बलिया की सात सीटों पर कौन पड़ेगा भारी? SP और BJP में तगड़ी टक्कर

पूर्वांचल की सियासत में ‘बागी बलिया’ (Ballia) के नाम से मशहूर यह जिला हमेशा से देश और प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करता आया है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक भारत की राजनीति तक अपनी अलग पहचान रखने वाला बलिया राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील और रणनीतिक जिला माना जाता है। जिले की सात विधानसभा सीटों—बेल्थरा रोड, रसड़ा, सिकंदरपुर, फेफना, बलिया नगर, बांसडीह और बैरिया पर मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) के बीच देखने को मिलता है। यहां की राजनीतिक लड़ाई केवल दो दलों की नहीं, बल्कि जातीय निष्ठा, स्थानीय क्षत्रपों के रसूख और विकास बनाम मुद्दों की जंग बन चुकी है। आइए जानते हैं कि बलिया की इन 7 सीटों का पूरा सियासी गणित क्या है और कौन सा दल किस पर भारी पड़ रहा है।

बलिया जिले की सात विधानसभा सीटों का समीकरण काफी दिलचस्प और विविध है। अगर पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों और मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी ने जिले में अपना मजबूत आधार साबित किया था। सपा ने फेफना (संग्राम सिंह), बैरिया (जयप्रकाश अंचल) और सिकंदरपुर (जियाउद्दीन रिजवी) सीटों पर कब्जा जमाया था। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पकड़ दिखाते हुए बलिया नगर (दयाशंकर सिंह) और बांसडीह (केतकी सिंह) सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके अलावा, गठबंधन सहयोगियों और अन्य दलों में बेल्थरा रोड सीट से सुभासपा (SBSP) के हंसू राम और रसड़ा की परंपरागत सीट से बहुजन समाज पार्टी (BSP) के उमाशंकर सिंह ने जीत का परचम लहराया था।

बलिया जिले में समाजवादी पार्टी की ताकत का मुख्य आधार उसका पारंपरिक वोट बैंक (यादव व मुस्लिम) और पिछड़ा वर्ग (OBC) का गठजोड़ है। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के समय से ही बलिया सपा का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है। इसके अलावा, हालिया वर्षों में सपा का ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूला और स्थानीय मुद्दों जैसे बाढ़, गंगा-घाघरा के कटान से किसानों को होने वाले नुकसान और कृषि संकट पर आक्रामक घेराबंदी सपा को बढ़त दिलाती है। सिकंदरपुर, बैरिया और फेफना जैसे क्षेत्रों में सपा का जमीनी संगठन और स्थानीय नेताओं का मजबूत नेटवर्क पार्टी को हर मोर्चे पर मजबूती प्रदान करता है।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के पास जिले में अपना एक मजबूत और समर्पित कैडर बेस है। उच्च वर्ग (ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य) के साथ-साथ भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और अति-दलित वर्गों में अपनी गहरी पैठ बनाई है। बलिया नगर सीट पर मंत्री दयाशंकर सिंह की जीत और बांसडीह में केतकी सिंह का रामगोविंद चौधरी जैसे बड़े सपा नेता को हराना यह साबित करता है कि भाजपा ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में सीधी टक्कर देने में सक्षम है। भाजपा की सबसे बड़ी ताकत केंद्र व राज्य की ‘डबल इंजन’ सरकार द्वारा चलाई जा रही मुफ्त राशन, आवास योजना, किसान सम्मान निधि जैसी कल्याणकारी योजनाएं और बुनियादी ढांचे का विकास है, जो महिला मतदाताओं और लाभार्थियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

बलिया में चुनाव का रुख तय करने में जातीय समीकरण सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जिले में यादव, क्षत्रिय, राजभर, ब्राह्मण, मौर्या-कुशवाहा, निषाद और अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या निर्णायक स्थिति में है। ऐसे में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) और निषाद पार्टी जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों का रुख दोनों प्रमुख दलों के जीत-हार का गणित बिगाड़ या बना सकता है। सुभासपा का राजभर वोटों पर असर बेल्थरा रोड और रसड़ा जैसी सीटों पर सीधा प्रभाव डालता है। इसके अलावा, बसपा का अपना पारंपरिक दलित कैडर वोट (खासकर रसड़ा क्षेत्र में) भी मुकाबले को त्रिकोणीय या बेहद दिलचस्प बना देता है।