
क्रिकेट के मैदान पर जब कोई महान बल्लेबाज या खूंखार गेंदबाज रिकॉर्डों का अंबार लगाता है, तो पूरी दुनिया उसके खेल की दीवानी हो जाती है। खेल प्रेमियों के मन में अक्सर यह जिज्ञासा बनी रहती है कि क्या इन महान खिलाड़ियों की तरह उनके बेटे भी क्रिकेट की दुनिया में आकर अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे। सुनील गावस्कर से लेकर सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ तक, देश-दुनिया के कई ऐसे दिग्गज खिलाड़ी रहे हैं जिनके घर में क्रिकेट का माहौल होने के बावजूद उनके बेटे इंटरनेशनल क्रिकेट (International Cricket) में वह मुकाम हासिल नहीं कर सके जिसकी उम्मीद हर फैन कर रहा था। कुछ मामलों में तो खिलाड़ी के बेटे जूनियर और एज-ग्रुप (Age-Group Cricket) स्तर से आगे ही नहीं बढ़ पाए, जबकि कुछ ने घरेलू क्रिकेट में हाथ आजमाया लेकिन दबाव और उम्मीदों के बोझ तले उनका करियर ज्यादा लंबा नहीं चल सका। आइए इस विशेष लेख में विस्तार से जानते हैं उन 5 दिग्गज क्रिकेटरों के बारे में जिनके बेटे अपने पिता की तरह इंटरनेशनल क्रिकेट की पिच पर चमकने में नाकामयाब रहे और उनके करियर का सफर कैसा रहा।
क्रिकेट के इतिहास में ‘लिटिल मास्टर’ के नाम से मशहूर और टेस्ट क्रिकेट में 10,000 रन बनाने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज सुनील गावस्कर का नाम हर भारतीय गर्व के साथ लेता है। उनके बेटे रोहन गावस्कर (Rohan Gavaskar) से भी देश को वैसी ही उम्मीदें थीं और रोहन ने घरेलू क्रिकेट में बंगाल की तरफ से खेलते हुए काफी रन भी बनाए। रोहन ने अपनी तकनीक और मेहनत के दम पर भारतीय टीम (Team India) में जगह भी बनाई और कुछ वनडे मैच खेले, लेकिन वे अपने पिता के उस ऐतिहासिक मुकाम के आसपास भी नहीं पहुंच पाए। महान पिता के नाम का भारी दबाव, मीडिया की लगातार नजरें और उम्मीदों का पहाड़ रोहन गावस्कर के करियर पर भारी पड़ गया। हालांकि उन्होंने अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया, लेकिन वे कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थाई जगह नहीं बना सके और कुछ समय बाद ही उनका अंतरराष्ट्रीय करियर थम गया।
क्रिकेट की दुनिया में ‘भगवान’ का दर्जा पाने वाले सचिन तेंदुलकर के बेटे अर्जुन तेंदुलकर (Arjun Tendulkar) को लेकर फैंस के बीच हमेशा से ही एक अलग तरह का क्रेज और उत्सुकता रही है। सचिन ने अपने बेटे को क्रिकेट की हर बारीकी सिखाई और अर्जुन ने बाएं हाथ के तेज गेंदबाज और ऑलराउंडर के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाने की भी कोशिश की। मुंबई के बजाय गोवा की तरफ से घरेलू क्रिकेट खेलने वाले अर्जुन ने रणजी ट्रॉफी में शतक भी लगाया और आईपीएल (IPL) में मुंबई इंडियंस तथा बाद में अन्य टीमों का हिस्सा भी रहे। लेकिन जितनी चर्चा उनके नाम की होती है, उतनी ही कड़ी आलोचना और तुलना का सामना उन्हें हर कदम पर करना पड़ता है। हालांकि अर्जुन अभी भी घरेलू क्रिकेट में सक्रिय हैं और मेहनत कर रहे हैं, लेकिन वे अभी तक भारतीय सीनियर इंटरनेशनल टीम की जर्सी पहनने में कामयाब नहीं हो पाए हैं और उनके करियर को लेकर विशेषज्ञों में हमेशा बहस जारी रहती है।
वेस्टइंडीज के सबसे आक्रामक और महान बल्लेबाजों में गिने जाने वाले सर विवियन रिचर्ड्स (Sir Vivian Richards) की खौफनाक बल्लेबाजी का खौफ अपने दौर के गेंदबाजों के दिलों में साफ झलकता था। उनके बेटे मालिया रिचर्ड्स (Malia Richards) को लेकर खेल जगत में यह उम्मीद की जा रही थी कि वे भी अपने पिता की तरह मैदान पर चौके-छक्कों की बरसात करेंगे। लेकिन मालिया का रुझान क्रिकेट के मुकाबले फुटबॉल और अन्य खेलों की तरफ अधिक था। उन्होंने कुछ समय तक क्रिकेट में हाथ आजमाने की कोशिश जरूर की, लेकिन वे कभी भी किसी भी स्तर पर अपनी पहचान नहीं बना पाए और एज-ग्रुप क्रिकेट से आगे बढ़ने में पूरी तरह असफल रहे। विवियन रिचर्ड्स के कद के मुताबिक उनके बेटे का खेल दुनिया की नजरों में कभी नहीं आ सका, जिससे उनके फैंस को भी काफी निराशा हुई थी।
1999 के वर्ल्ड कप में साउथ अफ्रीका के लिए अपने दम पर मैच जिताने वाले और दुनिया के सबसे खतरनाक ऑलराउंडर्स में शुमार लांस क्लूज़नर (Lance Klusener) की आक्रामक बल्लेबाजी शैली को कौन भूल सकता है। ‘ज़ुलु’ के नाम से मशहूर लांस क्लूज़नर ने अपनी तूफानी पारियों से क्रिकेट जगत में तहलका मचा दिया था। लेकिन जब उनके परिवार और बच्चों की बात आती है, तो उनके बेटे या संतान इस खेल में अपने पिता की तरह कोई बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सके। लांस क्लूज़नर के बेटे ने शुरुआती स्तर पर स्कूल क्रिकेट और लोकल क्लब मैचों में भाग लिया, लेकिन वे कभी भी प्रोफेशनल या एज-ग्रुप क्रिकेट के उस कड़े मुकाम को पार नहीं कर पाए जो एक सफल इंटरनेशनल क्रिकेटर बनने के लिए अनिवार्य होता है। पिता का नाम होने के बावजूद खेल की दुनिया में अपनी अलग जगह बनाना कितना मुश्किल होता है, यह इस परिवार के सफर से साफ झलकता है।
क्रिकेट इतिहास में ‘सुल्तान ऑफ स्विंग’ के नाम से मशहूर पाकिस्तान के महान बाएं हाथ के तेज गेंदबाज वसीम अकरम (Wasim Akram) की गेंदबाजी के आगे दुनिया के बड़े-बड़े बल्लेबाज कांपते थे। वसीम अकरम के बेटे तहूर अकरम (Tahoor Akram) से भी यह उम्मीद की जा रही थी कि वे अपने पिता की तरह एक घातक तेज गेंदबाज बनकर पाकिस्तान का नाम रोशन करेंगे। तहूर ने कुछ समय तक जूनियर स्तर पर गेंदबाजी का अभ्यास भी किया और स्थानीय अकादमियों में पसीना बहाया, लेकिन उनका झुकाव धीरे-धीरे क्रिकेट से पूरी तरह हट गया। तहूर ने गोल्फ और बिजनेस की दुनिया को अपना करियर चुना और कभी भी प्रोफेशनल या एज-ग्रुप क्रिकेट में आगे कदम नहीं बढ़ाया। वसीम अकरम ने एक इंटरव्यू में खुद यह बात स्वीकार की थी कि उनके बेटे ने अपनी मर्जी से दूसरा रास्ता चुना और उसे क्रिकेट में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी।
इन सभी दिग्गजों के उदाहरण से यह बात पूरी तरह साबित हो जाती है कि खेल के मैदान पर केवल किसी महान पिता का बेटा होना ही इस बात की गारंटी नहीं देता कि वह खिलाड़ी भी उतनी ही सफलता हासिल करेगा। इंटरनेशनल क्रिकेट में अपनी जगह बनाने के लिए असीम प्रतिभा, मानसिक दृढ़ता, कड़ा संघर्ष और किस्मत का साथ होना बहुत जरूरी होता है। कई बार पिता के नाम का भारी दबाव बच्चों की मानसिक स्थिति पर ऐसा असर डालता है कि वे दबाव में बिखर जाते हैं, तो कई बार उनका रुझान पूरी तरह किसी दूसरे क्षेत्र में चला जाता है। खेल प्रेमियों के लिए भले ही यह मायूस करने वाली बात हो कि वे अपने चहेते दिग्गजों के बेटों को मैदान पर चौके-छक्के लगाते नहीं देख पाए, लेकिन यह सच्चाई भी उतनी ही बड़ी है कि हर इंसान की अपनी अलग राह और किस्मत होती है।
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