TMC के नाम और ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: चुनाव आयोग को दी 3 महीने की डेडलाइन

पश्चिम बंगाल की राजनीति और देश के सियासी गलियारों में लंबे समय से उबाल ला रहे ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नाम और चुनाव चिह्न के विवाद पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद अहम और निर्णायक रुख अख्तियार किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह पार्टी के नाम और ऐतिहासिक ‘जोड़ा फूल’ (फूल और घास) वाले चुनाव चिह्न को लेकर चल रहे विवाद का समयबद्ध रूप से स्थायी समाधान करे। इस कानूनी लड़ाई ने उस समय गंभीर मोड़ ले लिया था जब पार्टी के भीतर उपजे अंदरूनी घमासान के बाद दो विरोधी गुट आमने-सामने आ गए थे और मामला चुनाव आयोग की चौखट से होता हुआ शीर्ष अदालत तक जा पहुंचा।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष खंडपीठ ने इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए विवाद से जुड़े दोनों पक्षों को अपनी-अपनी कानूनी दलीलें पूरी करने के लिए चार सप्ताह का अंतिम अवसर दिया है। अदालत ने साफ किया है कि दोनों गुटों की बहस और दस्तावेज निर्वाचन आयोग के समक्ष पूरे होने के बाद आयोग को अधिकतम तीन महीने के भीतर अपना अंतिम और बाध्यकारी फैसला सुनाना होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब इस बात की उल्टी गिनती शुरू हो गई है कि बंगाल की राजनीति की पहचान रहा ‘घास-फूल’ का सिंबल आखिरकार किस गुट की झोली में जाएगा।

यह पूरा अदालती मामला पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा दायर की गई विशेष अनुमति याचिका पर केंद्रित था। ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग के उस अंतरिम आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, जिसके तहत आयोग ने विवाद की स्थिति को देखते हुए तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न को अंतरिम रूप से फ्रीज (जब्त) कर दिया था। आयोग के इस कदम के खिलाफ ममता बनर्जी ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए दलील दी थी कि पार्टी का गठन और उसका संपूर्ण जनाधार उनके नेतृत्व में खड़ा हुआ है, इसलिए चुनाव चिह्न पर रोक लगाना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल के विपरीत है।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने ममता बनर्जी की दलीलों और जमीनी परिस्थितियों को सुनने के बाद यह माना कि किसी भी प्रमुख राजनीतिक दल के नाम और चुनाव चिह्न को लंबे समय तक अधर में नहीं लटकाया जा सकता। हालांकि अदालत ने चुनाव आयोग की स्वायत्तता का सम्मान करते हुए खुद सीधे तौर पर सिंबल किसी एक पक्ष को सौंपने के बजाय आयोग को ही तय समय-सीमा के भीतर कानून सम्मत फैसला लेने की वैधानिक जिम्मेदारी सौंपी है। अदालत के इस आदेश से दोनों खेमों में नई कानूनी और संगठनात्मक रणनीति तैयार करने की हलचल तेज हो गई है।

इस पूरे विवाद की जड़ निर्वाचन आयोग द्वारा पूर्व में पारित किया गया वह अंतरिम आदेश था, जिसने बंगाल की सियासत में भूचाल ला दिया था। पार्टी के भीतर जब आंतरिक विभाजन खुलकर सामने आया और दो समानांतर गुटों ने खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए आयोग के समक्ष अपने दावे पेश किए, तो आयोग ने निष्पक्षता और चुनावी संतुलन बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठाया था। चुनाव आयोग ने विवाद पर अंतिम निर्णय आने तक दोनों पक्षों को ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित ‘फूल और घास’ वाले चुनाव चिह्न का उपयोग करने से तत्काल प्रभाव से रोक दिया था।

मूल पहचान फ्रीज होने के बाद आयोग ने अस्थायी व्यवस्था के तहत दोनों विरोधी गुटों को अलग-अलग अंतरिम नाम और स्वतंत्र चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए थे, ताकि चुनावी गतिविधियों में कोई बाधा न पहुंचे। आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में स्पष्ट किया था कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट और अरूप रॉय के नेतृत्व वाले दूसरे गुट के प्रतिनिधियों की प्रारंभिक दलीलें सुनने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों पक्षों के बीच विधायी और संगठनात्मक बहुमत को लेकर गंभीर कानूनी पेंच फंसा हुआ है। ऐसे में चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 के नियमों के तहत गहराई से जांच किए बिना कोई अंतिम मुहर नहीं लगाई जा सकती।

भारतीय चुनावी इतिहास में जब भी किसी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दल में दोफाड़ होती है, तो उसका फैसला ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के प्रसिद्ध पैरा 15 के तहत किया जाता है। निर्वाचन आयोग इसी कानूनी प्रावधान के आधार पर यह तय करता है कि अलग हुए गुटों में से किसे मूल राजनीतिक दल माना जाए और किसे नया दल। इसके लिए आयोग मुख्य रूप से दो प्रमुख पैमानों पर दोनों पक्षों के दावों का बारीक परीक्षण करता है: पहला संगठनात्मक विंग (पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति, राज्य इकाइयां, पदाधिकारी और प्राथमिक सदस्य) में किसका बहुमत है, और दूसरा विधायी विंग (संसद के दोनों सदनों में सांसद और विधानसभा व विधान परिषद के विधायकों की संख्या) में किसके पास ज्यादा समर्थन है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद अब ममता बनर्जी गुट और अरूप रॉय गुट, दोनों को ही निर्वाचन आयोग की अर्ध-न्यायिक पीठ के सामने अपने-अपने सांसदों, विधायकों और पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों के हस्ताक्षरित समर्थन पत्र, शपथ पत्र और आवश्यक दस्तावेज चार हफ्तों के भीतर दाखिल करने होंगे। दोनों पक्षों के वकीलों की जिरह पूरी होने के बाद आयोग दोनों विंग्स में बहुमत का गणित लगाएगा। जिस गुट के पास निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और संगठनात्मक पदाधिकारियों का प्रमाणित बहुमत सिद्ध होगा, उसी गुट को मूल टीएमसी की मान्यता और आरक्षित ‘फूल-घास’ चुनाव चिह्न का कानूनी अधिकार सौंपा जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई तीन महीने की यह मियाद पश्चिम बंगाल के भविष्य के राजनीतिक परिदृश्य के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील मानी जा रही है। बंगाल के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी का ‘फूल और घास’ चुनाव चिह्न केवल एक ग्राफिक सिंबल नहीं है, बल्कि ग्रामीण बंगाल से लेकर कोलकाता की बस्तियों तक मतदाताओं के बीच पार्टी की जमीनी पहचान से जुड़ा हुआ है। यदि चुनाव आयोग का फैसला किसी एक गुट के पक्ष में जाता है, तो दूसरे गुट को नए नाम और नए चुनाव चिह्न के साथ जनता के बीच अपनी पहचान दोबारा नए सिरे से बनानी होगी।

ममता बनर्जी के लिए यह कानूनी लड़ाई उनके राजनीतिक अस्तित्व और विरासत की रक्षा का सबसे बड़ा इम्तिहान बन चुकी है। वहीं अरूप रॉय का खेमा भी विधायी संख्या बल और कानूनी दस्तावेजों के आधार पर आयोग के समक्ष अपनी दावेदारी को पुख्ता करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। अब सबकी निगाहें नई दिल्ली स्थित भारत निर्वाचन आयोग के मुख्यालय पर टिक गई हैं, जहां अगले चार हफ्तों में दोनों गुटों के दिग्गज वकीलों के बीच तीखी कानूनी बहस देखने को मिलेगी और उसके बाद आने वाला अंतिम फैसला बंगाल की सत्ता और विपक्ष के समीकरणों को पूरी तरह बदल सकता है।