‘जिसका बंदर वही नचाए…’ वेटरनरी काउंसिल की मांग पर क्या बोले मोहन भागवत? पशुपालकों के लिए बड़ी बात

नागपुर/मुंबई: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने पशु चिकित्सा और पशुपालन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण सुधार की वकालत की है। महाराष्ट्र एनिमल एंड फिशरी साइंसेज यूनिवर्सिटी (MAFSU) के एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पशु चिकित्सा क्षेत्र की बागडोर उन्हीं के हाथों में होनी चाहिए जो इस विषय के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने अपनी बात को पुख्ता करने के लिए एक पुरानी कहावत का सहारा लेते हुए कहा, “जिसका बंदर वही नचाए।”

विशेषज्ञों के हाथ में हो कमान

मोहन भागवत ने इस बात पर जोर दिया कि देश में पशु चिकित्सा सेवाओं को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक स्वायत्त ‘वेटरनरी काउंसिल’ की सख्त जरूरत है। उनका मानना है कि जब तक इस क्षेत्र से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार विशेषज्ञों के पास नहीं होगा, तब तक वांछित परिणाम प्राप्त करना कठिन है। उन्होंने प्रशासन और नीति निर्धारण में विशेषज्ञों की भूमिका को सर्वोपरि बताया। भागवत ने कहा कि पशुओं की देखभाल और चिकित्सा एक संवेदनशील विषय है, जिसे केवल किताबी ज्ञान से नहीं बल्कि अनुभव और समर्पण से समझा जा सकता है।

पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था

सरसंघचालक ने अपने संबोधन में भारतीय अर्थव्यवस्था में पशुधन के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा गांवों में बसती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ पशुपालन है। यदि पशु स्वस्थ रहेंगे और उनकी चिकित्सा के लिए बेहतर ढांचा उपलब्ध होगा, तो इसका सीधा सकारात्मक प्रभाव किसानों की आय पर पड़ेगा। उन्होंने वैज्ञानिकों और डॉक्टरों से आह्वान किया कि वे नई तकनीकों को जमीनी स्तर तक ले जाएं ताकि एक साधारण पशुपालक भी उसका लाभ उठा सके।

वेटरनरी काउंसिल की मांग पर जोर

काफी समय से पशु चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोग एक सशक्त काउंसिल की मांग कर रहे हैं जो उनके हितों और शिक्षा के मानकों की रक्षा कर सके। मोहन भागवत का यह बयान इस मांग को नई ऊर्जा देने वाला माना जा रहा है। उन्होंने संकेत दिया कि जैसे अन्य पेशेवर क्षेत्रों (जैसे मेडिकल या बार काउंसिल) के लिए नियम बनाने वाली संस्थाएं हैं, वैसे ही वेटरनरी डॉक्टरों के लिए भी एक समर्पित और शक्तिशाली तंत्र होना चाहिए।

परंपरा और आधुनिकता का मेल

कार्यक्रम के दौरान भागवत ने आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ पारंपरिक भारतीय ज्ञान के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों के पास पशु चिकित्सा का गहरा ज्ञान था, जिसे आज के आधुनिक उपकरणों और रिसर्च के साथ जोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने ‘स्वदेशी’ दृष्टिकोण अपनाते हुए पशुओं की नस्ल सुधार और उनके संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की बात कही।