
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में वर्षों से अपने आशियाने की चाबी का इंतजार कर रहे लाखों फ्लैट खरीदारों और रियल एस्टेट सेक्टर के लिए देश की शीर्ष अदालत से ऐतिहासिक और राहत भरी खबर सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी अधूरे हाउसिंग प्रोजेक्ट में डिफॉल्टर या दिवालिया हो चुके मूल बिल्डर द्वारा की गई देरी का हर्जाना अथवा जुर्माना (Time Extension Charges) घर खरीदारों या उस प्रोजेक्ट को पूरा कराने वाली नई रेजोल्यूशन कंपनी पर नहीं थोपा जा सकता। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने साफ लफ्जों में कहा कि जो खरीदार पहले से ही सालों तक प्रताड़ित हो चुके हैं और अब अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा दोबारा इकट्ठा करके अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें पूर्व बिल्डर के ‘पुराने पापों’ (Past Sins of Corporate Debtor) की सजा नहीं दी जा सकती।
यह ऐतिहासिक फैसला नोएडा के सेक्टर 100 और सेक्टर 110 में स्थित दो बहुचर्चित हाउसिंग प्रोजेक्ट्स—‘लोटस बुलेवार्ड’ (Lotus Boulevard) और ‘लोटस पनाचे’ (Lotus Panache) से जुड़ी याचिकाओं पर आया है। इन हाउसिंग प्रोजेक्ट्स को ग्रेनाइट गेट प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड (Granite Gate Properties) द्वारा विकसित किया जाना था, जिसने नोएडा अथॉरिटी से लंबी अवधि की लीज पर जमीन ली थी।
एग्रीमेंट के तहत इन बहुमंजिला अपार्टमेंट्स को साल 2016 तक पूरी तरह तैयार करके खरीदारों को पजेशन देना था, लेकिन डेवलपर गंभीर वित्तीय संकट में फंस गया और सैकड़ों फ्लैट्स का निर्माण अधूरा छोड़कर हाथ खड़े कर दिए। इसके बाद कंपनी के खिलाफ दिवालिया समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू हुई, जिसमें कानून के तहत घर खरीदारों को ‘वित्तीय लेनदार’ (Financial Creditors) का दर्जा दिया गया।
जब प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए एम/एस एसएमवी एजेंसीज प्राइवेट लिमिटेड (SMV Agencies) को सफल रेजोल्यूशन आवेदक (SRA) चुना गया, तो घर खरीदारों ने खुद आगे आकर ‘पूल एंड बिल्ड’ (Pool and Build) व्यवस्था के तहत अपनी सामूहिक पूंजी जमा की ताकि अधूरे पड़े फ्लैट्स का काम आगे बढ़ सके और लोगों को उनके घर मिल सकें।
लेकिन इसी बीच नोएडा अथॉरिटी ने निर्माण में हुई वर्षों की देरी के बदले लीज प्रीमियम पर भारी-भरकम ‘टाइम एक्सटेंशन चार्ज’ (समय विस्तार शुल्क) का दावा ठोक दिया और भुगतान न होने पर लोटस पनाचे के तीन टावरों को सील तक कर दिया। मामला जब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) पहुंचा, तो ट्रिब्यूनल ने इस जुर्माने को दिवालिया प्रक्रिया का प्रशासनिक खर्च (CIRP Cost) मान लिया, जिसका सीधा वित्तीय बोझ अंततः लाचार घर खरीदारों की जेब पर ही पड़ रहा था। इसके खिलाफ खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद एनसीएलएटी (NCLAT) के उस आदेश को पूरी तरह खारिज व रद्द कर दिया, जिसमें नोएडा अथॉरिटी के विलंब शुल्क को सीआईआरपी लागत में शामिल करने को वैध ठहराया गया था।
अदालत ने अपने फैसले में अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या करते हुए कहा:
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जुर्माने का मूल उद्देश्य: स्थानीय प्राधिकरण द्वारा लीज डीड में टाइम एक्सटेंशन चार्ज लगाने का मूल उद्देश्य बिल्डर पर दबाव बनाना होता है ताकि वह समय पर निर्माण पूरा करे और भविष्य में ऐसी देरी से बचे।
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मूल बिल्डर अब बाहर है: इस मामले में डिफॉल्ट करने वाला मूल बिल्डर दिवालिया होकर प्रोजेक्ट से पूरी तरह बाहर हो चुका है। ऐसे में उस दंड का भुगतान उन खरीदारों से कराना जो खुद अपनी पूंजी लगाकर प्रोजेक्ट को जिंदा कर रहे हैं, कानून और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है।
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अथॉरिटी की सामाजिक जिम्मेदारी: शीर्ष अदालत ने रेखांकित किया कि नोएडा अथॉरिटी कोई विशुद्ध मुनाफा कमाने वाली निजी व्यापारिक संस्था नहीं है, बल्कि एक वैधानिक स्थानीय निकाय (Local Authority) है जिसका प्राथमिक दायित्व क्षेत्र का कल्याण और विकास सुनिश्चित करना है। ऐसी परिस्थितियों में हठधर्मिता दिखाते हुए भारी जुर्माना वसूलना निर्माण को आगे बढ़ाने के बजाय उसमें बाधा डालता है।
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वह इस मामले में लगाए गए तमाम पेनल्टी और टाइम एक्सटेंशन चार्ज को पूरी तरह माफ (Waive off) करे। इसके साथ ही अदालत ने अथॉरिटी की उस अपील को भी खारिज कर दिया जिसमें 3 साल से लेकर 10 साल तक की अवधि का अतिरिक्त शुल्क मांगा जा रहा था।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय केवल लोटस बुलेवार्ड और लोटस पनाचे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह एक न्यायिक मिसाल (Precedent) बन गया है। इसका सीधा और दूरगामी सकारात्मक असर दिल्ली-एनसीआर, विशेषकर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र की दर्जनों अटकी हुई हाउसिंग सोसायटियों पर पड़ेगा:
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फंसे हुए प्रोजेक्ट्स को मिलेगी गति: आम्रपाली, जेपी, यूनिटेक और सुपरटेक जैसे दिवालिया मामलों या अन्य अधर में लटकी परियोजनाओं में जहां नए बिल्डर या खरीदार एसोसिएशन काम पूरा करने आगे आ रहे हैं, वहां अब स्थानीय विकास प्राधिकरण मनमाना विलंब शुल्क वसूल कर काम नहीं रोक पाएंगे।
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फ्लैट खरीदारों की लाखों रुपये की बचत: यदि यह जुर्माना खरीदारों के सिर मढ़ा जाता, तो प्रत्येक फ्लैट खरीदार को सुपर-एरिया चार्ज या अतिरिक्त विकास शुल्क के नाम पर कई-कई लाख रुपये अपनी जेब से भरने पड़ते। इस फैसले से उनकी गाढ़ी कमाई सीधे तौर पर सुरक्षित हो गई है।
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फ्लैटों की रजिस्ट्री और पजेशन का रास्ता साफ: जिन प्रोजेक्ट्स में केवल अथॉरिटी के बकाया और टाइम एक्सटेंशन पेनल्टी के विवाद के कारण कंप्लीशन सर्टिफिकेट (CC), ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट (OC) और फ्लैटों की रजिस्ट्री रुकी हुई थी, वहां अब कानूनी अड़चनें तेजी से दूर होंगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त और मानवीय फैसले के बाद पिछले 10 से 12 वर्षों से ईएमआई और किराए के दोहरे बोझ तले पिस रहे हजारों परिवारों ने राहत की सांस ली है। खरीदारों का कहना है कि उन्होंने समय पर बिल्डर को फ्लैट की पूरी कीमत चुकाई थी, फिर भी उन्हें पजेशन नहीं मिला। ऐसे में अथॉरिटी का उनसे ही जुर्माना मांगना जले पर नमक छिड़कने जैसा था। शीर्ष अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उपभोक्ता और घर खरीदार के अधिकारों की रक्षा हर वित्तीय विवाद में सर्वोपरि है।
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