अंतरराष्ट्रीय व्यापार जगत में हलचल: केन्या के राष्ट्रपति का टाटा ग्रुप कारोबार पर लगाया कड़ा ब्रेक

वैश्विक कॉरपोरेट गलियारों और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। पूर्वी अफ्रीकी देश केन्या के राष्ट्रपति विलियम रूटो ने भारत के सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद औद्योगिक घरानों में गिने जाने वाले टाटा समूह (Tata Group) के खिलाफ बेहद आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। केन्याई सरकार ने टाटा समूह की प्रमुख कंपनी टाटा केमिकल्स के अधीन चलने वाले ऐतिहासिक सोडा ऐश खनन और प्रसंस्करण कारोबार पर सवाल खड़े करते हुए बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। राष्ट्रपति रूटो ने सार्वजनिक सभा में बेहद तीखे और कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए देशवासियों के सामने सवाल दागा कि “क्या हम दूसरों के गुलाम हैं?” इस तल्ख बयान ने न केवल अफ्रीकी महाद्वीप बल्कि भारत और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक हलकों में खलबली मचा दी है। सौ साल से भी अधिक समय से चल रहे इस विशालकाय प्रोजेक्ट के भविष्य पर अब अनिश्चितता के काले बादल मंडराने लगे हैं।

इस पूरे विवाद की जड़ में केन्या के कजियाडो काउंटी (Kajiado County) स्थित प्रसिद्ध खारे पानी की झील ‘लेक मगदी’ (Lake Magadi) है। यह क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले प्राकृतिक ट्रोना अयस्क और प्राकृतिक सोडा ऐश (Sodium Carbonate) का दुनिया का सबसे बड़ा और समृद्ध प्राकृतिक भंडार माना जाता है। इस संयंत्र की स्थापना औपनिवेशिक काल के दौरान वर्ष 1911 में मगदी सोडा कंपनी के रूप में हुई थी। ब्रिटिश शासन के दौर से लेकर स्वतंत्र केन्या तक इस कंपनी ने लगातार परिचालन किया। वर्ष 2005-2006 के दौरान टाटा समूह की रासायनिक शाखा ‘टाटा केमिकल्स लिमिटेड’ ने यूके स्थित ब्रूनर मोंड ग्रुप का वैश्विक अधिग्रहण किया, जिसके तहत मगदी सोडा का नियंत्रण भी पूर्ण रूप से टाटा केमिकल्स मगदी लिमिटेड (TCML) के हाथों में आ गया। इस प्रकार टाटा समूह पिछले दो दशकों से इस शताब्दी पुराने संयंत्र का सफल संचालन कर रहा था और यह अफ्रीका में टाटा के सबसे पुराने रणनीतिक निवेशों में से एक बन गया।

कजियाडो काउंटी के एक विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए केन्याई राष्ट्रपति विलियम रूटो ने स्थानीय जनता के बीच यह विस्फोटक भाषण दिया। राष्ट्रपति ने आरोप लगाया कि विदेशी स्वामित्व वाली कंपनी को एक सदी से भी अधिक समय तक इस अमूल्य प्राकृतिक संसाधन के दोहन की अनुमति दी गई, लेकिन इसके बदले में देश और स्थानीय समाज को वह औद्योगिक लाभ नहीं मिला जिसका वादा किया गया था। रूटो ने कहा कि 100 साल तक लीज पर काम करने के बावजूद कंपनी ने कजियाडो में कोई ऐसा बड़ा औद्योगिक तंत्र विकसित नहीं किया जो कच्चे माल का देश के भीतर ही पूर्ण मूल्य संवर्धन (Value Addition) कर सके। अपने भाषण के चरम पर उन्होंने स्थानीय भाषा और स्वाहिली-अंग्रेजी के लहजे में कहा कि केन्या अब केवल कच्चा माल निर्यात करने वाला उपनिवेश नहीं बना रह सकता। उन्होंने सीधा सवाल पूछा कि क्या देश के लोग अब भी विदेशी ताकतों के आर्थिक गुलाम हैं जो अपने ही संसाधनों के मुनाफे से महरूम रहें।

केन्याई सरकार और स्थानीय नेतृत्व का मुख्य आक्षेप यह है कि मगदी संयंत्र से भारी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाला सोडा ऐश निकालकर सीधे विदेशी बाजारों में निर्यात कर दिया जाता है। सोडा ऐश का प्राथमिक उपयोग कांच (ग्लास मैन्युफैक्चरिंग), डिटर्जेंट, कपड़ा और भारी रसायनों के निर्माण में होता है। राष्ट्रपति रूटो की आर्थिक रणनीति अब ‘कच्चे माल के निर्यात’ की जगह ‘इन-हाउस मैन्युफैक्चरिंग’ पर केंद्रित हो चुकी है। सरकार का तर्क है कि अगर केन्या के पास दुनिया का सबसे अच्छा सोडा ऐश है, तो देश को विदेशों से कांच और बोतलों का आयात क्यों करना पड़ रहा है। राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार अब उन कंपनियों को वरीयता देगी जो केन्या की धरती पर ही कांच बनाने की विशाल फैक्ट्रियां और डाउनस्ट्रीम केमिकल प्लांट्स स्थापित करें, जिससे हजारों स्थानीय युवाओं को प्रत्यक्ष तकनीकी रोजगार मिल सके।

टाटा केमिकल्स मगदी और स्थानीय समुदाय के बीच का तनाव केवल आज का नहीं है, बल्कि इसके पीछे भूमि अधिकारों और रॉयल्टी वितरण की लंबी पृष्ठभूमि रही है। लेक मगदी का इलाका पारंपरिक रूप से मसाई (Maasai) जनजाति का गृह क्षेत्र है। स्थानीय मसाई समुदाय और काउंटी सरकार लंबे समय से यह शिकायत करते रहे हैं कि संयंत्र से मिलने वाली रॉयल्टी और लैंड रेट्स का पर्याप्त हिस्सा स्थानीय ढांचागत विकास, अस्पतालों, स्कूलों और स्वच्छ पेयजल परियोजनाओं पर खर्च नहीं किया गया। इसके अलावा, लीज के नवीनीकरण (Lease Renewal) की शर्तों और काउंटी सरकार द्वारा लगाए जाने वाले स्थानीय शुल्कों को लेकर अदालत में कानूनी विवाद भी चलते रहे हैं। राष्ट्रपति रूटो ने इसी जनभावना को भुनाते हुए स्थानीय विकास की अनदेखी को अपनी कार्रवाई का मुख्य आधार बना दिया है।

राष्ट्रपति विलियम रूटो ने अपने भाषण में सिर्फ टाटा के काम पर रोक लगाने की ही बात नहीं कही, बल्कि एक नई कार्ययोजना का भी ऐलान कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार अब इस क्षेत्र में नए औद्योगिक भागीदारों को आमंत्रित करने जा रही है। रूटो के अनुसार, सरकार दो नई औद्योगिक कंपनियों के साथ बातचीत कर रही है, जिन्हें मगदी क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट्स सौंपे जाएंगे। इनमें से एक कंपनी स्थानीय स्तर पर विशाल ग्लास निर्माण संयंत्र (Glass Manufacturing Factory) स्थापित करेगी, जो घरेलू उपयोग के साथ-साथ पूरे पूर्वी और मध्य अफ्रीका के लिए कांच का उत्पादन करेगी। वहीं, दूसरी कंपनी को सोडा ऐश से संबंधित उन्नत रसायन बनाने का जिम्मा सौंपा जाएगा। राष्ट्रपति ने साफ कर दिया कि जो भी कंपनी केन्या के संसाधनों का उपयोग करेगी, उसे अनिवार्य रूप से स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और जॉब क्रिएशन करना होगा।

टाटा समूह की रासायनिक शाखा ‘टाटा केमिकल्स’ दुनिया में सोडा ऐश की तीसरी सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी मानी जाती है। कंपनी का उत्पादन नेटवर्क भारत, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और केन्या तक फैला हुआ है। केन्या स्थित मगदी संयंत्र की सालाना उत्पादन क्षमता लाखों मीट्रिक टन प्राकृतिक सोडा ऐश की है, जो अपनी उच्च शुद्धता के लिए एशिया, मध्य पूर्व और शेष अफ्रीका के बाजारों में अत्यधिक मांग में रहता है। यदि केन्याई सरकार कानूनी रूप से इस परिचालन को पूरी तरह निरस्त करती है या लीज समाप्त करती है, तो यह टाटा केमिकल्स के वैश्विक आपूर्ति तंत्र के लिए एक अल्पकालिक झटका साबित हो सकता है। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि टाटा समूह अंतरराष्ट्रीय कानूनों, द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और मध्यस्थता मंचों के जरिए अपने अधिकारों और अनुबंधों की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है।

केन्या और भारत के बीच सदियों पुराने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मजबूत व्यापारिक रिश्ते रहे हैं। भारत केन्या के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों और निवेशकों में शामिल है। ऐसे में किसी सार्वजनिक मंच से किसी शीर्ष भारतीय कॉरपोरेट दिग्गज के खिलाफ इस प्रकार की बयानबाजी दोनों देशों के राजनयिक गलियारों में भी चर्चा का विषय बन गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह बयानबाजी घरेलू राजनीति और स्थानीय जनता के समर्थन को एकजुट करने के उद्देश्य से की गई हो सकती है, लेकिन जब वास्तविक निवेश नीतियों और द्विपक्षीय संधियों की बात आएगी, तो दोनों देशों की सरकारों को संवाद का रास्ता अपनाना होगा। भारत सरकार अफ्रीकी महाद्वीप में भारतीय निवेशकों के हितों की सुरक्षा को लेकर हमेशा सजग रही है, इसलिए आने वाले दिनों में इस मामले में उच्चस्तरीय वार्ता की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

केन्या के राष्ट्रपति के इस कड़े कदम के बाद अब सबकी नजरें टाटा समूह और केन्याई सरकार के आधिकारिक कदमों पर टिकी हैं। अंतरराष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि 100 साल पुराने परिचालन और बड़े बहुराष्ट्रीय निवेश को रातों-रात बंद करना कानूनी दृष्टि से इतना सरल नहीं होता। इस प्रकार के फैसलों में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता, भारी क्षतिपूर्ति के दावे और द्विपक्षीय निवेश संरक्षण संधियां (Bilateral Investment Treaties) आड़े आती हैं। संभव है कि आने वाले हफ्तों में टाटा समूह के प्रतिनिधि केन्याई सरकार के समक्ष स्थानीय स्तर पर ग्लास फैक्ट्री या डाउनस्ट्रीम यूनिट लगाने का नया प्रस्ताव पेश करें, जिससे राष्ट्रपति की चिंताओं का निवारण भी हो जाए और ऐतिहासिक मगदी संयंत्र का संचालन भी सुचारू रूप से चलता रहे।