
सनातन धर्म की पौराणिक परंपरा में आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी पापांकुशा एकादशी को समस्त पापों पर अंकुश लगाने वाली तिथि माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, जिस प्रकार एक शक्तिशाली अंकुश मदमस्त हाथी को वश में कर लेता है, ठीक उसी प्रकार इस एकादशी का विधिवत व्रत, पूजन और कथा श्रवण मनुष्य के जाने-अनजाने में हुए बड़े से बड़े पापों का शमन कर देता है। पदम पुराण और महाभारत के प्रसंगों में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस पावन व्रत की महिमा और कथा का विस्तार से वर्णन किया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु के चतुर्भुज ‘पद्मनाभ’ स्वरूप की आराधना के साथ-साथ यदि इस व्रत कथा का पाठ न किया जाए, तो उपवास का संपूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। आइए पढ़ते हैं पापांकुशा एकादशी की वह दिव्य और प्रेरक पौराणिक कथा, जिसने एक महापापी को भी मोक्ष का अधिकारी बना दिया।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में विंध्याचल पर्वत के घने जंगलों में ‘क्रोधन’ नाम का एक अत्यंत निर्दयी और क्रूर बहेलिया (शिकारी) रहता था। वह स्वभाव से अत्यंत हिंसक, लालची, मद्यपायी और कुटिल बुद्धि का व्यक्ति था। उसने अपने पूरे जीवनकाल में कभी कोई धर्म-कर्म, पूजा-पाठ या दया का कार्य नहीं किया था। उसका नित्य का काम भोले-भाले जंगली पशु-पक्षियों का शिकार करना, उन्हें तड़पा-तड़पा कर मारना और उनके मांस को बेचकर अपनी आजीविका चलाना था। इसके अलावा वह लूटपाट, चोरी और दूसरों के साथ विश्वासघात करने में भी जरा भी संकोच नहीं करता था। वर्षों तक इस प्रकार के घोर पाप कर्म करते-करते उसकी जवानी बीत गई और वृद्धावस्था ने उसके शरीर को जकड़ लिया। जब उसकी आंखें कमजोर होने लगीं और पैरों ने साथ देना छोड़ दिया, तब उसे पहली बार अहसास हुआ कि मृत्यु उसके बेहद करीब आ चुकी है।
एक रात वृद्धावस्था की बीमारी और लाचारी के बीच क्रोधन ने भयानक स्वप्न देखा, जिसमें साक्षात यमराज के दूत विकराल रूप में कालपाश लेकर उसके प्राण हरने खड़े थे। यमदूतों ने उसे चेतावनी दी कि कल उसकी आयु का अंतिम दिन है और उसके समस्त पापों का लेखा-जोखा यमलोक में तैयार है, जहां उसे खौलते तेल के कड़ाहों और घोर नरक की यातनाएं झेलनी पड़ेंगी। यमदूतों के इस भयानक स्वरूप और नरक की कल्पना मात्र से बहेलिया भय से थर-थर कांपने लगा। अपनी आसन्न मृत्यु और नरक के दंड से बचने के लिए वह व्याकुल होकर आधी रात को ही जंगलों में भटकने लगा। भागते-भागते वह अचानक विंध्य पर्वत की तलहटी में स्थित परम तपस्वी महर्षि अंगिरा के शांत और दिव्य आश्रम में जा पहुंचा। आश्रम के द्वार पर पहुंचते ही भयभीत क्रोधन सीधे महर्षि के चरणों में गिर पड़ा और दहाड़ें मारकर रोने लगा।
क्रूर शिकारी को पश्चाताप के आंसुओं में डूबा देखकर दयालु महर्षि अंगिरा का हृदय पिघल गया। उन्होंने क्रोधन को उठाकर सांत्वना दी और उसके इस प्रकार व्याकुल होने का कारण पूछा। कांपती आवाज में शिकारी ने हाथ जोड़कर कहा, “हे दयानिधान महर्षि! मैंने अपने पूरे जीवन में केवल जीव-हत्या, अधर्म, झूठ और क्रूरता के पाप किए हैं। मैंने कभी किसी देवी-देवता का स्मरण नहीं किया। आज यम के दूतों ने मुझे चेताया है कि कल मेरी मृत्यु का दिन है और मुझे रौरव नरक की घोर यातनाएं भुगतनी होंगी। हे ऋषिवर! मुझ महापापी पर कृपा करें और कोई ऐसा सरल मार्ग बताएं जिससे मेरे जीवनभर के पाप धुल सकें और मुझे यमलोक के असहनीय दंड से मुक्ति मिल सके।” महर्षि अंगिरा ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और फिर मुस्कुराते हुए बोले, “हे व्याध! सौभाग्य से आज आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है और कल ‘पापांकुशा एकादशी’ का पावन दिन है। तुम बिना किसी संशय के कल सच्चे मन से भगवान श्रीहरि विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप का व्रत रखो, रात्रि जागरण करो और अपने पापों की क्षमा मांगो। इस एकादशी के प्रभाव से तुम्हारे जन्म-जन्मांतर के पाप उसी प्रकार भस्म हो जाएंगे जैसे अग्नि में सूखी घास जल जाती है।”
महर्षि अंगिरा के वचनों पर पूर्ण विश्वास करते हुए क्रोधन ने अगले दिन नियमपूर्वक पापांकुशा एकादशी का कठिन उपवास रखा। उसने पूरे दिन अन्न और जल का त्याग किया, महर्षि के आश्रम के समीप सरोवर में स्नान कर भगवान पद्मनाभ की मूर्ति को पीले पुष्प, तुलसी दल और गंध अर्पित की। दिनभर वह पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए केवल “हे नारायण, हे वासुदेव” का जाप करता रहा। रातभर उसने सोए बिना भगवान के नाम का संकीर्तन और जागरण किया। अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय के समय जैसे ही उसने अपना व्रत पूर्ण कर ब्राह्मणों को प्रणाम किया, उसकी जीवनलीला समाप्त हो गई। ठीक उसी क्षण यमराज के दूत उसके प्राण लेने पहुंचे, लेकिन इससे पहले कि वे उस पर अपना पाश डालते, भगवान विष्णु के दिव्य पार्षद गरुड़ पर आरूढ़ होकर वहां प्रकट हो गए। विष्णु के पार्षदों ने यमदूतों को रोकते हुए कहा कि इस जीवात्मा ने पापांकुशा एकादशी का निष्काम भाव से व्रत कर अपने समस्त पापों को नष्ट कर लिया है, इसलिए अब इस पर यमराज का कोई अधिकार नहीं है। इसके बाद एक सुसज्जित दिव्य विमान में बिठाकर क्रोधन को साक्षात वैकुंठ लोक भेज दिया गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने पांडु पुत्र अर्जुन और युधिष्ठिर को समझाते हुए कहा था कि जो मनुष्य आश्विन शुक्ल एकादशी के दिन श्रद्धापूर्वक इस पावन कथा का पठन या श्रवण करता है, उसे सहस्रों अश्वमेध और सौ सूर्यग्रहण के स्नान के समान पुण्यफल की प्राप्ति होती है। यह एकादशी न केवल व्रत करने वाले साधक के पापों का क्षय करती है, बल्कि उसके मातृपक्ष, पितृपक्ष और पत्नीपक्ष की कई पीढ़ियों के पूर्वजों का भी उद्धार कर उन्हें मोक्ष की राह दिखाती है। इस दिन सोना, तिल, भूमि, गाय, अन्न, जल और छाते का दान करने से मनुष्य को कभी यमराज के दर्शन नहीं करने पड़ते और जीवन के अंत में उसे परम पद की प्राप्ति होती है। इसलिए एकादशी के दिन मन में किसी के प्रति द्वेष न रखते हुए पूर्ण सात्विकता और भक्ति भाव से प्रभु की इस कथा का मनन अवश्य करना चाहिए।
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