लाइबेरिया के अभ्यारण्य में हेपेटाइटिस बी टीके के परीक्षण वाले चिंपांजियों की हो रही व्यापक स्वास्थ्य जांच

लाइबेरिया की धरती पर दशकों पहले हुए चिकित्सा इतिहास के एक बड़े और संवेदनशील अध्याय की गूंज आज भी सुनाई दे रही है। पश्चिमी अफ्रीका के इस देश में दशकों पुराने हेपेटाइटिस बी के टीकों के परीक्षण का शिकार बने चिंपांजियों के एक विशेष समूह की सेहत पर इन दिनों वैज्ञानिक और पशु कल्याण विशेषज्ञ विशेष रूप से नजर रख रहे हैं। यह पूरी कवायद केवल एक सामान्य स्वास्थ्य परीक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात का गहराई से आकलन करने का प्रयास है कि चिकित्सा अनुसंधान के इन कड़े और दर्दनाक दौरों से गुजरने वाले बेजुबान जीवों के शरीर और मानस पर दीर्घकालिक रूप से क्या प्रभाव पड़े हैं। जब इन चिंपांजियों को प्रयोगशाला के पिंजरों से निकालकर सामान्य जीवन का दूसरा अवसर दिया गया, तो उनके व्यवहार, शारीरिक क्षमता और आंतरिक स्वास्थ्य में किस प्रकार के बदलाव आए, इन सभी पहलुओं को वैज्ञानिक रूप से समझने का प्रयास किया जा रहा है।

ह्यूमेन वर्ल्ड फार एनिमल्स के अभ्यारण्य में शुरू हुआ व्यापक स्वास्थ्य परीक्षण अभियान

इस ऐतिहासिक और मानवीय पहल की कमान ‘ह्यूमेन वर्ल्ड फार एनिमल्स’ के प्रतिष्ठित सेकेंड चांस चिंपांजी रिफ्यूज ने संभाल रखी है। इस अभ्यारण्य में इन दिनों पश्चिम अफ्रीकी चिंपांजियों के स्वास्थ्य का विस्तृत और व्यापक मूल्यांकन किया जा रहा है, ताकि उनकी शारीरिक स्थिति की सटीक तस्वीर सामने आ सके। चूंकि चिंपांजियों का स्वभाव और शारीरिक बल बेहद मजबूत होता है, इसलिए उनकी सुरक्षा और पशु चिकित्सकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस व्यापक जांच प्रक्रिया के दौरान उन्हें सुरक्षित तरीके से एनेस्थीसिया दिया जाता है। बेहोशी की इस स्थिति में मेडिकल एक्सपर्ट्स की टीम उनके संपूर्ण शरीर की गहनता से जांच करती है। इस पूरी मेडिकल प्रक्रिया में उनके दांतों की पेशेवर तरीके से सफाई, हड्डियों और आंतरिक अंगों के एक्स-रे के साथ-साथ हृदय की कार्यप्रणाली, फेफड़ों की क्षमता, नर्वस सिस्टम और खून के नमूनों की प्रयोगशाला में विस्तृत जांच शामिल है। इस वैज्ञानिक पद्धति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दशकों पहले झेले गए टीकों के दुष्प्रभावों का पता लगाया जा सके और उन्हें भविष्य के लिए बेहतर चिकित्सा सुरक्षा प्रदान की जा सके।

उम्र बढ़ने के साथ आने वाली स्वास्थ्य समस्याओं और बीमारियों की समय रहते हो रही पहचान

जैसे-जैसे ये चिंपांजी अपनी उम्र के एक बड़े पड़ाव और बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं, उनके शरीर में कई प्रकार की उम्र से जुड़ी बीमारियां और परेशानियां घर करने लगी हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों की टीम इन चिंपांजियों में उम्र बढ़ने के साथ होने वाली बीमारियों के शुरुआती और सूक्ष्म संकेतों की समय रहते पहचान करने में जुटी हुई है। हर एक चिंपांजी के पिछले मेडिकल इतिहास और वर्तमान शारीरिक स्थिति का बारीकी से अध्ययन करने के बाद उनके लिए एक अलग और व्यक्तिगत देखभाल की योजना तैयार की जा रही है। अभ्यारण्य के भीतर इन वन्यजीवों को संक्रामक बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए नियमित रूप से बूस्टर टीके लगाए जाते हैं, जो उनके कमजोर हो चुके प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूती प्रदान करते हैं। इसके अलावा, उनकी शारीरिक सुगमता और स्वास्थ्य स्वच्छता का ध्यान रखते हुए समय-समय पर उनके नाखून भी काटे जाते हैं। प्रबंधन की योजना यह है कि इस चरणबद्ध स्वास्थ्य जांच अभियान के तहत अभ्यारण्य में रह रहे बाकी सभी चिंपांजियों की भी इसी तरह से व्यापक चिकित्सा जांच पूरी की जाए, ताकि किसी भी छिपी हुई बीमारी का तुरंत इलाज किया जा सके।

1970 से 2000 के बीच अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा किए गए थे लगभग 400 चिंपांजियों पर परीक्षण

इस पूरे मामले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो यह दर्दनाक सिलसिला आज से कई दशक पहले शुरू हुआ था। अभ्यारण्य की निदेशक लिलियाना पचेको रिकोटे के अनुसार, वर्ष 1970 से लेकर 2000 के लंबे अंतराल के दौरान लाइबेरिया के इन क्षेत्रों में अमेरिकी शोधकर्ताओं द्वारा लगभग 400 चिंपांजियों पर हेपेटाइटिस बी और अन्य चिकित्सा टीकों के बड़े पैमाने पर परीक्षण किए गए थे। उस दौर में इन वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए कई चिंपांजियों को बेहद कम उम्र में ही पकड़ लिया गया था और उन्हें इन परीक्षणों का हिस्सा बनना पड़ा था। दशकों तक चली इस शोध प्रक्रिया के बाद, मानवीय संगठनों और पशु अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं के लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप वर्ष 2015 में इस संस्था को उन तमाम शोध कार्यों से किसी तरह बचे हुए शेष 60 चिंपांजियों की स्थायी देखभाल और संरक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वर्तमान में इनमें से अधिकांश चिंपांजी प्रकृति के सुंदर और शांत वातावरण से घिरे मैंग्रोव जंगलों के बीच बने एक सुरक्षित द्वीप पर स्थित अभ्यारण्य में स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जहां उन्हें इंसानी दखल से दूर एक बेहतर प्राकृतिक आवास मिल रहा है।

वन्यजीव अनुसंधान के इतिहास में चिकित्सा परीक्षणों और उनके दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन

यह पूरा अभियान न केवल एक अभ्यारण्य के स्तर पर चलने वाला स्वास्थ्य परीक्षण है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर वन्यजीव अनुसंधान, चिकित्सा नैतिकता और प्रयोगशालाओं में उपयोग किए जाने वाले जानवरों के पुनर्वास से जुड़ा एक बहुत बड़ा और गंभीर विषय है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में जब कभी भी टीकों या दवाओं का विकास होता है, तो उसका शुरुआती चरण जानवरों पर परीक्षण के जरिए ही पूरा किया जाता है, लेकिन परीक्षण समाप्त होने के बाद उन बेजुबान जीवों की सुध लेने वाले बहुत कम लोग होते हैं। लाइबेरिया के इस सेकेंड चांस रिफ्यूज ने उन उपेक्षित जीवों को न केवल एक नया जीवन दिया है, बल्कि यह साबित कर दिया है कि वैज्ञानिक प्रगति की कीमत चुकाने वाले इन प्राणियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी तब भी खत्म नहीं होती जब अनुसंधान समाप्त हो जाता है। चिकित्सा जगत के विशेषज्ञ इन चिंपांजियों पर हो रहे इस अध्ययन के नतीजों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि दशकों पुराने वायरल टीकों का प्राइमेट्स यानी वानर प्रजाति के शरीर पर किस प्रकार का दीर्घकालिक और आणविक प्रभाव पड़ता है, जो भविष्य के चिकित्सा विज्ञान के लिए एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।