UNGA में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगवाकर घिरे शहबाज शरीफ

संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का एक वीडियो सोशल मीडिया पर भारी चर्चा और तीखी आलोचना का केंद्र बन गया है। इस वायरल वीडियो में उनके भाषण के दौरान हॉल में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे गूंजते हुए सुनाई दिए, जिसके बाद से देश-विदेश के राजनीतिक गलियारों में इस पर सवाल उठने लगे हैं। स्थिति तब और असहज हो गई जब पाकिस्तान के ही एक पूर्व राजनयिक ने इस पूरी घटना पर खुला तंज कसते हुए इसे कूटनीतिक रूप से अपरिपक्व कदम करार दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक मंचों पर इस तरह की आंतरिक नारेबाजी से देश की छवि मजबूत होने के बजाय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी का सामना करना पड़ता है।

क्या है पूरा मामला और क्यों मचा है सियासी बवाल?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब पीएम शहबाज शरीफ न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र को संबोधित करने पहुंचे थे। उनके संबोधन के दौरान हॉल में अचानक पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी शुरू हो गई। इस घटना का वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स और विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया। विश्लेषकों का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र जैसे प्रतिष्ठित और गंभीर वैश्विक मंचों पर इस प्रकार की नारेबाजी प्रोटोकॉल के खिलाफ मानी जाती है। कूटनीतिक जानकारों के अनुसार, ऐसे मंच वैश्विक मुद्दों, शांति और नीतियों पर चर्चा के लिए होते हैं, न कि घरेलू राजनीतिक रैलियों की तरह शक्ति प्रदर्शन करने के लिए। इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पाकिस्तानी नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि चमकाने के चक्कर में अक्सर गलत रणनीतियों का शिकार हो जाता है।

पूर्व पाकिस्तानी राजनयिक का तीखा तंज और वैश्विक किरकिरी

इस घटना के सामने आने के बाद पाकिस्तान के पूर्व राजनयिकों और वरिष्ठ विश्लेषकों ने शहबाज शरीफ सरकार की जमकर आलोचना की है। पूर्व राजनयिकों का कहना है कि यूएनजीए जैसे गंभीर मंच पर इस तरह की प्रायोजित नारेबाजी से देश की कूटनीति की पोल खुल जाती है। इससे दुनिया के सामने यह संदेश जाता है कि पाकिस्तान अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए ऐसे दिखावे का सहारा ले रहा है। सोशल मीडिया पर भी आम जनता और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि देश की गंभीर आर्थिक और कूटनीतिक चुनौतियों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय को ऐसे आयोजनों में अधिक परिपक्वता और कूटनीतिक शिष्टाचार का परिचय देना चाहिए था, ताकि वैश्विक पटल पर देश की गरिमा बनी रहे।