
वर्ष 2026 के सितंबर महीने की शुरुआत के साथ ही सनातन पंचांग के अनुसार भाद्रपद (भादों) और आश्विन मास के पावन पर्वों की झड़ी लगने वाली है। यह महीना हिंदू धर्म में आध्यात्मिक साधना, भक्ति, उपवास और सांस्कृतिक उल्लास के दृष्टिकोण से अत्यंत पवित्र माना जाता है। सितंबर के शुरुआती सप्ताह में जहां भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव की गूंज सुनाई देगी, वहीं सुहागिनों का अखंड सौभाग्य का पर्व हरितालिका तीज और विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का 10 दिवसीय गणेशोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाएगा। इसके अतिरिक्त, महीने के उत्तरार्ध में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और तर्पण का महापर्व ‘श्राद्ध पक्ष’ (पितृ पक्ष) भी आरंभ होगा।
सितंबर के पहले सप्ताह में भगवान विष्णु के आठवें अवतार भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव यानी ‘श्री कृष्ण जन्माष्टमी’ (Janmashtami 2026) अत्यंत श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग में मध्यरात्रि 12 बजे कान्हा का जन्माभिषेक होगा।
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मथुरा-वृंदावन और देश भर में झांकियां: इस पावन अवसर पर मंदिरों में भव्य फूल-बंगले, छप्पन भोग और बाल गोपाल के पालने सजाए जाएंगे। श्रद्धालु दिनभर निर्जला या फलाहार व्रत रखकर रात्रि में पूजन के बाद पारण करेंगे।
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दही हांडी उत्सव: जन्माष्टमी के अगले दिन नवमी तिथि को मुंबई, महाराष्ट्र और गुजरात सहित पूरे देश में पारंपरिक ‘दही हांडी’ और ‘गोविंदा आला रे’ की धूम देखने को मिलेगी, जिसमें युवाओं की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर मटकियां फोड़ेंगी।
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को महिलाओं का सबसे कठिन और आस्थावान पर्व ‘हरितालिका तीज’ (Hartalika Teej) मनाया जाएगा।
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माता पार्वती और भगवान शिव का पूजन: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। सुहागिन महिलाएं और मनचाहा वर पाने की कामना से कुंवारी कन्याएं 24 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं।
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मिट्टी की प्रतिमाओं का विशेष श्रृंगार: शाम के समय प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की काली मिट्टी से बनी प्रतिमाओं का विधि-विधान से पूजन किया जाता है, सुहाग पिटारी अर्पित की जाती है और रातभर जागरण कर तीज की पौराणिक कथा सुनी जाती है।
हरितालिका तीज के ठीक अगले दिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से दस दिवसीय ‘गणेशोत्सव’ (Ganesh Chaturthi) का भव्य शुभारंभ होगा।
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गणेश स्थापना: इस दिन शुभ चौघड़िया और मध्याह्न काल में घरों और भव्य सार्वजनिक पंडालों में विधि-विधान से ‘विघ्नहर्ता’ भगवान गणेश की प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा की जाएगी।
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मोदक भोग और सांस्कृतिक संध्याएं: अगले 10 दिनों तक पूरे देश में, विशेषकर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात और दक्षिण भारत में, दैनिक आरती, मोदक व लड्डू के भोग तथा भजन संध्याओं का आयोजन होगा।
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अनंत चतुर्दशी और गणेश विसर्जन: भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी यानी ‘अनंत चतुर्दशी’ के दिन नम आंखों और ढोल-ताशों के साथ बप्पा को विदाई दी जाएगी और जल स्रोतों में विसर्जन किया जाएगा।
गणेश चतुर्थी के अगले दिन यानी भाद्रपद शुक्ल पंचमी को ‘ऋषि पंचमी’ (Rishi Panchami) का व्रत रखा जाएगा। इस दिन सप्तर्षियों (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ) का पूजन कर अनजाने में हुए पापों और दोषों की क्षमा याचना की जाती है। इसके पश्चात भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को ‘राधा अष्टमी’ (Radha Ashtami) का महापर्व बरसाना, मथुरा और पूरे ब्रज मंडल में बड़े उल्लास से मनाया जाएगा। माना जाता है कि राधा अष्टमी के पूजन के बिना जन्माष्टमी का व्रत अधूरा रहता है।
सितंबर के अंतिम पखवाड़े में भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले 16 दिवसीय ‘पितृ पक्ष’ (Pitru Paksha 2026) की शुरुआत होगी।
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तर्पण और पिंडदान: हिंदू परंपरा के अनुसार, इस कालखंड में पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए गया जी, प्रयागराज, हरिद्वार और घर पर श्राद्ध कर्म, पिंडदान व तर्पण किया जाता है।
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दान-पुण्य और पंचबलि कर्म: पितृ पक्ष के दौरान गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी और ब्राह्मण को भोजन (पंचबलि) कराने की परंपरा है। यह अवधि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और पितृ दोष से मुक्ति पाने का सबसे उत्तम समय मानी जाती है।
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श्री कृष्ण जन्माष्टमी: भाद्रपद कृष्ण अष्टमी
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दही हांडी उत्सव: भाद्रपद कृष्ण नवमी
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अजा एकादशी: भाद्रपद कृष्ण एकादशी
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हरितालिका तीज: भाद्रपद शुक्ल तृतीया
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गणेश चतुर्थी (गणेशोत्सव प्रारंभ): भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी
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ऋषि पंचमी: भाद्रपद शुक्ल पंचमी
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राधा अष्टमी: भाद्रपद शुक्ल अष्टमी
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परिवर्तिनी एकादशी (पद्मा एकादशी): भाद्रपद शुक्ल एकादशी
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अनंत चतुर्दशी (गणेश विसर्जन): भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी
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भाद्रपद पूर्णिमा एवं पितृ पक्ष (श्राद्ध) प्रारंभ: भाद्रपद पूर्णिमा
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