलें उन लक्ष्यों पर बहुत कम प्रभावी होती हैं जो ठोस चट्टानों और गहरी गुफाओं के भीतर छिपे हों। सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने हजारों हवाई हमले किए, लेकिन वे हूतियों की मिसाइल लॉन्चिंग क्षमता को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाए।
सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार उसका तेल उद्योग और बुनियादी ढांचा है। देश के विजन 2030 के तहत रियाद अंतरराष्ट्रीय निवेश, पर्यटन और बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स (जैसे नियोम सिटी) पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
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सऊदी के पास खोने के लिए बहुत कुछ: सऊदी अरब जैसे संपन्न देश में यदि एक भी ड्रोन किसी रिफाइनरी या एयरपोर्ट पर गिरता है, तो वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मच जाता है। 2019 में सऊदी अरामको के अबकैक (Abqaiq) और खुरैस संयंत्रों पर हुए ड्रोन-मिसाइल हमलों ने दुनिया की 5 प्रतिशत तेल आपूर्ति को एक झटके में रोक दिया था।
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हूतियों के पास खोने के लिए कुछ नहीं: युद्धग्रस्त और मानवीय संकट से जूझ रहे यमन में हूतियों के पास ऐसा कोई बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर या आर्थिक संपत्ति नहीं थी जिसके नष्ट होने का उन्हें डर हो। इस मनोवैज्ञानिक और आर्थिक लाभ ने हूतियों के हाथ में बढ़त बनाए रखी।
ईरान ने इस पूरे संघर्ष में ‘एक्सिस ऑफ रेसिस्टेंस’ (Axis of Resistance) के जरिए प्रॉक्सी रणनीति को अपनाया। ईरान ने कभी भी सऊदी अरब से सीधा युद्ध नहीं लड़ा, जिससे वह पश्चिमी प्रतिबंधों और सीधे सैन्य जवाबी हमले के जोखिम से बचता रहा।
यमन के हूतियों, लेबनान के हिजबुल्लाह और इराक-सीरिया के मिलिशिया समूहों को हथियार, प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी देकर तेहरान ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को उनके ही घर की सीमाओं पर घेर कर रखा। सऊदी अरब को अपनी 1,400 किलोमीटर लंबी दक्षिणी सीमा की रक्षा के लिए अरबों डॉलर की सेना और एयर डिफेंस तैनात रखने पड़े, जबकि ईरान को इस पूरे ऑपरेशन के लिए अपने वार्षिक बजट का एक बहुत छोटा हिस्सा ही खर्च करना पड़ा।
यमन संघर्ष और हूती हमलों ने वैश्विक सैन्य विश्लेषकों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि 21वीं सदी के युद्ध केवल सबसे महंगे फाइटर जेट्स, टैंक और विशाल रक्षा बजट से नहीं जीते जा सकते। सस्ते मानवरहित ड्रोन (UAV), हाइपरसोनिक व क्रूज मिसाइलों के स्वदेशी भंडार और असममित रणनीतियों ने आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की कमजोरियों को उजागर किया है। यही वजह रही कि सऊदी अरब ने अंततः सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक रास्तों, संघर्ष विराम और क्षेत्रीय स्थिरता के विकल्पों को प्राथमिकता देना शुरू किया।
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