संगीत की दुनिया में एक नए युग की शुरुआत: जब किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार की सुरीली आवाज ने मचाया था तहलका

भारतीय संगीत जगत और बॉलीवुड के सुनहरे इतिहास में कुछ ऐसे नायाब गीत दर्ज हैं, जिनकी चमक और जिनकी मिठास समय के गुजरने के साथ-साथ और अधिक गहरी होती जाती है। हिंदी सिनेमा के फलक पर जब भी सबसे बेहतरीन, सुरीले और सदाबहार रोमांटिक गानों की बात होती है, तो दर्शकों और श्रोताओं के जहन में कुछ चुनिंदा नाम ही आते हैं। भारतीय संगीत के आकाश में एक ऐसे ही कालजयी और अमर गीत की चर्चा आज भी हर संगीत प्रेमी की जुबान पर होती है, जिसे संगीत की दुनिया के महान और बहुमुखी प्रतिभा के धनी गायक किशोर कुमार (Kishore Kumar) के सुयोग्य पुत्र अमित कुमार (Amit Kumar) ने अपनी जादुई आवाज से सजाया था। अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए जब अमित कुमार ने पार्श्व गायन की दुनिया में कदम रखा, तो उनके पहले ही प्रयास ने एक ऐसा इतिहास रच दिया जिसकी गूंज आज पूरे पचास साल बाद भी उतनी ही शिद्दत के साथ सुनाई देती है। यह गाना सिर्फ एक धुन या कंपोजिशन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संगीत प्रेमियों के लिए एक ऐसा जज्बात बन चुका है, जो हर दौर के प्रेमियों के दिलों पर राज करता आ रहा है। सत्तर के दशक के उस सुहाने दौर में जब दिग्गज गायकों का एकछत्र साम्राज्य हुआ करता था, तब एक युवा गायक द्वारा गाया गया यह पहला ही गाना रातोंरात देश भर के रेडियो स्टेशनों की सबसे बड़ी शान बन गया और इसने लोकप्रियता के सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए थे।

बात अगर सत्तर के दशक की करें, तो वह भारतीय सिनेमा और संगीत का स्वर्णकाल माना जाता है, जब चारों तरफ मोहम्मद रफी, किशोर कुमार, मन्ना डे और मुकेश जैसे पाबंदियों और स्थापित दिग्गजों की भारी-भरकम आवाजें गूंजती थीं। उस दौर में किसी नए गायक के लिए अपनी एक अलग पहचान बनाना और संगीत प्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बनाना किसी लोहे के चने चबाने से कम नहीं था। ऐसे कड़े और प्रतिस्पर्धी माहौल के बीच जब अमित कुमार ने अपनी सुरीली पारी की शुरुआत की, तो उन्होंने संगीत प्रेमियों को एक ऐसा तोहफा दिया जिसने उन्हें रातोंरात सुपरस्टार गायक की श्रेणी में ला खड़ा किया। उनका वह पहला गाना इतना ज्यादा लोकप्रिय हुआ कि देखते ही देखते वह उस दौर के सबसे चर्चित और रोमांटिक गानों की सूची में सबसे ऊपर शुमार हो गया। रेडियो पर इस गाने की फरमाइशों का तांता लग गया था और हर आयु वर्ग के लोग इस धुन के दीवाने हो गए थे। अमित कुमार की उस अनूठी गायकी और उनके द्वारा बिखेरे गए जादू ने यह साबित कर दिया था कि वे न सिर्फ एक महान पिता की संतान हैं, बल्कि उनमें खुद की एक असाधारण और मौलिक संगीत प्रतिभा कूट-कूट कर भरी हुई है, जिसने आगे चलकर भारतीय फिल्म संगीत को कई और अनमोल रत्न दिए।

फिल्मी पर्दे पर फिल्माया गया वह जादुई और सदाबहार गीत और कोई नहीं बल्कि भारतीय संगीत इतिहास का सबसे पसंदीदा और सुकून देने वाला गाना ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ (Bade Achhe Lagte Hain) है। साल 1976 में रिलीज हुई प्रतिष्ठित और कलात्मक फिल्म ‘बालिका वधू’ का यह गाना सिनेमाई इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गया है। इस गीत के मुखड़े ‘बड़े अच्छे लगते हैं बड़े अच्छे लगते हैं… क्या, ये धरती ये नदिया ये रैना और तुम’ ने जो लोकप्रियता उस समय हासिल की थी, उसका दायरा समय के साथ और अधिक विस्तृत होता चला गया। इस गाने के कल्ट स्टेटस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रिलीज के दशकों बाद साल 2011 में जब इसी नाम से एक बड़ा और बेहद लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘बड़े अच्छे लगते हैं’ बनाया गया, तो उसके टाइटल ट्रैक के रूप में भी इसी ओरिजिनल गीत और इसकी धुन का इस्तेमाल किया गया। हैरानी की बात यह रही कि चाहे वह सत्तर का दशक हो, नब्बे का दौर हो या फिर आधुनिक इक्कीसवीं सदी का टेलीविजन युग हो, हर नए वर्जन और हर रूप में यह गाना सुपरहिट साबित हुआ। श्रोताओं की दीवानगी का आलम यह था कि उस दौर के सबसे मशहूर रेडियो शो ‘बिनाका गीतमाला’ ने भी इस खूबसूरत गीत को वर्ष 1977 का 26वां सबसे अधिक लोकप्रिय और डिमांडेड फिल्मी गाना घोषित किया था, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर था।

किसी भी गाने को कल्ट और सदाबहार बनाने के पीछे एक पूरी टीम की अद्भुत रचनात्मकता और मेहनत छिपी होती है, और इस मास्टरपीस के साथ भी कुछ ऐसा ही जुड़ा हुआ है। इस गीत की रूह को छू लेने वाली और कानों में रस घोलने वाली जादुई धुन भारतीय संगीत जगत के महान संगीतकार राहुल देव बर्मन यानी आरडी बर्मन (RD Burman), जिन्हें प्यार से ‘पंचम दा’ कहा जाता है, ने तैयार की थी। पंचम दा के संगीत निर्देशन ने इस गाने को एक ऐसा शाश्वत ठहराव और मेलोडी दी जो सुनने वाले के दिल की गहराइयों में उतर जाती है। इसके साथ ही, हिंदी सिनेमा के दिग्गज और बेजोड़ गीतकार आनंद बक्शी ने इस गीत के ऐसे अमर बोल लिखे, जिन्होंने प्रकृति के सौंदर्य और इंसानी प्रेम के बीच के बेहद पवित्र और खूबसूरत रिश्ते को शब्दों की अद्भुत माला में पिरो दिया। परदे पर इस गीत को अभिनेता सचिन पिलगांवकर और अभिनेत्री रजनी शर्मा पर फिल्माया गया था, जिनकी मासूम और सधी हुई अदाकारी ने इस गाने की भावनाओं को चार चांद लगा दिए थे। अमित कुमार की स्थिर, भावुक और सुरीली आवाज ने आनंद बक्शी के शब्दों और पंचम दा की धुनों को ऐसा प्राण दिया कि आज पचास साल बीत जाने के बाद भी यह गाना उतना ही ताजा, जीवंत और प्रासंगिक लगता है जितना यह अपने रिलीज के दिन था। यह गीत इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं होती, और आने वाली कई पीढ़ियां भी इस धुन पर झूमती और प्यार के अहसास में खोती रहेंगी।