
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इस समय वैश्विक राजनीति की सबसे बड़ी चर्चा का केंद्र चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का आगामी ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन को लेकर अपनाया गया रुख बना हुआ है। दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक और रणनीतिक मंचों में से एक माने जाने वाले ब्रिक्स समूह का यह सम्मेलन जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे चीन के सर्वोच्च नेता की तरफ से किसी भी स्पष्ट बयान या कार्यक्रम की पुष्टि न होने के कारण कयासों का बाजार गर्म हो गया है। जानकारों के बीच यह सवाल सबसे बड़ा बनकर उभरा है कि क्या शी जिनपिंग इस बार भारत की मेजबानी में होने वाले या इस क्षेत्रीय सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से शिरकत करेंगे या फिर वे किसी सोची-समझी रणनीति के तहत इस आयोजन से दूरी बनाते हुए नजर आ रहे हैं। इस रहस्यमयी चुप्पी ने दुनिया भर के भू-राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बीजिंग के अंदरखाने क्या कुछ पक रहा है और इसका असर एशियाई कूटनीति पर क्या पड़ने वाला है।
भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों में पिछले कुछ वर्षों से सीमा विवाद और सैन्य तनाव के चलते जो खटास और शीत युद्ध का माहौल बना हुआ है, उसके मद्देनजर शी जिनपिंग की किसी भी संभावित भारत यात्रा को बहुत बारीकी से परखा जा रहा है। कूटनीतिक हलकों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या चीनी राष्ट्रपति भारत आने से हिचकिचा रहे हैं या फिर यह उनकी किसी बड़ी कूटनीतिक सौदेबाजी का हिस्सा है। वैश्विक मंचों पर अपनी धमक बनाए रखने के लिए चीन अक्सर इस तरह की रणनीतिक अनिश्चितता का सहारा लेता है ताकि अन्य देशों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके। जब ब्रिक्स जैसे महत्वपूर्ण संगठन की बैठक में मेजबान देश के रूप में भारत पूरी दुनिया का नेतृत्व कर रहा हो, ऐसे में चीन के शीर्ष नेतृत्व का इस तरह से असमंजस की स्थिति में रहना इस बात का संकेत देता है कि बीजिंग अपने कूटनीतिक समीकरणों को नए सिरे से साधने की कोशिश कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का यह भी मानना है कि शी जिनपिंग की इस चुप्पी के तार केवल भारत-चीन संबंधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे वैश्विक महाशक्तियों के बीच चल रहे नए समीकरणों का भी बड़ा हाथ हो सकता है। आज के समय में जब दुनिया स्पष्ट रूप से अलग-अलग ध्रुवों में बंटती हुई दिखाई दे रही है, तब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की नजरें ब्रिक्स देशों के भीतर आपसी तालमेल पर टिकी हुई हैं। ऐसे में कुछ विश्लेषकों द्वारा यह भी कयास लगाया जा रहा है कि क्या इस पूरी स्थिति के पीछे तथाकथित रूप से किसी नए वैश्विक शक्ति संतुलन या ‘जी3’ यानी दुनिया के चुनिंदा ताकतवर देशों के बीच पर्दे के पीछे चल रही किसी बड़ी चाल का असर तो नहीं है। चीन हमेशा से यह चाहता है कि बहुपक्षीय मंचों पर उसका वर्चस्व बना रहे और यदि किसी सम्मेलन में उसे अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुकूल माहौल नहीं दिखता है, तो वह अक्सर अपने शीर्ष नेतृत्व की उपस्थिति को लेकर आखिरी समय तक सस्पेंस बनाए रखता है।
दूसरी ओर, नई दिल्ली का रुख इस मामले में बेहद स्पष्ट और परिपक्व नजर आ रहा है। भारत ने हमेशा से वैश्विक बहुपक्षीय मंचों पर स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय देते हुए सभी सदस्य देशों के साथ संवाद के दरवाजे खुले रखे हैं। ब्रिक्स जैसे मंच केवल किसी एक देश के नेता या आपसी मतभेदों के मोहताज नहीं हैं, बल्कि यह ग्लोबल साउथ की आवाज को बुलंद करने और वैश्विक आर्थिक प्राथमिकताओं को तय करने का एक सामूहिक माध्यम हैं। यदि चीनी राष्ट्रपति इस सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं भी होते हैं, तो भी भारत की मेजबानी और कूटनीतिक वजन पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला नहीं है। आज की तारीख में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के एक प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में खड़ा है और दुनिया के तमाम देश भारत के साथ आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने को अपनी प्राथमिकता मान रहे हैं, जिससे चीन की रणनीतिक चिंताएं और अधिक बढ़ गई हैं।
शी जिनपिंग की यह चुप्पी और ब्रिक्स सम्मेलन को लेकर चीन का अंतिम रुख क्या होगा, इसका खुलासा तो आने वाले कुछ ही दिनों में हो जाएगा, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि एशियाई राजनीति में कूटनीति के कितने ही आयाम छिपे होते हैं। चाहे चीन प्रत्यक्ष रूप से इस सम्मेलन में हिस्सा ले या अपने किसी प्रतिनिधिमंडल को भेजे, भारत और चीन के बीच का रणनीतिक मुकाबला और कूटनीतिक शतरंज का यह खेल लंबे समय तक जारी रहने की पूरी उम्मीद है। नई दिल्ली जिस प्रकार से अपनी कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए हर अंतरराष्ट्रीय चुनौती का सामना कर रही है, उसने यह दिखा दिया है कि भारत अब किसी भी बाहरी दबाव के आगे झुकने के बजाय अपनी शर्तों पर वैश्विक पटल पर अपनी जगह तय कर रहा है। दुनिया भर की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि बीजिंग की तरफ से इस सस्पेंस पर आधिकारिक मुहर कब लगती है और इसका असर आने वाले वैश्विक सम्मेलनों की रूपरेखा पर क्या पड़ता है।
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