
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे देश में विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में हल षष्ठी (हलछठ, ललई छठ, हरछठ या बलराम जयंती) के रूप में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। यह व्रत माताएं अपने पुत्र व संतान की दीर्घायु, आरोग्य, सुखी जीवन और संकटों से रक्षा के लिए निर्जला या फलाहार रहकर करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी पावन तिथि को द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई, शेषनाग के अवतार और हलधर प्रभु बलराम जी का प्राकट्य हुआ था। बलराम जी का मुख्य आयुध ‘हल’ और ‘मूसल’ होने के कारण इस व्रत के नियम अन्य सामान्य व्रतों से काफी कड़े और अनोखे होते हैं।
इस व्रत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कृषि कार्य और हल से जुड़ी चीजों का उपयोग वर्जित रहता है:
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हल से जुते अन्न का पूरी तरह निषेध: इस व्रत में खेत में हल चलाकर या ट्रैक्टर से जोतकर उगाई गई किसी भी फसल, अनाज, फल या सब्जी का सेवन बिल्कुल नहीं किया जाता। यहां तक कि पूजा में भी जुते हुए खेत का कोई अन्न नहीं चढ़ाया जाता।
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गाय के दूध, दही व घी का सख्त परहेज: हलछठ व्रत में गाय का दूध, गाय के दूध से बना दही, मक्खन या देसी घी खाना सख्त वर्जित माना गया है। इस दिन केवल भैंस के दूध, दही और घी का ही प्रयोग पूजा और फलाहार में मान्य होता है।
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सगरी (तालाब) बनाकर पूजन: घर के आंगन या मंदिर में एक छोटा सा गड्ढा बनाकर उसे पवित्र जल से भरकर ‘सगरी’ (तालाब का प्रतीकात्मक रूप) बनाई जाती है। इसके किनारे कांसी, महुआ, पलाश और झरबेरी की डालियां गाड़कर षष्ठी देवी और बलराम जी का आह्वान किया जाता है।
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सतपुतिया या छह प्रकार की चीजें: पूजा में छह प्रकार की वनस्पतियां, छह महुए के पत्ते, छह मिट्टी के कुल्हड़ और छह प्रकार के भुने हुए अनाज (तिन्नी चावल, महुआ, चना आदि) अर्पित करने की विशेष परंपरा है।
चूंकि जुते हुए अन्न का निषेध होता है, इसलिए इस दिन महिलाएं प्रकृति द्वारा स्वतः उगे खाद्यान्नों और फलों का ही सेवन करती हैं:
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पसही के चावल (तिन्नी का चावल): यह चावल किसी खेत में हल जोतकर नहीं उगाया जाता, बल्कि प्राकृतिक रूप से तालाबों, पोखरों या दलदली जमीन पर स्वतः उगता है। व्रत के पारण में तिन्नी के चावल को ही पकाकर खाया जाता है।
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महुआ (Mahua): महुआ का फल और फूल इस व्रत का मुख्य प्रसाद माना जाता है। तिन्नी के चावल में महुआ मिलाकर मीठा भात बनाया जाता है या महुए को भूनकर खाया जाता है।
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भैंस का दूध और दही: पारण या फलाहार के दौरान तिन्नी के चावल को भैंस के दूध या खट्टे-मीठे दही के साथ ग्रहण किया जाता है।
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बिना जुताई वाली हरी सब्जियां (कमरछठ भाजी): तालाब के किनारे या बिना जुताई के प्राकृतिक रूप से उगने वाली छह प्रकार की भाजियां (जैसे नारी का साग, चौलाई, करमुआ, बथुआ आदि) को केवल सेंधा नमक और भैंस के घी में पकाकर खाया जाता है।
प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर संतान की दीर्घायु का संकल्प लें। दोपहर या सायंकाल शुभ मुहूर्त में घर के आंगन में सगरी बनाएं। उसमें झरबेरी, कांसी और पलाश की टहनियां लगाएं। सगरी में कच्चा दूध और जल अर्पित करें। इसके बाद छह महुए के दोने में भुना हुआ तिन्नी का चावल, महुआ और फल रखें। भगवान गणेश, कार्तिकेय, षष्ठी देवी और बलराम जी का ध्यान करते हुए रोली, अक्षत (तिन्नी के चावल का) और फूल अर्पित करें। अंत में हल षष्ठी व्रत की पारंपरिक कथा सुनें और आरती कर संतान के माथे पर सगरी की मिट्टी या महुए का टीका लगाकर उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा की प्रार्थना करें।
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