
आर्थिक कंगाली और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान पर अब तक के सबसे बड़े ऊर्जा संकट (Energy Collapse) का खतरा मंडराने लगा है। देश का पावर ट्रांसमिशन और जनरेशन सिस्टम पूरी तरह पतन की कगार पर पहुंच चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी, आयातित ईंधन के लाले और खरबों रुपये के अनसुलझे सर्कुलर कर्ज (Circular Debt) के चलते देश के दर्जनों प्रमुख बिजली घर या तो पूरी तरह बंद हो चुके हैं या अपनी क्षमता से बहुत कम उत्पादन कर रहे हैं।
विशेषज्ञों और ऊर्जा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि मांग और आपूर्ति के बीच के इस भारी अंतर को तुरंत पाटा नहीं गया, तो राष्ट्रीय ग्रिड (National Transmission & Despatch Company – NTDC) पर अत्यधिक फ्रीक्वेंसी फ्लक्चुएशन के चलते पाकिस्तान एक बार फिर 2021 और 2023 की तरह देशव्यापी महा-ब्लैकआउट (Nationwide Blackout) का शिकार हो सकता है। यह स्थिति ऐसे समय में उत्पन्न हुई है जब अत्यधिक उमस और गर्मी के कारण देश में बिजली की दैनिक मांग अपने उच्चतम स्तर को पार कर चुकी है।
पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों की बात तो दूर, अब देश के सबसे बड़े औद्योगिक और कारोबारी महानगर भी अंधेरे में डूबे हुए हैं। बिजली वितरण कंपनियों (DISCOs) द्वारा जारी किए गए अनऑफिशियल शेड्यूल के अनुसार, कई प्रमुख क्षेत्रों में दैनिक जीवन पूरी तरह ठप हो गया है:
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कराची (Karachi): देश की आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले कराची में के-इलेक्ट्रिक (K-Electric) द्वारा विभिन्न औद्योगिक और रिहायशी इलाकों में 8 से 12 घंटे की लोड शेडिंग की जा रही है, जिससे सैकड़ों निर्यातोन्मुख कपड़ा (Textile) मिलों में उत्पादन रुक गया है।
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लाहौर और पंजाब प्रांत: लाहौर इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी (LESCO) और फैसलाबाद (FESCO) क्षेत्र में हालात बदतर हैं। पंजाब के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 14 से 16 घंटे तक बिजली गायब रह रही है।
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खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान: पेशावर (PESCO) और क्वेटा (QESCO) के अधिकार क्षेत्र में आने वाले दूरदराज के क्षेत्रों में स्थिति बेकाबू है, जहां 18 से 20 घंटे तक बत्ती गुल रहने की खबरें सामने आ रही हैं। अस्पतालों में आपातकालीन सर्जरी टल रही हैं और पेयजल आपूर्ति पूरी तरह बाधित हो चुकी है।
पाकिस्तान के पास लगभग 40,000 मेगावाट से अधिक की स्थापित उत्पादन क्षमता (Installed Capacity) होने के बावजूद देश वास्तविक समय में मात्र 18,000 से 21,000 मेगावाट ही बिजली पैदा कर पा रहा है। इस विशाल विसंगति का मुख्य कारण ईंधन की भारी अनुपलब्धता है:
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आरएलएनजी (RLNG) और फर्नेस ऑयल का संकट: देश के अधिकांश आधुनिक थर्मल पावर प्लांट्स आयातित तरलीकृत प्राकृतिक गैस (RLNG) और फर्नेस ऑयल पर निर्भर हैं। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) के पास डॉलर की भारी कमी के कारण सरकार वैश्विक बाजार से महंगे ईंधन के नए कार्गो खरीदने और उनके लिए लेटर ऑफ क्रेडिट (LCs) खोलने में असमर्थ है।
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कोयले की आपूर्ति में बाधा: पोर्ट कासिम और साहीवाल जैसे बड़े कोयला आधारित बिजलीघरों को चलाने के लिए आयातित दक्षिण अफ्रीकी कोयले की खेप नहीं मिल पा रही है, जिससे कई मेगावाट क्षमता वाली इकाइयां स्टैंडबाय पर खड़ी हैं।
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हाइड्रोपावर का उतार-चढ़ाव: पानी की कम आवक और गाद (Silt) की समस्याओं के कारण तरबेला और मंगला जैसे प्रमुख बांधों से होने वाला जलविद्युत उत्पादन भी मांग की पूर्ति के लिए नाकाफी साबित हो रहा है।
पाकिस्तान के बिजली क्षेत्र की बर्बादी की असली जड़ उसका ‘सर्कुलर डेट’ (Circular Debt) है, जो बढ़कर 2.6 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपये (लगभग 2.6 लाख करोड़ रुपये) के खौफनाक आंकड़े को पार कर चुका है।
इस संकट का सबसे विवादित पहलू स्वतंत्र बिजली उत्पादकों (IPPs) को किया जाने वाला ‘कैपेसिटी पेमेंट’ (Capacity Charges) है। 1990 और 2015 के दशक में किए गए समझौतों के तहत सरकार को निजी और विदेशी बिजली कंपनियों को तयशुदा रकम डॉलर के भाव पर देनी होती है, चाहे उनसे बिजली खरीदी जाए या नहीं। पाकिस्तान सरकार इन कंपनियों के पुराने बकाए चुकाने में नाकाम रही है। विशेष रूप से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत बने चीनी पावर प्लांट्स के खरबों रुपये बकाया होने के चलते चीनी कंपनियों ने भी अपनी उत्पादन क्षमता को सीमित कर दिया है। जब तक सरकार इन बिजली उत्पादकों को पैसा जारी नहीं करती, वे नया ईंधन खरीदकर टरबाइन चलाने से साफ इनकार कर रहे हैं।
पावर जनरेशन में आ रही अचानक गिरावट सीधे ट्रांसमिशन सिस्टम को अस्थिर कर रही है। पाकिस्तान का नेशनल ग्रिड सिस्टम काफी पुराना और कमजोर है। जब बिजली की मांग अधिक और सप्लाई कम होती है, तो ग्रिड की 50 हर्ट्ज (Hz) की मानक फ्रीक्वेंसी तेजी से नीचे गिरने लगती है।
नेशनल पावर कंट्रोल सेंटर (NPCC) के सूत्रों का कहना है कि जब कोई बड़ा पावर प्लांट ट्रिप होता है, तो पूरा लोड ट्रांसमिशन लाइनों पर आ जाता है। यदि सिस्टम ऑटो-आइसोलेट नहीं होता, तो डोमिनो इफेक्ट (कैस्केडिंग फेलियर) के तहत एक के बाद एक पावर स्टेशन बंद हो जाते हैं और पूरा देश एक झटके में ब्लैकआउट में चला जाता है। हाल के दिनों में कई प्रमुख ग्रिड स्टेशनों पर वोल्टेज में 40% तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे ट्रांसफार्मरों के जलने का खतरा चरम पर है।
इस गहरे संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के बेलआउट पैकेज की कड़ी शर्तों ने आम पाकिस्तानी नागरिकों का जीना दूभर कर दिया है। आईएमएफ के निर्देश पर नेशनल इलेक्ट्रिक पावर रेगुलेटरी अथॉरिटी (NEPRA) ने बिजली दरों में 50 रुपये से 70 रुपये प्रति यूनिट तक का भारी इजाफा कर दिया है। इसके ऊपर जीएसटी, फ्यूल प्राइस एडजस्टमेंट (FPA) और तरह-तरह के सरचार्ज जोड़कर उपभोक्ताओं को भेजे जा रहे हैं।
स्थिति यह है कि एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार का मासिक बिजली बिल उसकी कुल मासिक आय से भी अधिक आ रहा है। इसके विरोध में रावलपिंडी, इस्लामाबाद, मुल्तान, लाहौर और कराची सहित पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन और ‘बिल जलाओ आंदोलन’ चल रहे हैं। नागरिक बिजली दफ्तरों का घेराव कर रहे हैं और कर्मचारियों के साथ झड़पों की घटनाएं आम हो चुकी हैं। बिजली की असहनीय लागत के चलते हजारों छोटी फैक्ट्रियां और कॉटेज इंडस्ट्रीज हमेशा के लिए बंद हो चुकी हैं, जिससे लाखों दिहाड़ी मजदूर बेरोजगार हो गए हैं।
बिजली की यह भारी कमी केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के लिए भी सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। निर्यात में आई भारी गिरावट के चलते देश का व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है और विदेशी निवेशक पूरी तरह दूरी बना रहे हैं।
शहबाज शरीफ सरकार ने सऊदी अरब, यूएई और चीन से आपातकालीन वित्तीय मदद और ऊर्जा रियायतों की गुहार लगाई है, साथ ही सोलर पैनल्स पर टैक्स लगाकर घरेलू सोलर उत्पादन को भी हतोत्साहित करने जैसे आत्मघाती फैसले लिए हैं। जब तक पाकिस्तान अपने बिजली क्षेत्र में ढांचागत सुधार नहीं करता, कैपेसिटी पेमेंट्स के अनुबंधों पर दोबारा बातचीत नहीं करता और ट्रांसमिशन लाइन के लीकेज व बिजली चोरी (Line Losses) को नहीं रोकता, तब तक मुल्क को इस अंतहीन अंधेरे और महा-ब्लैकआउट के खतरे से निजात मिलना असंभव नजर आ रहा है।
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