खुफिया एजेंसी के प्रमुख दिल्ली में, तो 4 शीर्ष अधिकारी पहुंचे बीजिंग

पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद से ही दक्षिण एशिया की कूटनीति में लगातार भूचाल आया हुआ है। इस बीच ढाका से एक बेहद चौंकाने वाली और रणनीतिक रूप से सनसनीखेज खबर सामने आ रही है, जो भारत और चीन दोनों के बीच कूटनीतिक गलियारों में चर्चा का सबसे बड़ा केंद्र बन गई है। बांग्लादेश की शीर्ष खुफिया एजेंसी के प्रमुख अचानक चुपचाप दिल्ली के दौरे पर पहुँचे हैं, ताकि भारतीय सुरक्षा और कूटनीतिक तंत्र के साथ बिगड़े हुए रिश्तों को पटरी पर लाया जा सके। लेकिन इसी के साथ दूसरी तरफ, बांग्लादेशी सेना और प्रशासन के चार वरिष्ठ व अति संवेदनशील अधिकारी बीजिंग की यात्रा पर रवाना हो गए हैं, जहाँ वे चीन के सैन्य और खुफिया आकाओं के साथ गुप्त वार्ताओं में जुटे हुए हैं। एक ही समय पर देश के दो सबसे बड़े पड़ोसी और धुर विरोधी महाशक्तियों—भारत और चीन—को एक साथ साधने की यह दोहरी कूटनीति इस बात का साफ संकेत देती है कि ढाका की नई अंतरिम या सत्तासीन व्यवस्था अभी भी गहरे असमंजस और अवसरवादी राजनीति के दौर से गुजर रही है।

भारत के साथ रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाने की मजबूरी और दिल्ली का दौरा

बांग्लादेश के लिए भारत केवल एक पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था, ऊर्जा जरूरतों, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला का सबसे बड़ा और अनिवार्य जीवन रेखा रहा है। पिछले कुछ महीनों में भारत-बांग्लादेश संबंधों में आई खटास और कड़वाहट के कारण ढाका की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसी गंभीर यथार्थ को समझते हुए बांग्लादेशी खुफिया एजेंसी के शीर्ष प्रमुख ने बिना किसी बड़े मीडिया शोरगुल के नई दिल्ली की गुप्त और महत्वपूर्ण यात्रा की है। इस उच्चस्तरीय दौरे का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र के बीच आपसी विश्वास को बहाल करना, खुफिया जानकारियों का साझा आदान-प्रदान शुरू करना और सीमावर्ती इलाकों में बढ़ते तनाव को कम करना है। दिल्ली के रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बांग्लादेश की मौजूदा व्यवस्था यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि भारत को पूरी तरह से नजरअंदाज करके देश में स्थिरता लाना असंभव है, और यही वजह है कि वे कूटनीतिक मोर्चे पर समझौते और संवाद का रास्ता तलाशने के लिए मजबूर हो गए हैं।

बीजिंग भेजे गए 4 वरिष्ठ अधिकारी: चीन के पाले में गोटियां फिट करने की चाल

एक तरफ जहां खुफिया प्रमुख दिल्ली में भारत को यह विश्वास दिलाने में जुटे हैं कि बांग्लादेश द्विपक्षीय संप्रभुता का सम्मान करता है, वहीं दूसरी तरफ ठीक उसी समय चार उच्चाधिकारियों के एक विशेष दल का बीजिंग पहुँच जाना कई बड़े और गंभीर सवाल खड़े करता है। चीन लंबे समय से बांग्लादेश में अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए अरबों डॉलर के बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स, बंदरगाहों के विकास और सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति का जाल बिछाता रहा है। बीजिंग जाने वाले इन चार अधिकारियों का एजेंडा पूरी तरह से चीन के साथ रणनीतिक, सैन्य और तकनीकी सहयोग को और अधिक प्रगाढ़ बनाना है। विश्लेषकों का कहना है कि ढाका की यह दोहरी चाल इस पुरानी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वे भारत से आर्थिक और भौगोलिक मजबूरियों के कारण दूरी नहीं बना सकते, लेकिन चीन की वित्तीय मदद और सामरिक दबाव के आगे झुककर अपनी सामरिक निष्ठा को बीजिंग के पाले में भी बंधक बनाए रखना चाहते हैं।

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में बांग्लादेश का यह खतरनाक संतुलन का खेल

दक्षिण एशिया के इस संवेदनशील भू-राजनीतिक परिदृश्य में बांग्लादेश की यह ‘बैलेंसिंग एक्ट’ यानी संतुलन साधने की नीति क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक नया सिरदर्द बन गई है। किसी भी देश के लिए दो महाशक्तियों के बीच इस तरह की दोहरी कूटनीति चलना अल्पकालिक लाभ तो दे सकती है, लेकिन लंबे समय में यह देश के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। भारत अपनी उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर सुरक्षा को लेकर अत्यंत संवेदनशील है, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों की सुरक्षा के लिहाज से ढाका का रुख भारत के लिए बहुत मायने रखता है। यदि बांग्लादेश चीन के इशारों पर भारत विरोधी गतिविधियों या रणनीतिक घुसपैठ को बढ़ावा देने का प्रयास करता है, तो नई दिल्ली भी अपनी तरफ से कड़े और स्पष्ट आर्थिक व सामरिक प्रतिबंधों का रुख अपनाने से पीछे नहीं हटेगी। दूसरी ओर, चीन कभी भी मुफ्त में मदद नहीं करता और वह बांग्लादेश को अपने ‘डेट ट्रैप’ यानी कर्ज के जाल में फंसाकर बंगाल की खाड़ी में अपनी नौसैनिक उपस्थिति मजबूत करने की फिराक में है, जो खुद ढाका की संप्रभुता के लिए भविष्य में बड़ा खतरा बन सकता है।

भारत और चीन के बीच उलझा बांग्लादेश, आने वाले दिनों में क्या होंगे परिणाम

कुल मिलाकर, बांग्लादेश की खुफिया एजेंसी प्रमुख का दिल्ली दौरा और चार अधिकारियों का बीजिंग जाना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि ढाका के हुक्मरान इस वक्त भयंकर कूटनीतिक दुविधा और अवसरवादिता के शिकार हैं। वे एक ही समय पर भारत के साथ व्यापारिक व सुरक्षा रिश्तों को भी बचाए रखना चाहते हैं और चीन के पैसों व हथियारों के लालच से भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस प्रकार की दोहरी नाव की सवारी ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकती। भारत ने हमेशा पड़ोसी पहले की नीति के तहत हर संकट में बांग्लादेश का साथ दिया है, लेकिन यदि वहां की सरकार अपनी कूटनीति में स्पष्टता नहीं लाती है और चीन के जरिए भारत की सुरक्षा हितों को प्रभावित करने की कोशिश करती है, तो नई दिल्ली इस दोहरे खेल का करारा और निर्णायक जवाब देने के पूरी तरह सक्षम है। आने वाले कुछ सप्ताह इस बात का फैसला करेंगे कि बांग्लादेश अपनी इस ढुलमुल और चालबाज नीतियों के सहारे किधर जाता है और क्षेत्रीय कूटनीति का ऊंट किस करवट बैठता है।