
क्रिकेट की दुनिया में कई बार ऐसे खिलाड़ी होते हैं जो अपनी असाधारण प्रतिभा के बावजूद किस्मत या चयनकर्ताओं की अनदेखी के चलते लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय मंच या मुख्यधारा की सुर्खियों से दूर रहने को मजबूर हो जाते हैं, लेकिन उनका हुनर कभी फीका नहीं पड़ता। हाल ही में घरेलू और प्रथम श्रेणी क्रिकेट के गलियारों से एक ऐसा ही प्रेरणादायक और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने तमाम खेल प्रेमियों और क्रिकेट पंडितों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। पिछले पूरे पांच साल से भारतीय टीम और मुख्य सर्किट से पूरी तरह बाहर चल रहे एक धुरंधर खिलाड़ी ने घरेलू टूर्नामेंट के एक ही मुकाबले में कातिलाना गेंदबाजी का प्रदर्शन करते हुए कुल 6 विकेट झटक लिए और मैदान पर तहलका मचा दिया। इस खिलाड़ी के इस चमत्कारी प्रदर्शन के बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर खेल के मैदानों तक उसकी वापसी की सुगबुगाहट तेज हो गई है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस खिलाड़ी ने अपने करियर का आखिरी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला किसी और की नहीं, बल्कि देश के सबसे सफल और आक्रामक कप्तान माने जाने वाले विराट कोहली की कप्तानी में खेला था। इस शानदार कमबैक के बाद से यह खिलाड़ी एक बार फिर से सुर्खियों के केंद्र में आ गया है और हर कोई उसके इस संघर्ष तथा जुझारूपन की तारीफ कर रहा है।
लंबी गुमनामी और पांच साल का यह कठिन संघर्ष
किसी भी पेशेवर खिलाड़ी के लिए अंतरराष्ट्रीय टीम से बाहर होने के बाद पांच साल तक का लंबा वक्त बिताना और खुद को मानसिक तथा शारीरिक रूप से पूरी तरह फिट रखना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता। जब कोई खिलाड़ी अचानक लाइमलाइट से ओझल हो जाता है, तो प्रायः लोग उसे भूल जाते हैं, लेकिन उस खिलाड़ी ने हार मानने के बजाय अपने घरेलू क्रिकेट और काउंटी या राज्य स्तर के मुकाबलों में अपनी मेहनत जारी रखी। चयनकर्ताओं के लगातार नजरअंदाज करने और फिटनेस तथा फॉर्म को लेकर उठने वाले सवालों के बीच इस तेज गेंदबाज या स्पिनर ने कभी हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी गेंदबाजी की कमियों पर बारीकी से काम किया, अपनी लय को फिर से हासिल किया और इस बात का इंतजार किया कि कब उसे अपनी काबलियत साबित करने का सही मौका मिले। पांच साल का यह लंबा अंतराल किसी भी खिलाड़ी के करियर को समाप्त करने के लिए काफी होता है, लेकिन इस खिलाड़ी का दृढ़ संकल्प यह साबित करता है कि सच्ची लगन और पैशन के दम पर मुश्किल वक्त के पहिये को भी अपनी अनुकूल दिशा में मोड़ा जा सकता है।
विराट कोहली के दौर की यादें और पिछला इतिहास
इस खिलाड़ी के करियर के शुरुआती पन्ने जब पलटे जाते हैं, तो भारतीय क्रिकेट का वह स्वर्णिम दौर सामने आता है जब टीम की कमान विराट कोहली के हाथों में थी और आक्रामकता तथा जीत का जज्बा अपने चरम पर हुआ करता था। विराट कोहली की कप्तानी में खेलना और अंतरराष्ट्रीय पदार्पण करना हर युवा खिलाड़ी का सपना होता है, और इस गेंदबाज ने भी उसी दौर में अपनी छाप छोड़ी थी। हालांकि, समय के साथ टीम के संयोजन में बदलाव, युवा खिलाड़ियों की लगातार आ रही फौज और खुद इस खिलाड़ी के फॉर्म में उतार-चढ़ाव के चलते धीरे-धीरे उसका पत्ता अंतरराष्ट्रीय टीम से कटता चला गया। विराट कोहली की कप्तानी से लेकर रोहित शर्मा और वर्तमान कप्तानी के दौर तक आते-आते इस खिलाड़ी ने ड्रेसिंग रूम से बहुत दूरी तय कर ली थी, लेकिन इतिहास के पन्नों में दर्ज वह पुराना दौर आज भी उसके प्रशंसकों के जेहन में तरोताजा है। जब उसने कोहली की कप्तानी में देश के लिए मैदान पर पसीना बहाया था, तब किसी ने नहीं सोचा था कि उसे अपनी पहचान वापस पाने के लिए पांच लंबे साल का लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
घरेलू मैच में कहर बरपाती गेंदबाजी और एक ही पारी में 6 विकेट
लंबे इंतजार के बाद आखिरकार उस घरेलू मुकाबले में इस खिलाड़ी की किस्मत और उसकी मेहनत रंग लाई, जब उसने विपक्षी बल्लेबाजों की धज्जियां उड़ाते हुए मैदान पर तहलका मचा दिया। पिच पर जैसे ही उसने अपनी गेंदबाजी का मोर्चा संभाला, उसकी स्विंग और सटीक लाइन-थ्रू ने बल्लेबाजों को क्रीज पर टिकने का मौका ही नहीं दिया। एक के बाद एक उसने विरोधी टीम के सेट और खतरनाक बल्लेबाजों को पवेलियन की राह दिखाई और देखते ही देखते अपने स्पेल में कुल 6 विकेट झटक लिए। उसके इस घातक गेंदबाजी आक्रमण के आगे विपक्षी टीम की पूरी बल्लेबाजी यूनिट ताश के पत्तों की तरह बिखर गई। मैदान पर मौजूद दर्शकों और कोचों ने जब इस धारदार गेंदबाजी को देखा, तो वे दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए। यह प्रदर्शन सिर्फ कुछ विकेट लेने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह इस बात का सबसे बड़ा सबूत था कि इस खिलाड़ी की कला और उसकी गेंदबाजी की धार में आज भी वही पुराना खौफ और पैनापन बरकरार है जो उसने अपने पदार्पण के समय दिखाया था।
कमबैक की उम्मीदें और चयनकर्ताओं के सामने नई चुनौती
इस एक ही मैच में छह विकेट चटकाने के सनसनीखेज कारनामे के बाद से खेल प्रेमियों के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इस खिलाड़ी के लिए राष्ट्रीय टीम के दरवाजे एक बार फिर से खुल सकते हैं। भारतीय क्रिकेट में इन दिनों घरेलू प्रदर्शन को तरजीह दी जा रही है और फॉर्म तथा अनुभव के आधार पर खिलाड़ियों को मौके दिए जा रहे हैं। पांच साल के लंबे वनवास के बाद जिस तरह से इस खिलाड़ी ने अपनी राख से उठकर phoenix की तरह वापसी की है, उसने चयनकर्ताओं को भी सोचने पर मजबूर कर दिया होगा। भले ही उम्र और फिटनेस आधुनिक दौर की तेज-तर्रार मांगों के बीच एक बड़ी चुनौती हो, लेकिन इस तरह का मैच जिताने वाला अनुभव किसी भी टीम की बेंच स्ट्रेंथ को बेहद मजबूत कर सकता है। खिलाड़ी के फैंस अब यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि राष्ट्रीय चयनकर्ता इस शानदार प्रदर्शन को नजरअंदाज नहीं करेंगे और उसे देश के लिए अपनी अधूरी कहानी को एक नए सिरे से मुकम्मल करने का एक और मौका जरूर दिया जाएगा।
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