
वाशिंगटन/अंतरराष्ट्रीय डेस्क। संयुक्त राज्य अमेरिका में होने वाले अहम मिडटर्म चुनावों के मतदान से चंद रोज पहले देश के शीर्ष चुनावी निगरानी तंत्र पर बहुत बड़ा साइबर हमला हुआ है। राजनीतिक दलों, उम्मीदवारों और पॉलिटिकल एक्शन कमेटियों (PACs) के चुनावी चंदे व खर्च पर नजर रखने वाले अमेरिकी संघीय चुनाव आयोग यानी फेडरल इलेक्शन कमीशन (FEC) के सर्वर और प्रणालियों को हैकर्स ने निशाना बनाया है। इस संदिग्ध साइबर हमले के तुरंत बाद एहतियातन आयोग की प्रमुख ऑनलाइन सेवाओं और महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग सिस्टम (E-Filing System) को ऑफलाइन कर दिया गया है।
चुनाव से ठीक पहले के इन अंतिम दिनों में जब प्रचार अभियान अपने चरम पर है और करोड़ों डॉलर का फंड पानी की तरह बहाया जा रहा है, तब आयोग की फाइलिंग प्रणाली ठप होने से हड़कंप मच गया है। विश्लेषकों का मानना है कि इस तकनीकी व्यवधान से राजनीतिक फंडिंग के पारदर्शी रिकॉर्ड और अनिवार्य 48 घंटे के वित्तीय खुलासों पर गंभीर असर पड़ रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स और आयोग के आंतरिक संचार के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, अज्ञात ‘बैड एक्टर्स’ (हैकर्स) ने सोमवार देर रात एफईसी के आंतरिक नेटवर्क में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश की। सिस्टम में संदिग्ध गतिविधियों और अनाधिकृत पहुंच के संकेत मिलते ही साइबर सुरक्षा टीम ने डेटा लीक के खतरे को टालने के लिए इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग गेटवे को बंद कर दिया।
आयोग ने अपनी वेबसाइट पर एक संक्षिप्त तकनीकी नोटिस चस्पा कर बताया है कि इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग प्रणाली तकनीकी खराबी के चलते डाउन है और आईटी विशेषज्ञ इसे जल्द से जल्द बहाल करने में जुटे हैं। हालांकि, आयोग ने सार्वजनिक बयान में सीधे तौर पर डेटा चोरी या पूरे सिस्टम के हैक होने की औपचारिक पुष्टि करने से परहेज किया है, लेकिन अंदरूनी ईमेल लीक होने के बाद रॉयटर्स और प्रमुख वैश्विक समाचार एजेंसियों ने साइबर हमले की पुष्टि कर दी है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि सेवा कब तक पूरी तरह सामान्य हो पाएगी।
इस घटना के बाद आम अमेरिकी मतदाताओं के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या मतदान और बैलट पेपर की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है? इस पर चुनाव विश्लेषकों और सुरक्षा अधिकारियों ने स्थिति साफ करते हुए कहा है कि फेडरल इलेक्शन कमीशन (FEC) मतदान कराने, मतपेटियों या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM/Tabulators) का संचालन करने वाली संस्था नहीं है। अमेरिका में मतदान कराने का दायित्व सीधे तौर पर राज्यों और स्थानीय काउंटी प्रशासनों के अधीन होता है।
इसलिए इस साइबर हमले का नागरिकों द्वारा वोट डालने या वास्तविक मतदान नतीजों पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ेगा। हालांकि, इसका सबसे बड़ा और घातक असर चुनावी पारदर्शिता पर पड़ा है। मतदान के अंतिम सप्ताह में उम्मीदवारों को बड़े चंदों की जानकारी 48 घंटे के भीतर एफईसी के पोर्टल पर अपलोड करनी होती है, जिसे मीडिया और जनता लाइव ट्रैक करती है। फाइलिंग सिस्टम बंद होने से यह पता लगाना असंभव हो गया है कि चुनाव के आखिरी दौर में किस उम्मीदवार के समर्थन में कौन सा उद्योगपति या संगठन गुप्त रूप से करोड़ों डॉलर झोंक रहा है।
इस संवेदनशील घटनाक्रम के सामने आते ही अमेरिकी जांच एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गई हैं। संघीय जांच ब्यूरो (FBI) और साइबर सिक्योरिटी एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सिक्योरिटी एजेंसी (CISA) ने डिजिटल फॉरेंसिक जांच शुरू कर दी है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला किसी रैंसमवेयर ग्रुप द्वारा किया गया एक आम साइबर अपराध था, या फिर इसके पीछे अमेरिकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने वाली किसी विदेशी साइबर जासूसी एजेंसी का हाथ है।
अमेरिकी खुफिया एजेंसियां पिछले काफी समय से रूस, चीन और ईरान समर्थित हैकर समूहों द्वारा चुनाव से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाए जाने की चेतावनी देती रही हैं। यद्यपि किसी एजेंसी ने सार्वजनिक तौर पर किसी खास देश पर दोषारोपण नहीं किया है, लेकिन चुनाव के ठीक मुहाने पर हुआ यह हमला अमेरिकी साइबर सुरक्षा तैयारियों और महत्वपूर्ण डेटा प्रणालियों की मजबूती पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर गया है।
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