
वैश्विक भू-राजनीति और सैन्य संतुलन के आधुनिक इतिहास में ऐसा दौर बहुत कम देखने को मिलता है जब किसी एक सैन्य कमांडर के फैसलों पर आधी दुनिया का भविष्य टिका हो। संयुक्त राज्य अमेरिका की सबसे विशाल, रणनीतिक और ताकतवर सैन्य शाखा ‘यूएस इंडो-पैसिफिक कमांड’ (USINDOPACOM) के मुखिया एडमिरल सैमुअल पापारो इस समय दुनिया के उसी केंद्र बिंदु पर खड़े हैं। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध के मैदान में विजय पताका फहराने को ही सेना की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है, तब चार सितारों वाले इस शीर्ष अमेरिकी कमांडर का फलसफा एकदम अलग और व्यावहारिक है। एडमिरल पापारो का मानना है कि एक सच्चे और निष्ठावान फौजी की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जीत युद्ध लड़ने में नहीं, बल्कि अपनी अचूक शक्ति और तैयारी से युद्ध को होने से रोक देने में निहित है।
आज जब प्रशांत महासागर से लेकर हिंद महासागर तक तनाव का दायरा लगातार फैल रहा है, पापारो के कंधों पर सबसे संवेदनशील जिम्मेदारी है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन की बढ़ती आक्रामकता को बांधकर रखना और ताइवान जलडमरूमध्य में मंडराते तीसरे विश्व युद्ध के काले बादलों को छांटना है। अपनी सख्त कार्यशैली, रणनीतिक अनुशासन और जमीनी यथार्थवाद के लिए मशहूर पापारो आज वाशिंगटन से लेकर टोक्यो, कैनबरा और नई दिल्ली तक रक्षा रणनीतिकारों के बीच एक मजबूत और भरोसेमंद रणनीतिकार के रूप में जाने जाते हैं।
सैमुअल पापारो के व्यक्तित्व और नेतृत्व शैली की जड़ें उनके छात्र जीवन से जुड़ी हुई हैं। यह बात साल 1986 की है, जब वे पेंसिल्वेनिया के एक कॉलेज में अपनी पढ़ाई कर रहे थे। एक शाम वे अपनी मंगेतर (अब पत्नी) मॉरीन के साथ सिनेमाघर में उस दौर की ब्लॉकबस्टर हॉलीवुड फिल्म ‘टॉप गन’ देखने पहुंचे। उस जमाने में टॉम क्रूज द्वारा निभाया गया ‘मावेरिक’ का बेपरवाह, आक्रामक और नियमों को ताक पर रखने वाला किरदार हर नौजवान का रोल मॉडल बन चुका था। मगर आश्चर्यजनक रूप से युवा पापारो को मावेरिक के बजाय उसका प्रतिद्वंद्वी किरदार ‘आइसमैन’ (टॉम काजेंस्की) सबसे ज्यादा प्रभावित कर गया।
पापारो ने महसूस किया कि मावेरिक का अंदाज रोमांचक तो हो सकता है, लेकिन वास्तविक युद्ध में हवा-हवाई आत्मविश्वास और अनियंत्रित गुस्सा तबाही लाता है। इसके विपरीत आइसमैन अनुशासन, कड़ी मेहनत, योजनाबद्ध तैयारी और संकट के समय शांत रहकर सटीक फैसले लेने पर भरोसा करता था। यही ‘आइसमैन फिलॉसफी’ आगे चलकर पापारो के चार दशक लंबे सैन्य सफर की रीढ़ बन गई। वे आज भी मानते हैं कि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक और मिसाइल युद्ध में वही कमांडर जीतता है जिसका दिमाग दबाव में बर्फ की तरह ठंडा और स्थिर रहता है।
एडमिरल पापारो को वर्दी और समंदर की लहरों का संस्कार विरासत में मिला था, हालांकि उनका पारिवारिक परिवेश बेहद सादगी और संघर्षों से भरा था। उनके दादा ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में अमेरिकी नौसेना के निर्माण दस्ते (सीबीज) में अपनी सेवाएं दी थीं। उनके पिता सैमुअल सीनियर ने अमेरिकी मरीन कोर में सेवा की और बाद में यूएसएस जॉन एफ. कैनेडी तथा किट्टी हॉक जैसे विशालकाय विमानवाहक पोतों (एयरक्राफ्ट कैरियर्स) की देखरेख और तकनीकी रख-रखाव में अहम भूमिका निभाई। घर की आर्थिक स्थिति को संवारने के लिए उनकी मां ने दक्षिण फिलाडेल्फिया के एक साधारण हेयर सैलून में बाल धोने और स्टोर में मेकअप काउंटर पर काम किया।
पापारो अपने समूचे परिवार की पहली पीढ़ी के सदस्य थे जिन्होंने उच्च शिक्षा की दहलीज पार की। विलेनोवा कैथोलिक यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अमेरिकी नौसेना की प्रतिष्ठित ‘टॉपगन’ (नेवल फाइटर वेपन्स स्कूल) से फाइटर पायलट के रूप में कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया। एफ/ए-18 हॉर्नेट जैसे घातक लड़ाकू विमान उड़ाते हुए उन्होंने हजारों घंटे की उड़ान भरी और कैरियर्स पर सैकड़ों खतरनाक लैंडिंग कीं। अपनी असाधारण योग्यता के दम पर वे धीरे-धीरे अमेरिकी नौसेना की कमान श्रृंखला में शीर्ष पर पहुंचते गए।
एडमिरल पापारो आज जिस यूएस इंडो-पैसिफिक कमान का नेतृत्व कर रहे हैं, उसका भौगोलिक विस्तार अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी समुद्री सीमा तक फैला हुआ है। इस विशाल क्षेत्र में दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग आते हैं। उनकी सीधी कमान में करीब 4 लाख सैन्य और असैन्य जवान, 5 विशालकाय परमाणु संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स, लगभग 200 आधुनिक विध्वंसक व युद्धपोत और 1,000 से अधिक अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान तैनात हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का नौसैनिक वर्चस्व निर्विवाद रहा है, लेकिन अब राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व वाला चीन इस प्रभुत्व को सीधी चुनौती दे रहा है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीनी राष्ट्रपति ने अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को 2027 तक ताइवान को सैन्य बल से नियंत्रित करने में सक्षम होने का स्पष्ट समयबद्ध लक्ष्य दे रखा है। ऐसे में पापारो का दायित्व केवल गश्त लगाना नहीं है, बल्कि बीजिंग के योजनाकारों के मन में यह मनोवैज्ञानिक डर बिठाना है कि ताइवान पर किसी भी सैन्य दुस्साहस की कीमत चीन की अर्थव्यवस्था और सेना के लिए पूरी तरह असहनीय होगी।
सैन्य गलियारों में एडमिरल पापारो की पहचान एक ऐसे शांत और पेशेवर अधिकारी की है जो राजनीतिक बयानबाजी और टीवी की सुर्खियों से कोसों दूर रहते हैं। मध्य पूर्व और ईरान संकट के दौरान भी जब वाशिंगटन में सैन्य विकल्पों पर बहस चल रही थी, तब पापारो ने लाल सागर और फारस की खाड़ी में एयरक्राफ्ट कैरियर्स तथा गाइडेड मिसाइल विध्वंसकों की तैनाती को लेकर बिना किसी राजनीतिक दबाव के अपनी स्वतंत्र, स्पष्ट और व्यावहारिक सैन्य राय रखी थी। उन्होंने शीर्ष नीति-निर्माताओं और नेतृत्व के समक्ष जमीनी हकीकत का निष्पक्ष आकलन प्रस्तुत किया।
एडमिरल पापारो अपने अधिकारियों से अक्सर कहते हैं कि वे किसी जंग को जीतकर इतिहास की किताबों में महान नायक बनने की महत्वाकांक्षा नहीं रखते। उनका एकमात्र और सर्वोच्च लक्ष्य प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बनाए रखना और शांति की रक्षा करना है। पापारो का मानना है कि सबसे बेहतरीन सेना वह है जिसकी मारक क्षमता देखकर दुश्मन कभी हमला करने की हिम्मत ही न जुटा सके। उनकी सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि वे और उनके सैनिक जिस भीषण महायुद्ध की तैयारी दिन-रात कर रहे हैं, मानवता को वह जंग कभी लड़नी ही न पड़े।
Focus Times – Focus Times, ब्रेकिंग न्यूज़, राजनीति, देश-दुनिया