
भारत को दुनिया भर में केवल सांस्कृतिक या भाषाई विविधताओं के लिए ही नहीं, बल्कि एक ‘उपमहाद्वीप’ (Subcontinent) का दर्जा इसीलिए दिया जाता है क्योंकि इसका भूगोल किसी एक देश जैसा नहीं, बल्कि पूरे महाद्वीप जैसा है। अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि जब कश्मीर के गुलमर्ग, सोनमर्ग या पहलगाम की ऊंची चोटियों पर ताजा बर्फबारी के चलते पारा शून्य के करीब पहुंच जाता है, ठीक उसी समय देश की राजधानी दिल्ली और एनसीआर के इलाके बादलों की गड़गड़ाहट और मूसलाधार बारिश से तरबतर हो रहे होते हैं। वहीं चंद सौ किलोमीटर पूर्व की ओर बढ़ें, तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मैदान उफनती नदियों की बाढ़, 40 डिग्री जैसी चुभने वाली गर्मी और 85 से 90 प्रतिशत की दमघोंटू उमस (Humidity) से जूझ रहे होते हैं। पहली नजर में यह विरोधाभास किसी कुदरती करिश्मे जैसा लगता है, लेकिन मौसम विज्ञान और भौतिक भूगोल (Physical Geography) के चश्मे से देखें तो यह भारत की विशिष्ट भू-आकृति, वायुमंडलीय दबाव और मानसूनी पवन तंत्र का एक पूरी तरह सुनियोजित वैज्ञानिक संतुलन है।
अक्षांशीय विस्तार और समुद्र से दूरी: उष्णकटिबंध से शीतोष्ण कटिबंध का सफर
भारत के मौसम में इस भारी अंतर की पहली बुनियादी वजह इसका विशाल अक्षांशीय फैलाव (Latitudinal Extent) है। भारत दक्षिण में 8°4′ उत्तरी अक्षांश (कन्याकुमारी) से शुरू होकर उत्तर में 37°6′ उत्तरी अक्षांश (कश्मीर और लद्दाख) तक लगभग 3,214 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है। कर्क रेखा (Tropic of Cancer) देश के ठीक बीचों-बीच से होकर गुजरती है, जो भारत को दो अलग-अलग जलवायु कटिबंधों में बांट देती है। देश का दक्षिणी और मध्य हिस्सा उष्णकटिबंधीय (Tropical Zone) है, जहां सालभर तेज सौर ऊर्जा और भारी तापमान रहता है, जबकि उत्तरी भाग उपोष्ण और शीतोष्ण (Sub-Tropical and Temperate Zone) क्षेत्र में आता है। इसके अलावा, समुद्र से दूरी (Continentality) का प्रभाव भी मौसम को बदलता है। समुद्र के करीब स्थित तटीय इलाकों में समुद्री हवाओं के कारण तापमान का उतार-चढ़ाव संतुलित रहता है, जबकि देश के भीतरी मैदानी और पर्वतीय हिस्से समुद्र से हजारों किलोमीटर दूर होने के कारण महाद्वीपीय जलवायु का सामना करते हैं, जहां मौसमी चरम सीमाएं (Extreme Weather Events) देखने को मिलती हैं।
ऊंचाई का नियम (Lapse Rate): कश्मीर की वादियों में क्यों जमती है बर्फ?
कश्मीर और लद्दाख में समय से पहले होने वाली बर्फबारी या कड़ाके की ठंड का सबसे बड़ा कारण भूभौतिकी का ‘नॉर्मल लैप्स रेट’ (Normal Lapse Rate) है। विज्ञान का यह सीधा नियम कहता है कि समुद्र तल से जैसे-जैसे ऊंचाई बढ़ती है, वायुमंडलीय दबाव कम होता जाता है और प्रति 1,000 मीटर (1 किलोमीटर) की चढ़ाई पर तापमान औसतन 6.5 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। दिल्ली और पटना जहां समुद्र तल से मात्र 150 से 210 मीटर की ऊंचाई पर मैदानी बेसिन में स्थित हैं, वहीं कश्मीर घाटी की औसत ऊंचाई 1,600 से 2,200 मीटर है, जबकि इसके आसपास की पीर पंजाल और जांस्कर पर्वत श्रृंखलाएं 3,500 से 5,000 मीटर से भी अधिक ऊंची हैं। जब भूमध्य सागर से उठने वाला कोई पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbance) या मानसूनी नमी की ठंडी धाराएं इन ऊंची पहाड़ियों से टकराकर ऊपर उठती हैं, तो वहां मौजूद अत्यंत कम तापमान के कारण जलवाष्प पानी की बूंदों के बजाय सीधे हिम कणों (Snow Crystals) में संघनित (Condense) हो जाती है, जिसे पर्वतीय वर्षा या स्नोफॉल कहा जाता है।
मानसूनी ट्रफ की धुरी: दिल्ली-एनसीआर में कैसे होती है मूसलाधार बारिश?
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और उत्तर-पश्चिम भारत में होने वाली जोरदार बारिश के पीछे मानसूनी ट्रफ (Monsoon Trough) का सीधा हाथ होता है। मानसूनी ट्रफ वास्तव में कम हवा के दबाव (Low Pressure) की एक लंबी अदृश्य पट्टी होती है, जो पाकिस्तान के थार रेगिस्तान से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली होती है। यह ट्रफ हमेशा स्थिर नहीं रहती, बल्कि उत्तर और दक्षिण की ओर दोलन (Oscillate) करती रहती है। जब भी बंगाल की खाड़ी या मध्य भारत से कोई डिप्रेशन (निम्न दबाव का चक्रवात) उत्तर भारत की ओर बढ़ता है, तो यह मानसूनी ट्रफ को खींचकर दिल्ली-हरियाणा के ठीक ऊपर ला खड़ा करता है। इस स्थिति में अरब सागर से आने वाली नमी भरी पश्चिमी हवाएं और बंगाल की खाड़ी से आने वाली पूर्वी पुरवैया हवाएं दिल्ली के आकाश पर आपस में टकराती हैं। हवाओं के इस शक्तिशाली अभिसरण (Convergence) के चलते घने क्यूम्युलोनिम्बस (Cumulonimbus) बादल बनते हैं, जो कुछ ही घंटों में दिल्ली-एनसीआर की सड़कों को जलमग्न कर देने वाली तेज बौछारें बरसाते हैं।
नेपाल की पहाड़ियां और बंगाल की खाड़ी का प्रभाव: बिहार में बाढ़ और उमस का दोहरा वार
बिहार की स्थिति देश के अन्य राज्यों से पूरी तरह अलग और भौगोलिक रूप से अत्यंत संवेदनशील है। बिहार एक कटोरेनुमा मैदानी क्षेत्र है, जिसके उत्तर में नेपाल का विशाल हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) मौजूद है। जब मानसून सक्रिय होता है, तो बंगाल की खाड़ी से चलने वाली नम हवाएं सबसे पहले बिना किसी बड़ी रुकावट के गंगा के मैदानों से होते हुए बिहार और नेपाल की तलहटी (तराई) से टकराती हैं। नेपाल के पहाड़ी इलाकों में जब भीषण बारिश होती है, तो वहां की ढलानों से लाखों क्यूसेक पानी तेज गति से बहते हुए कोसी, गंडक, बागमती, कमला बलान और बूढ़ी गंडक जैसी नदियों के जरिए सीधे उत्तरी बिहार के मैदानी इलाकों में प्रवेश कर जाता है। मैदानी ढलान बहुत कम होने के कारण यह पानी तेजी से आगे नहीं निकल पाता और विशाल बाढ़ का रूप ले लेता है। वहीं दूसरी ओर, बिहार में बाढ़ के पानी और नदी बेसिन से उठने वाली लगातार नमी जब 35 से 38 डिग्री की धूप के संपर्क में आती है, तो हवा में सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) 85 से 95 प्रतिशत के पार पहुंच जाती है। यही कारण है कि वहां हवा का चलना रुकते ही शरीर से पसीना सूखना बंद हो जाता है और असहनीय, चिपचिपी उमस का माहौल बन जाता है।
वायुमंडलीय प्रणालियों का महा-टकराव: भारत की विविधता ही उसकी पहचान है
भारत का मौसम विज्ञान इस बात का सटीक उदाहरण है कि कैसे तीन अलग-अलग वायुमंडलीय प्रणालियां एक ही समय में एक ही भूभाग पर सक्रिय रह सकती हैं। उत्तर में हिमालय एक विशाल प्राकृतिक दीवार की तरह खड़ा है, जो साइबेरिया से आने वाली बर्फीली हवाओं को रोककर उत्तर भारत के मैदानों को अत्यधिक जमने से बचाता है और साथ ही मानसूनी बादलों को देश से बाहर जाने से रोककर भरपूर पानी बरसाने पर मजबूर करता है। वहीं, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से आने वाली दोहरी समुद्री शाखाएं देश के पूर्वी और पश्चिमी छोरों को अलग-अलग समय पर नमी देती हैं। यही जटिल भौगोलिक ताना-बाना तय करता है कि एक ही दिन भारत का एक नागरिक कश्मीर में गर्म फेरन और कांगड़ी का सहारा ले रहा होता है, दिल्ली का मुसाफिर छाता और रेनकोट संभाल रहा होता है, और बिहार का किसान अपनी नाव पर बैठकर उमस भरे बादलों से थोड़ी राहत की उम्मीद कर रहा होता है। यह विविधता किसी मौसम की विसंगति नहीं, बल्कि प्रकृति द्वारा भारत के नक्शे पर खींचा गया एक अनूठा और संतुलित चक्र है।
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