
सनातन धर्म में त्रयोदशी तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना गया है। यह पावन तिथि देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती की संयुक्त आराधना के लिए समर्पित होती है। जब त्रयोदशी तिथि शुक्रवार के दिन पड़ती है, तो इसे ‘शुक्र प्रदोष व्रत’ कहा जाता है। ज्योतिष और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शुक्र प्रदोष व्रत रखने से दांपत्य जीवन में मधुरता आती है, वैवाहिक जीवन के तनाव दूर होते हैं और साधक को जीवन में भौतिक सुख, धन, ऐश्वर्य व उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत का वास्तविक फल सूर्यास्त के समय यानी ‘प्रदोष काल’ में किए गए शिव पूजन से मिलता है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव अपने संपूर्ण परिवार के साथ कैलाश पर आनंद तांडव करते हैं और अपने भक्तों के समस्त कष्टों का निवारण करते हैं। आइए जानते हैं आज का संपूर्ण पंचांग, प्रदोष काल का सटीक समय और पूजा की शास्त्र सम्मत विधि।
आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का प्रभाव रहेगा। आज के पंचांग की खगोलीय और ज्योतिषीय स्थिति इस प्रकार है:
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संवत: विक्रम संवत 2083, शक संवत 1948
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मास व पक्ष: आश्विन मास, शुक्ल पक्ष
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तिथि: त्रयोदशी तिथि
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दिन: शुक्रवार (माता लक्ष्मी और शुक्र ग्रह को समर्पित)
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नक्षत्र: पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र (उपरान्त उत्तराभाद्रपद नक्षत्र)
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करण: कौलव करण (उपरान्त तैतिल)
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सूर्य राशि: तुला राशि
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चंद्र राशि: मीन राशि में संचरण
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सूर्योदय: प्रातः 06:27 बजे
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सूर्यास्त: सायं 05:43 बजे
प्रदोष व्रत में मुख्य पूजा सूर्यास्त से 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक के समय (प्रदोष काल) में की जाती है। इस समयावधि में की गई आराधना सीधे शिवलोक तक पहुंचती है:
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प्रदोष काल पूजा मुहूर्त: सायं 05:43 बजे से रात्रि 08:14 बजे तक (कुल अवधि लगभग 2 घंटे 31 मिनट)
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अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:43 बजे से दोपहर 12:28 बजे तक (सभी सामान्य शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ)
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विजय मुहूर्त: दोपहर 01:58 बजे से 02:43 बजे तक
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गोधूलि वेला: सायं 05:43 बजे से 06:08 बजे तक
पूजा की तैयारी या किसी नए संकल्प के दौरान आज के अशुभ समय से परहेज करना श्रेयस्कर रहता है:
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राहुकाल: पूर्वाह्न 10:30 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक (इस समय में कोई नया मांगलिक कार्य न करें)
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यमगंड काल: अपराह्न 03:00 बजे से 04:30 बजे तक
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गुलिक काल: प्रातः 07:30 बजे से 09:00 बजे तक
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दुर्मुहूर्त: प्रातः 08:44 बजे से 09:29 बजे तक और दोपहर 12:28 बजे से 01:13 बजे तक
प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद स्वच्छ श्वेत या हल्के गुलाबी वस्त्र धारण करें और दिनभर मन ही मन “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हुए फलाहार व्रत का संकल्प लें। प्रदोष काल शुरू होने से पहले दोबारा हाथ-मुंह धोकर पूजा स्थल पर बैठें:
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पंचामृत अभिषेक: शिवलिंग को गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद कच्चा गाय का दूध, दही, शुद्ध घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) से विधिवत अभिषेक करें। अंत में पुनः शुद्ध जल या गंधोदक से स्नान कराएं।
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श्रृंगार और सामग्री अर्पण: महादेव को सफेद चंदन का त्रिपुंड लगाएं, अक्षत (अखंडित चावल), श्वेत आंकड़े के फूल, धतूरा, भांग और शमी पत्र अर्पित करें। ध्यान रखें कि शिवलिंग पर कभी भी खंडित बेलपत्र न चढ़ाएं; कम से कम 11 या 21 चिकने बेलपत्र “ॐ नमः शिवाय” बोलते हुए अर्पित करें।
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माता पार्वती का पूजन: चूंकि आज शुक्र प्रदोष है, इसलिए शिवलिंग के साथ-साथ मां पार्वती को लाल चुनरी, सिंदूर और 16 श्रृंगार की सामग्री अवश्य भेंट करें। इससे दांपत्य सुख में वृद्धि होती है।
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धूप-दीप और भोग: शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित धूपबत्ती जलाएं। भगवान को मौसमी फल और सफेद मिठाई (जैसे मावे के पेड़े या खीर) का भोग लगाएं।
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आरती व क्षमा प्रार्थना: अंत में ‘शिव चालीसा’, ‘दारिद्र्य दहन स्तोत्र’ या ‘रुद्राष्टकम’ का पाठ करें और कपूर से प्रेमपूर्वक आरती उतारें। पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
शुक्र ग्रह धन, वैभव, विलासिता और दांपत्य प्रेम का कारक माना जाता है। यदि वैवाहिक जीवन में बार-बार कलह होती है या घर में बरकत नहीं रुक रही है, तो आज शाम प्रदोष काल में शिवलिंग पर थोड़ा सा गाय का कच्चा दूध और मिश्री अर्पित करें। इसके साथ ही भगवान शिव के मंदिर में सुगंधित सफेद इत्र और सफेद कनेर या चमेली के फूल चढ़ाने से कुंडली में शुक्र दोष समाप्त होता है और परिवार में सुख, शांति व समृद्धि का वास होता है।
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